रीसैट 2बीआर1 का डिफेंस इंटेलिजेंस सेंसर भारत में ही बनाया गया है जिससे रात में भी तस्वीरें ली जा सकती हैं।
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सीमापार की गतिविधियों पर नजर
यह उपग्रह अपनी कक्षा में स्थापित होने के साथ ही काम करना शुरू कर देगा और कुछ देर बाद ही इससे तस्वीरें मिलनी शुरू हो जाएंगी। यह उपग्रह किसी भी मौसम में बेहद साफ तस्वीरें ले सकेगा। बादलों की मौजूदगी में भी यह दुश्महन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेगा। यही नहीं इससे आपदा राहत कार्यों में भी भरपूर मदद मिलेगी।
रीसैट 2बीआर1 का डिफेंस इंटेलिजेंस सेंसर भारत में ही बनाया गया है जिससे रात में भी तस्वीरें ली जा सकती हैं। इसकी मदद से भारतीय सीमाओं की निगरानी और उनकी सुरक्षा को अभेद्य बनाने की प्लानिंग आसान हो जाएगी।
सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने कहा कि यह सफलता इसरो के सफर में मील का पत्थर साबित होगा। इमेजिंग सैटेलाइट, माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी पर काम करेगा,साथ ही एक्स बैंड एसएआर कैपेबिल्टी के चलते हर मौसम में साफ तस्वीर देगा।
इसरो इस साल अप्रैल और मई 2019 में 2 सर्विलांस सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है। 22 मई को सर्विलांस सैटेलाइट रीसैट-2 बी और एक अप्रैल को ईएमआईसैट लॉन्च किया गया था। इनका मुख्य काम दुश्मनों की रडार पर नजर रखना है।
इस्राइल के छात्रों ने किया बड़ा काम
इस अभियान में इसरो पीएसएलवी सी-48 के जरिए इस्राइल के तीन छात्रों की तरफ से डिजाइन की गई ‘डूचीफैट-3’ सैटेलाइट को भी लॉन्च किया गया। दक्षिण इस्राइल के अशांत गाजा पट्टी क्षेत्र से महज एक किमी दूर स्थित शा हनेगेव हाईस्कूल के इन तीनों छात्रों एलोन अब्रामोविच, मीतेव असुलिन और शमुएल अविव लेवी की उम्र 17 से 18 वर्ष के बीच है।
इन्होंने इस सैटेलाइट को हर्जलिया साइंस सेंटर और अपने स्कूल के साथ मिलकर बनाया है। छात्रों के मुताबिक, इस रिमोट सेन्सिंग फोटो सैटेलाइट से देश भर के बच्चों को पृथ्वी को देखने और विश्लेषण करने की सुविधा मिलेगा। साथ ही किसानों को भी इसका लाभ होगा।
उपग्रह की योजना, अंतरिक्ष में उसकी कार्यप्रणाली और जमीन से सॉफ्टवेयरों के जरिए उससे संपर्क आदि को छात्रों ने ही तैयार किया। यह केवल 2.3 किलो का है। इसे तैयार करने में करीब ढाई वर्ष लगे। कुल 60 विद्यार्थियों ने मिलकर इसे तैयार किया है। छात्रों ने कम बजट के बावजूद उपग्रह से डाटा ट्रांसफर सुनिश्चित करने के लिए उपग्रह द्वारा ली जाने वाली तस्वीरों को कंप्रेस करके पृथ्वी पर भेजने की तकनीक का उपयोग किया है।
कमर्शियल लान्चिंग में इसरो का दबदबा
छोटे उपग्रहों को लॉन्च करने में महारत हासिल कर चुकी इसरो ने अब तक सैटेलाइट लॉन्चिंग के जरिए काफी कमाई की है। पीएसएलवी से उपग्रह प्रक्षेपण का खर्च लगभग 100 करोड़ रुपए आता है। 9 विदेशी उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत ने 300 से ज्यादा विदेशी सैटेलाइट लॉन्च करने का आंकड़ा पूरा कर लिया है।
ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी साल दर साल बढ़ रही है। विदेशी सैटेलाइट इतनी कम कीमत में लॉन्च् करने के कारण ही अमेरिका अपने उपग्रह इसरो से प्रक्षेपित करवा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस लॉन्च के सफल होने से दुनिया भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा। साथ ही कमर्शियल लान्चिंग में हमारी पहचान और मजबूत होगी।
मुश्किल है एक साथ ज्यादा उपग्रहों की लॉन्चिंग
इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं। बेहद तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरूरत पड़ती है।
हर सेटेलाइट तकरीबन 7.5 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से प्रक्षेपित होता है। अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बेहद फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वेल्यू में लगातार इजाफा हो रहा है। इससे लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।
कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनिया का हमारी स्पेस टेक्नॉलाजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लॉचिंग भारत से करा रहें है। फ़िलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान,संचार तकनीक,परमाणु ऊर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहें है बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गए हैं।
अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ रही है। इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोडा है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लाँच करने से मन कर दिया था। आज स्तिथि ये है कि अमेरिका सहित तमाम देश न सिर्फ भारत से अपने उपग्रह प्रक्षेपित करा रहें हैं बल्कि आगे भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक भी है।
अब पूरी दुनिया में सैटलाइट के माध्यम से सैन्य निगरानी, टेलीविजन प्रसारण , मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है।
हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहाँ भारत के लिए बहुत संभावनाएं है।
कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा। कुलमिलाकर इमेजिंग सैटेलाइट रीसैट के सफल प्रक्षेपण से देश का सैन्य निगरानी तंत्र बेहद मजबूत होगा।
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