दुनिया में कहीं भी ऐसा दूसरा उदाहरण नहीं मिलता, जब किसी देश ने सौ बरस पहले कुछ लोगों के ख़िलाफ़ अपने अमानवीय बरताव के लिए इस तरह क्षमा याचना की हो। भारत ने इस शर्मनाक घटना की याद में भी 100 रुपए का सिक्का जारी किया था। दोनों घटनाओं में हिन्दुस्तान ने सौ रुपए का सिक्का जारी किया। ठीक वैसे ही जैसे हम राष्ट्रपिता महात्मागांधी और सरदार भगत सिंह जैसे सपूतों को याद रखने के लिए सम्मान में करते हैं। इतिहास की शर्मनाक - कलंकित घटनाओं को सम्मान सूचक प्रतीकों से याद करके हम अपनी नई पीढ़ी को क्या बताना चाहते हैं? गोरी रानी के मुकुट में जड़े कोहिनूर की वापसी की मांग भी हम झिझकते-शर्माते से करते हैं।
हम आज के नौजवानों को अंग्रेजों के काले कारनामें भी बताने में संकोच करते हैं। गोरी रानी आती है, जलियांवालाबाग जाती है, लेकिन दो लफ़्ज़ प्रायश्चित के नहीं बोलना-लिखना चाहती। इस ज़ुल्मी मानसिकता का मुक़ाबला सिक्के जारी करने से नहीं होता। इस हत्याकांड के जल्लाद गर्वनर ओ ड्वायर को बरसों बाद उसी की मांद में जाकर मारने वाले अमर शहीद सरदार ऊधम सिंह को ही हम आज तक कौन सा मान सम्मान दे पाए हैं ? शहीदों के बलिदान की विस्मयकारी कथाएं और ज़ुल्मों की क्रूर दास्तानें अगर हमारे ख़ून में हरारत पैदा नहीं करतीं तो देशभक्ति के नाम पर गाल बजाने का कोई अर्थ नहीं है।
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