किसानों के शोषण के खिलाफ हुई थी शुरुआत
माओवाद दरसअल पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से जमीनदारों द्वारा किसानों के शोषण के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के रूप में 70 के दशक में शुरू हुआ था। तब इसके पीछे चारू मुजुमदार, कनु सान्याल जैसे साम्यवादियो का राजनीतिक दर्शन भी था। इसे चीन का भी समर्थन था। माना गया कि पुरानी और सामंती व्यवस्था को लोकतांत्रिक तरीकों के बजाए रक्त क्रांति से ही बदला जा सकता था। तब के युवा, जिनका आजादी के बाद देश में बने हालात से मोहभंग हो रहा था, इस माओवादी विचार की तरफ तेजी से आकृष्ट हुए।
यह समझे बगैर कि भारत और चीन की तासीर में बहुत अंतर है। माओवादियों ने जिस ‘जन संघर्ष’ का नारा दिया, वह हमेशा एक सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ पाया। कांग्रेस की सरकारों ने माओवादियो के प्रति नरम या मिला जुला रवैया अपनाया हुआ था, बावजूद इसके कि छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में माओवादियो ने हमला कर राज्य में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं का सफाया कर दिया था।
अलबत्ता आंध्र और तेलंगाना में जरूर कुछ सख्ती दिखाई। यह भी कोशिश हुई कि माओवादियों से बातचीत कर उन्हें मुख्य धारा में लौटाया जाए। लेकिन वह भी नाकाम रही।
इस मामले में मोदी सरकार और भाजपा का रवैया बहुत साफ है। उनका मानना है कि गोली का जवाब गाल सहलाना नहीं हो सकता। माओवाद को खत्म करने के लिए उसकी जड़ों पर चोट जरूरी है। इसलिए सुरक्षा बलों का नक्सल प्रभावित राज्यों में संयुक्त अभियान शुरू किया गया। उन्हें घने जंगलों में घुसने के लिए अत्याधुनिक उपकरण, ट्रेनिंग और हथियार दिए गए। उससे भी बढ़कर माओवादियों के खात्मे में उन पूर्व माओवािदयों का भरपूर सहयोग लिया गया जो आत्म समर्पण कर चुके थे। उनकी अलग से फोर्स बनाकर माओवाद के खात्मे के काम पर लगाया गया।
‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ के रूप में उनकी भर्तियां पुलिस बल में की गईं। इनमें महिला पूर्व नक्सली भी शामिल हैं। यह रणनीति सबसे कारगर साबित हुई। आज जो बड़ी संख्या में माओवादी मारे जा रहे हैं, उनमें इन पूर्व माओवादियों का बड़ा योगदान है। इसके अलावा सरेंडर करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की प्रभावी और सकारात्मक नीति भी माओवाद की कमर तोड़ने में कारगर साबित हुई है।
सालों तक जंगलों की खाक छानने वाले कई नक्सली अब मुख्य धारा में लौटकर सुकून के साथ जिंदगी जीना चाहते हैं। एक आत्म समर्पित माओवादी का यह बयान अहम है कि नई पीढ़ी की दिलचस्पी अब क्रांति से ज्यादा मोबाइल, बाइक और गर्लफ्रेंड में है।
‘आपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’
दरअसल बीती 21 मई को छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षाबलों ने ‘आपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ के तहत 27 माओवादियों को घेरकर मार गिराया। इनमें माओवादियों के संगठन सीपीआई(माओवादी) का महासचिव और नक्सल आंदोलन की रीढ़ नंबाला केशवराव उर्फ बसवराजू भी शामिल था। बसवराजू एक इंजीनियर था और माओवादी विचारधारा से प्रेरित होकर नक्सली बना था। उस पर सरकार ने 1 करोड़ रु. का इनाम रखा था और जो 150 जवानों की हत्या का आरोपी था। उसी ने और सीपीआई (माओवादी) की सशस्त्र शाखा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) को मजबूत करने का काम किया था।
पीएलजीए का गठन 2000 में कई छोटे-छोटे नक्सलियों के गुटों के विलय के बाद हुआ था। बसवराजू के खात्मे को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘नक्सलवाद ख़त्म करने की लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि’ बताया। इसी अभियान में 54 माओवादियों को गिरफ्तार भी किया गया। इसके पहले दूरस्थ कुरेगुट्टा पहाड़ी मे माओवादियों के ठिकानों को घेरकर सुरक्षा बलों ने 31 माओवादियो को मौत के घाट उतारा था। उनसे बड़ी संख्या में हथियार भी बरामद किए थे।
पुलिस ने यह भी दावा किया कि इस वर्ष के पहले चार महीनों में 700 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। इस बीच सुरक्षा बलों का दावा है कि माओवादियों का ‘रेड काॅरिडोर’ तो दूर, खुद माओवाद चार राज्यों के छह जिलो तक सीमित रह गया है। ये राज्य हैं, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और झारखंड। सरकार के मुताबिक देशभर में माओवाद प्रभावित ज़िलों की संख्या 126 से घट कर अप्रैल 2018 में 90 रह गई थी, जुलाई 2021 में ऐसे ज़िलों की संख्या 70 हो गई और अप्रैल 2024 के आंकड़ों के अनुसार माओवाद प्रभावित जिलों की संख्या महज 38 रह गई है।
माओवाद अंतिम सांसें गिन रहा है?
तो क्या अब सचमुच माओवाद अंतिम सांसें गिन रहा है? इसका उत्तर ‘हां’ में देना अभी जल्दबाजी होगी। कुछ लोग सुरक्षा बलों की कार्रवाई की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठा रहे हैं। सुरक्षाबलों को नुकसान भी झेलना पड़ा है। साथ ही माओवाद पर लगाम कसने का राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ भी शुरू हो चुकी है। लेकिन क्या माओवादी अब थक चुके हैं? यह अभी गारंटी से नहीं कहा जा सकता। कुरैगुट्टा पहाड़ी पर नक्सलियों के घिरने के बाद माओवादियों ने छग सरकार के साथ शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा था, जिसे सरकार ने यह कहकर ठुकरा दिया कि या तो नक्सली हथियार डालें या फिर मरने के लिए तैयार रहें।
नक्सलियों की इस पहल को उनके बिखर रहे संगठन को फिर से जमाने के लिए जरूरी इंटरवल के रूप में भी देखा गया। इसका अर्थ यही नहीं कि उनकी कमर पूरी तरह टूट गई है। कहीं न कहीं से उन्हें ऊर्जा अभी भी मिल रही है। जानकारों का कहना है कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित माओवादी संगठन का भी एक सुव्यवस्थित ढांचा है, एक तय व्यवस्था है जिसमें एक के जाने से दूसरे के लिए जगह बनती है। यानी एक बसवराजू मरेगा तो दूसरा उसकी जगह ले लेगा।
लिहाजा माओवाद को खत्म करना है तो किसानों, आदिवासियों और शोषित समूहों की उन समस्याओ का निदान भी करना पड़ेगा, जिनकी वजह से माओवाद पनपा। जहां तक मप्र की बात है तो माओवाद राज्य के केवल छग और महाराष्ट्र से लगे कुछ जिलों तक सीमित है, लेकिन वहां भी सरकार की नीति जीरो टाॅलरेंस वाली है। विकास की रोशनी जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, नक्सलियों का असर घटता जा रहा है।
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