पाक अधिकृत कश्मीर को भारत का अभिन्न मानता था वह संविधान
संविधान की प्रस्तावना से स्पष्ट ही था कि रियासत के लोगों ने जम्मू एवं कश्मीर राज्य को भारत का एक अखंड भाग मान लिया था। संविधान राज्य के लोगों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व प्रदान करता था और उस संविधान के अनुसार, जम्मू एवं कश्मीर राज्य में वह क्षेत्र शामिल है जो 15 अगस्त, 1947 के शासन के अंतर्गत था। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि इस राज्य के अधीन “पाक अधिकृत क्षेत्र” भी आता है।
संविधान सभा के 1954 के प्रस्ताव के बाद जम्मू और कश्मीर के संविधान में धारा को शामिल किया गया, जिसमें लिखा है, ‘‘जम्मू और कश्मीर राज्य भारत संघ का अभिन्न अंग है और रहेगा।’’ चूंकि जम्मू कश्मीर के लोगों द्वारा विधिवत् निर्वाचित संविधान सभा 26 अक्तूबर 1947 को भारत संघ में विलय को कानूनी रूप से वैध, संवैधानिक रूप से बाध्यकारी और अपरिवर्तनीय मान चुकी थी इसलिए पािकिस्तान द्वारा बार-बार जनमत संग्रह और आत्म निर्णय की मांग की हवा वैसे ही खिसक चुकी थी। यही नहीं 30 मार्च 1951 को सुरक्षा परिषद का 91वां जम्मू-कश्मीर के संविधान के प्रावधानों को प्रभावित नहीं कर सकती थी।
15 फरवरी 1954 को भारत में विलय की पुष्टि
वयस्क मताधिकार के आधार पर असंदिग्ध शब्दों में बुलाई गई संविधान सभा ने काफी बहस, विचार-विमर्श के बाद 15 फरवरी, 1954 को एक सुविचारित प्रस्ताव के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की पुष्टि की। इस संविधान सभा के उद्घाटन भाषण में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने कहा कि विधानसभा ’’विलय के संबंध में अपने तर्कसंगत निष्कर्ष देगी।
इस प्रकार, जम्मू और कश्मीर के लोगों ने अंततः अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों वाली संविधान सभा के माध्यम से विलय के संबंध में किसी भी विवाद को सुलझा लिया। किसी ने भी, यहां तक कि सबसे खराब आलोचक ने भी, कभी भी संविधान सभा की प्रतिनिधि प्रकृति पर संदेह नहीं किया है।
जम्मू-कश्मीर का संविधान बनने में 5 साल लगे
राज्य नेतृत्व और भारत सरकार के बीच 1950 के दिल्ली समझौते के बाद 1951 में संविधान सभा का गठन किया गया था। इस समझौते ने राज्य के भारत में विलय की शर्तों को रेखांकित किया और जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक संविधान सभा की स्थापना का प्रावधान किया। सितम्बर-अक्तूबर 1951 में जम्मू एवं कश्मीर कीे संविधान सभा का निर्वाचन राज्य के भविष्य के संविधान के निर्माण के लिए तथा भारत के साथ सम्बन्ध स्पष्ट करने के लिए किया गया था। रियासत की संविधान सभा के अध्यक्ष जस्टिस मेहरचन्द महाजन और इसके 75 सदस्य थे जो कि अपने-अपने क्षेत्रों से चुने गए थे।
संविधान सभा की पहली बैठक 31 अक्टूबर 1951 को हुई थी। जम्मू एवं कश्मीर के संविधान को बनने में कुल 5 वर्ष का समय लगा। 17 नवम्बर, 1957 को जम्मू एवं कश्मीर का संविधान अंगीकार किया गया तथा 26 जनवरी, 1957 को प्रभाव में आया था। 2002 तक, संविधान में 29 संशोधन किए गए। 2002 तक संविधान में 158 अनुच्छेद थे जो 13 भागों और 7 अनुसूचियों में विभाजित थे।
संविधान को अपनाने के बाद, जम्मू और कश्मीर ने अगस्त 2019 तक इसके प्रावधानों के तहत कार्य किया, जब भारत सरकार ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35ए को रद्द कर दिया, जिससे राज्य को पहले प्राप्त विशेष स्थिति और स्वायत्तता को प्रभावी ढंग से रद्द कर दिया गया और इसे पूरी तरह से एकीकृत कर दिया गया।
संविधान सभा का गठन
दरअसल महाराज हरिसिंह की 5 मार्च 1948 की उद्घोषणा के बाद 20 जून, 1949 को महाराजा द्वारा एक और घोषणा जारी की गई, जिसके द्वारा उन्होंने युवराज कर्णसिंह को अब तक प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियां प्रदान कर दी थीं और एक मई, 1951 को युवराज कर्णसिंह ने एक उद्घोषणा जारी की जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ निर्देश दिये थे कि जम्मू और कश्मीर राज्य के लिए संविधान बनाने के प्रयोजनों के लिए वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने गए लोगों के प्रतिनिधियों से मिलकर एक संविधान सभा का गठन किया जाएगा और चुनाव में मतदान प्रत्यक्ष और (द्वारा) गुप्त मतपत्र से होगा।
संविधान सभा को उसकी सदस्यता में किसी भी रिक्ति के बावजूद कार्य करने की शक्ति होगी। यह भी निर्देश था कि संविधान सभा अपना स्वयं का एजेंडा तैयार करेगी और अपनी प्रक्रिया के संचालन और अपने व्यवसाय के संचालन के लिए नियम बनाएगी।
संविधान सभा का संयोजक 1951 में विधानसभा का गठन राज्य के लोगों की इच्छा का स्वाभाविक परिणाम था कि लोगों द्वारा चुनी गई विधायिका के प्रति उत्तरदायी एक लोकतांत्रिक सरकार हो।
------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।