केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की स्त्रियां यौन उत्पीड़न, बलात्कार की चपेट में हैं।
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निर्भया से पहले की एक और गंभीर घटना, जो प्रमुखता से दर्ज हो सकी थी, वह थी- केरल के सूर्यनेल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना। साल 1996 में हुई इस घटना में 16 वर्ष की बच्ची का अपहरण करके 40 दिन तक 42 लोग बलात्कार करते रहे। अफसोस कि उस घटना पर कोई कड़ी सजा नहीं निर्मित हुई।
- तो क्यों न जनता ये समझ बैठे कि कानून और सत्ता की मिलीभगत चल रही?
- क्यों न मान लेंं कि कठुआ, उन्नाव जैसी कितनी और घटनाओं पर कोई बात नहीं हुई?
- जिन घटनाओं पर बात भी हुई उसे कितना न्याय मिला?
ऐसे में यदि मानवीय साइकोलॉजी को समझें तो वो फांसी को एक अच्छा हथियार मानकर क्षणिक ही सही खुशी मनाएगा। हमारे देश का स्ट्रक्चर ही इस कदर निर्मित है, जहां स्वभाव और विचारों में बदलाव जल्दी संभव नहीं। लेकिन पूरी स्थितियों को साफ करके देखा जाए तो फांसी निदान नहीं और ये बात लोग भी धीरे-धीरे समझने लगे हैं।
यह हैरानी की बात नहीं कि केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया की स्त्रियां यौन उत्पीड़न, बलात्कार की चपेट में हैं। दक्षिण अफ्रीका आबादी में भारत के मुकाबले छोटा है लेकिन यहां हर साल बलात्कार के 60,000 मामले दर्ज होते हैं, लेकिन उन पर कोई खास सुनवाई नहीं। दक्षिण अफ्रीका की लड़कियां भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं।
ब्रिटेन में बलात्कार की खबर को एक अखबार ने इस तरह रिपोर्ट किया- 'Rape the figures that shame Britain ( बलात्कार: आंकड़े जो ब्रिटेन को शर्मिंदा करते हैं)। भारत में जब रिपोर्टिंग होती है तो 'कहां कम', 'किसके शासनकाल में कितना ज्यादा' से तुलना करते हुए बात खत्म की जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार भारत में हर 54वें मिनट में एक 'फीमेल' के साथ बलात्कार होता है। फीमेल इसलिए कहा जा रहा, क्योंकि बलत्कृता तीन माह और तीन साल के उम्र की भी है, जिन्हें स्त्री तो नहीं कह सकते हां बच्ची कह सकते हैं।
बलात्कार के आंकड़े देखा जाए तो 'नेशनल क्राइम ब्यूरो रिपोर्ट जो कि 1 जनवरी 2020 के आंकड़े के आधार पर है, इसमें 3.78 लाख पीड़ितों के रिकॉर्ड मामले दर्ज किए गए। साल 2018 की रिपोर्ट बताती है कि राज्यों में मध्य प्रदेश और राजधानी दिल्ली में बलात्कार पीड़ितों की सबसे ज्यादा संख्या है।
इन सारी बातों और आंकड़ों के बाद बात एक तरफ आकर ठहर जाती है। क्या इस तरह आंकड़े जुटाकर, कहीं ज्यादा और कहीं कम बताकर इस अमानवीय प्रवृति से छुटकारा पाया जा सकता है? आंकड़ों में भी थोपने नहीं समाधान की बात होनी चाहिए, बलात्कार की सजा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
दरअसल, फांसी की सजा के बावजूद कानून, बलात्कारियों की मानसिकता में कोई खौफ पैदा करने में असमर्थ रहा है। यह निर्णय पीड़िता के परिवार भावुकता के आधार पर न लें और बलात्कारियों के लिए आजीवन कारावास के तहत कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान हो।
यह सुनिश्चित हो कि उनका अपराध सिद्ध होने पर उनके हिमायत में उन्हें बाहर की आवाज सुनने की, लोगबाग, सड़क या पेड़-पौधे वगैरह देखने की इजाजत न हो। और तो और उन्हें सूरज और चंद्रमा देखने की भी इजाजत कभी न मिले।
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