क्यों कांग्रेस छोड़ सकते हैं सिंधिया?
सवाल यह है कि क्या वाकई सिंधिया कांग्रेस छोड़ सकते हैं? मप्र औऱ राष्ट्रीय परिदृश्य के हिसाब से आंकलन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि आज सिंधिया के लिए कांग्रेस में उनके कद के लिहाज से कोई भविष्य नजर नहीं आ रहा है। वे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं उसके अनुरूप आने वाला समय उनकी जमीनी सियासत के लिए लगातार कठिनतर होने वाला है।
लोकसभा जाने के लिए उनके सामने गुना औऱ ग्वालियर दो ही विकल्प हैं लेकिन गुना से अप्रत्याशित हार ने उनके परिवार के अपराजेय होने के मिथक को तोड़ दिया है। जाहिर है ऐसे में अब बीजेपी भी आगे इस मानसिकता से नहीं लड़ेगी की सिंधिया कभी नहीं हारते हैं।
दरअसल, देशव्यापी माहौल जिस तरह से कांग्रेस के विरुद्ध निर्मित हो रहा है वह भविष्य में सिंधिया की राह को औऱ भी मुश्किल बनाएगा क्योंकि उनके साथ कोई जातिगत बैक नहीं है।
मोदी शाह की नई बीजेपी जिस रास्ते औऱ दर्शन को लेकर आगे बढ़ रही है वह फिलहाल विपक्षी नेताओं के लिए अस्तित्व के सवाल खड़े कर रही है। लगातार दूसरी ऐतिहासिक पराजय के बावजूद कांग्रेस के राजनीतिक दर्शन में कोई बुनियादी बदलाव आता हुआ नजर नहीं आ रहा है। खासकर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को लेकर पार्टी की सोच ने कम से कम हिंदी बैल्ट में तो वोटर्स को फिलहाल अपने से काफी दूर कर लिया है।
370 पर सिंधिया का स्टैंड
मप्र का ग्वालियर चंबल से लेकर मालवा तक का इलाका आरम्भ से ही हिन्दू सेंटिमेंट वाला रहा है। कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर संसद और संसद के बाहर कांग्रेस पार्टी के स्टैंड ने सिंधिया जैसे नेताओं को परेशान कर रखा है। इस मामले पर पार्टी की अधिकृत लाइन से परे जाकर जिस तरह सिंधिया मोदी सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई दिए हैं तो इसके सियासी निहितार्थ सिंधिया की भविष्य की राजनीति से जुड़े भी हो सकते हैं।
370 पर देश का मानस पढ़ने में जो भूल कांग्रेस ने की है उसका अहसास चुनाव हारे सिंधिया जैसे नेताओं को बखूबी है और वे समझ रहे हैं कि आने वाला समय उनकी चुनावी राजनीति के लिए कितना चुनौती भरा होने वाला है, तब जबकि बीजेपी से ज्यादा चुनौती उन्हें कांग्रेस में ही मिलनी है।
जाहिर है मप्र की सियासत का यह ग्लैमरस फेस मोदी शाह की नई बीजेपी में अपनी भूमिका के बारे में सोचता है तो कोई राजनीतिक अजूबा नहीं होना चाहिए, क्योंकि उनके पिता ने भी अपनी सियासत का ककहरा जनसंघ की अंगुली पकड़कर इसी गुना शिवपुरी से सीखा था, लेकिन तब मुख्यधारा की राजनीति और क्षेत्रीय विकास के नाम पर वे जनसंघ को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया तो बीजेपी की संस्थापक औऱ लंबे समय तक फाइनेंसर रही हैं। राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे औऱ मप्र में यशोधरा राजे पहले से ही बीजेपी में प्रभावी पोजिशन पर हैं।
अब अगर वे वाकई मोदी शाह की बीजेपी में जाने का मन बना रहे है तो मप्र की सियासत में बड़ा घटनाक्रम ही होगा। वैसे दावा किया जा रहा है कि मप्र में वे सीएम भी हो सकते हैं लेकिन विजय बहुगुणा, (उत्तराखंड) हिमंता शर्मा, (आसाम)सुखराम,(हिमाचल)एसएम कृष्णा,(कर्नाटक)चौधरी वीरेन्द्र सिंह(हरियाणा) जैसे कई उदाहरण भी इन 6 साल में बीजेपी में हमारे सामने हैं। लेकिन रघुवर दास,योगी आदित्यनाथ, मनोहर लाल खट्टर भी मोदी शाह बीजेपी के ही उदाहरण हैं।
बहरहाल सिंधिया से जुड़ी इन खबरों ने मप्र का सियासी पारा इन दिनों ऊपर कर रखा है। 370 पर मोदी के साथ खड़े होकर सिंधिया ने एक तार्किकता को तो गढ़ ही लिया है अगर वे बीजेपी में आते हैं।
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