खैर, इन्हीं उम्मीदों के बीच सौरव गांगुली ने कोलकाता में पहला डे-नाइट टेस्ट मैच करा दिया। सौरव ने इस मैच के सफल आयोजन के लिए जी तोड़ मेहनत की। कई कई घंटे खुद स्टेडियम में मौजूद रहे। पूरे शहर को गुलाबी बना दिया। 40 हजार से ज्यादा लोग टेस्ट मैच देखने पहुंचे। यानी सौरव गांगुली ने बतौर बोर्ड अध्यक्ष अपने पहले ही ओवर में शानदार शॉट्स लगा दिए। उन्होंने दिखा दिया कि भारत में क्रिकेट की सूरत शक्ल बदलने वाले जगमोहन डालमिया से उन्होंने सिर्फ़ स्नेह ही हासिल नहीं किया बल्कि उन्होंने उनसे ‘प्रोफेशनली’ भी काफी कुछ सीखा है। लिहाजा अगर सौरव गांगुली को कोर्ट से ‘एक्सटेंशन‘ मिल जाता है तो किसी को अखरेगा नहीं। परेशानी इस बात की है कि कहीं इस बदलते नियम की आड़ में एक बार फिर क्रिकेट पूरी तरह कुछ ‘ख़ास’ लोगों की गिरफ़्त में ना आ जाएं।
आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के खुलासे के बाद क्रिकेट में सुधार को लेकर खूब हो हल्ला हुआ। बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। कोर्ट ने लोढ़ा समिति बनाई। लोढ़ा समिति की सिफारिशों में ही कहा गया कि अब कोई भी पदाधिकारी 6 साल के बाद अपने पद पर काबिज नहीं रह सकता। इसके बाद एक कूलिंग ऑफ पीरियड होगा जिसे पूरा करने के बाद भी वो उस पद पर तय प्रक्रिया से चुने जाने के बाद लौटेगा। सौरव गांगुली पिछले पांच साल से क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल से जुड़े हुए हैं इसलिए उन पर भी ये नियम लागू होता है। बोर्ड के मौजूदा पदाधिकारियों में सचिव जय शाह पर भी ये नियम लागू होता है क्योंकि वो भी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन से जुड़े रहे हैं और करीब पांच साल का वक्त बीता चुके हैं।
ऐसा नहीं है कि लोढ़ा समिति और बाद में विनोद राय की अध्यक्षता वाली कमेटी ने क्रिकेट में बेहतरी के जितने नियम बनाए वो सब के सब बेहतर थे। उनमें से कई नियम ऐसे थे जिनका नुकसान ही हो रहा है, लेकिन अभी उन नियमों की प्रासंगिकता और फायदे की बात छोड़ देते हैं। इस बात को समझते हैं कि लोढ़ा समिति ने अगर कुछ सख्त नियम बनाए थे तो उसके पीछे तार्किक वजहें थीं।
क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेशन में पारदर्शिता ना के बराबर रह गई थी। बंद कमरों में फैसले होते थे। अलग अलग राजनीतिक दलों वाले नेता जो एक दूसरे का मुंह देखना नहीं पसंद करते थे वो भी बंद कमरे में गले मिलकर सब कुछ तय कर लेते थे। बीसीसीआई के पदाधिकारी अपने मन से नियम बनाते थे। बदलते थे। ऐसा नहीं है कि लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद सबकुछ बिलकुल पटरी पर आ गया।
बोर्ड के मौजूदा सदस्यों में भी ऐसे नाम हैं जिन्हें सब कुछ विरासत में मिला है। बावजूद इसके नियमों का एक डर तो दिखता है। आज अगर एक नियम में बदलाव की सिफारिश हुई है तो कल और भी नियमों में बदलाव की सिफारिश होगी। हितों के टकराव से लेकर आयु सीमा तक हर नियम बदलने की कोई ना कोई वजह खोजी जाएगी। ऐसे में डर इस बात का होगा कि कहीं भारतीय क्रिकेट फिर उसी गर्त में ना पहुंच जाए जहां मजबूर होकर बात अदालत तक पहुंची थी।
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