सुबह की सैर से लौटने के बाद पेपर पढ़ते-पढ़ते अचानक से हमारा चटोरपन जागा और नियत लग गयी जा के कमबख्त इडली और नारियल की चटनी पर। अब हमारा ध्यान सीबीआई के घोटाले पर कम और इडली में ज्यादा लगा। सोचा सीधे सीधे कहेंगे तो ये दुनिया भर का तीन तिकड़म बता देगी, कोई और विकल्प देखा जाय और आ भी गया।
दोनों हाथो में दर्पण बने अखबार को मुंह के आगे से हटा एक तरफ करते हुए कहा कि अरे भाग्यवान, बहुत दिन से तुमने नाश्ते में वो गोल-गोल सफेद सी टिक्की जो भाप दे के बनाती हो, और गरी वाली चटनी के साथ खिलाती हो, वो नहीं खिलाई।
हे भगवान तुम्हे सीधी बात करना कब आएगा?
क्या मतलब।
अरे मतलब ये कि अगर तुम्हें इलाहाबाद बैंक तक जाना होता है तो सीधे नरही बाजार से नही जाओगे, पूरा घूम के जाओगे श्री राम टावर, अशोक मार्ग हो के।
तो अब ये इलाहाबाद बैंक कहां से आ गया बीच में।
वो ऐसे आया के अगर तुम्हें इडली खानी है तो सीधे से कहो, ये दुनिया भर की कहानी क्यों पढ़ा रहे हो मुझे।
अरे वो तो मैं वैसे ही तुमसे तफरीह ले रहा था, वो तो मैं जानता हूं के कहने भर की देर है जो मन है वो तुरन्त बनाती हो।
अच्छा अब ये भी सुन लो के कोई झांय झप्प न करना अब बनाने में, के चावल नही भीगा, दाल नही भीगी क्योंकि मैं जब परसो कैंटीन गया था तो एक साथ चार पैकेट इंस्टेंट इडली मिक्स ले आया था और दो पैकेट दही भी रखा है।
हां-हां वो तो मै देख के ही समझ गई थी के बस अब एक दो दिन में फरमाइश आने ही वाली है तुमसे।
तो जब सब जानती हो तो अब जल्दी से जाओ, कल तुमने रात में हमे प्राणेश्वर कहा था तुमने तो अब से तुम मेरी प्राणेश्वरी हो, इसलिए हे मेरी प्राणेश्वरी अब फटाफट जाओ और अपनी फैक्ट्री चालू कर दो।
ये चाय पियूं या आधी छोड़ दूं, जैसा कहो।
अरे मेरी मलिका, तुम पूरी चाय पियो, कहो तो और बना लाऊं।
बस अब तुम रहने दो ये सब ढकोसले करने को। जा रही हूं चाय पी के। आज दीपू नही दिख रही कहा है।
उसे आज कायदे से समझा के आयी हूं, के गुन्नी मुन्नी की मालिश कैसे करनी है, वही कर रही है।
इधर ये गयी, और हम भी उठे, नहा वहा के, कल अगर कोई गलती हुई हो तो उसकी माफी और आज का दिन मेरे परिवार के लिए शुभ हो, आपके आशीर्वाद से पूर्ण हो ये प्रार्थना कर, आ के जम गए अपने सिंहासन यानी बीच वाले सिंगल सीटर पर।
आते समय एक टेढ़ी नजर किचन पर भी मार ली थी और लग रहा था के बस अब ज्यादा देर नही लगेगी सुरमयी आवाज सुनने में।
अरे अब उठोगे भी के वहा से के वही धन्ना सेठ बने बैठे रहोगे, और बाद में बड़बड़ाओगे के ये तो यार ठंडी हो गयी।
सादर।
राजन प्रसाद
लेखक, लखनऊ फूडी ग्रुप के सक्रिय सदस्य हैं