चंद्रयान-2, भारत का मिशन चांद
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चन्द्रयान -1
कवियों ने कल्पना में चन्द्रमा के बारे में बहुत कुछ लिखा है लेकिन भारतीय वैज्ञानिक भी इसे समझने में पीछे नहीं रहे। इसरो ने चन्द्रयान-1, 12 अक्टूबर 2008 को चन्द्रमा की ओर भेजा, यह 30 अगस्त 2009 तक चन्द्रमा की परिक्रमा करता हुआ सक्रिय रहा। इसकी मुख्य सफलता चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की खोज थी, बाद में इसकी पुष्टि नासा ने भी की।
चन्द्रयान-2
22 जुलाई 2019 को दूसरो ने अपनी महत्वाकांक्षी मिशन चन्द्रयान-2 को श्री हरिकोटा के सतीश धवन अन्तरिक्ष से सफल प्रक्षेपण किया। इसे भारत के सबसे ताकतवर जीऐसएलवीमार्क III राकेट से लांच किया गया जिसे ’ बाहुबली’ नाम से भी जाना जाता है।
इस अभियान के मुख्य घटक ओर्बिटर (कक्षयान), लैंडर (विक्रम) और रोवर ( प्रज्ञान) है। चन्द्रयान 6 या 7 सितम्बर को चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। इसका कुलभार 3,877 किलोग्राम है और लगभग 978 करोड़ रुपयों की की लागत आएगी।
पहले इस अभियान के लैंडर और रोवर को रूस में विकसित किया जाना था, लेकिन रूस के वैज्ञानिक समय की कमी के कारण ऐसा नहीं कर सके। इस तरह इसे भारतीय वैज्ञानिकों ने ही विकसित किया, अब यह अभियान पूरी तरह स्वदेशी है।
लैंडर ’ विक्रम’ कक्षयान में अलग होकर चन्द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैडिंग करेगा और छः पहियों वाला रोवर ’प्रज्ञान’, लैंडर से निकलकर चन्द्रमा पर घूमता हुआ सूचनाएं एकत्रित करेगा। यही सूचनाएं पृथ्वी पर इसरो की प्रयोगशाला में पहुंचेगी।
इसरो के मिशन चन्द्रयान -1 ने स्पष्ट कर दिया था कि चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी है।
- फोटो : ISRO
चन्द्रयान-2 दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों उतरेगा?
इसरो के मिशन चन्द्रयान -1 ने स्पष्ट कर दिया था कि चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी है। उसी खोज की और अधिक पुष्टि करने के लिए इस ध्रुव पर उतरने का एक उद्देश्य है। चन्द्रमा का एक भाग जिस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता है वहां तापमान 130 सैल्सियस होता है, जिस भाग पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता वहां तापमान -180 सैल्सियस तक पहुंच जाता है।
चन्द्रमा के दक्षिणी भाग पर स्थायी रूप से छाया ही पड़ी रहती है। यहां पर तापमान में अधिक परिवर्तन नहीं आता है। इस वजह से यहां पानी, बर्फ, खनिज, पदार्थ ( कैल्सियम, मैग्नीसियम, लोहा ) पुराने अवशेष मिल सकते हैं।
यहां हीलियम के मिलने की भी संभावना है, लेकिन यहां शोध करना अत्यंत जोखिम भरा काम है। दक्षिणी ध्रुव पर कई केटर्स (गट्टे, कन्दराएं आदि) जहां सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाती है और अंधेरा होता है। इन्ही दुर्गम परिस्थितियों के कारण अमेरिका, रूस और चीन के वैज्ञानिकों ने भी यहां यान उतारने का साहस नहीं किया। चन्द्रयान-2 बड़ी सटीकता के साथ दो क्रेटरों मजिनस सी और सिमपेलियस एन के बीच में समतल मैदान पर उतरेगा।
चन्द्रयान-2 का नेतृत्व नारी शक्ति के हाथ
इस मिशन की कमान दो महिलाओं के हाथ में है। पूरी परियोजना के लिए जिम्मेदार निदेशक मुथैया वनिता है। वे इलैक्ट्रॉनिक्स सिस्टम इंजीनियर है। इस मिशन की निदेशक रितु करिधाल श्रीवास्तव है। रितु ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से ऐयरो स्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।
चन्द्रयान-2 का कार्य और कार्यकाल
चन्द्रयान -2 चन्द्रमा के भौगोलिक वातावरण, हीलियम गैस, बर्फ, पानी खनिज तत्वों ( कैल्सियम, मैग्नीसियम, लोहा आदि) वातावरण की बाहरी परत, पुराने अवशेष आदि की जानकारी एकत्रित करेगा। यह जानकारी दक्षिणी ध्रुव पर बेहतर और कारगर ढंग से मिल सकती है।
चन्द्रमा पृथ्वी से बहुत छोटा है, पर चन्द्रमा का एक दिन पृथ्वी के 29 दिनों के बराबर होता है। लैंडर और रोवर दिन के समय सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल करेंगे। इस तरह लैंडर और रोवर को पृथ्वी के 14 दिनों के लिए ही डिजाइन किया गया है। ये अल्पकाल में अत्यधिक जानकारियां भेजकर चन्द्रमा की सतह पर ही विलीन हो जाएंगे। फिर ये न कोई सूचना भेज पाएंगे न हम इनके बारे में कुछ जान सकेंगे।
हां, ऑर्बिटर (कक्षयान) एक साल तक चन्द्रमा की परिक्रमा करता रहेगा। इसके बाद इसरो की 2020 तक सूर्य मिशन आदित्य एल-1 को अंजाम देने की योजना है।
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