लद्दाख की गलवां घाटी में सोमवार रात चीनी सैनिकों के साथ हिंसक टकराव में सेना के सीओ रैंक के एक अधिकारी समेत 20 जवान शहीद हो गए। देर रात सेना से 20 जवानों के शहीद होने की पुष्टि की। सीमा पर हुए खूनी संघर्ष में चीन के 43 सैनिक हताहत हुए हैं। इनमें मृतक और गंभीर रूप से घायल चीनी सैनिक शामिल हैं। इस घटना के बाद पूरे इलाके में सेना ने सतर्कता तथा चौकसी बढ़ा दी है। चीन सीमा पर 45 साल बाद इस तरह की हुई यह पहली घटना है। इससे पहले 1975 में अरुणाचल प्रदेश में तुलुंग ला में संघर्ष हुआ था जिसमें चार जवान शहीद हुए थे।
बहरहाल, चीन की इस हरकत के बाद पूरे देश में चीन सामान के प्रति गुस्सा है। कई शहरों में चीनी सामान के बहिष्कार की खबरें भी आ रही हैं। एक तरह से देखा जाए तो युद्ध के अतिरिक्ति भारत के लिए चीन से निपटने के कई और रास्ते हैं और उनमें से एक चीनी सामान का बहिष्कार भी है।
जब से भारत समेत समूची दुनिया में कोरोना संक्रमण फैला है, तब से चीन के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा विश्व समुदाय में है। भारत का जन मानस भी उबल रहा है। वजह यह है कि कोरोना वायरस के बारे में यह जानने में आ रहा है कि इसे चीन के उसी वुहान शहर की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, जहां सबसे पहले संक्रमण फैला था।
इस फैसले के साथ ही यह बात भी उठ रही है कि चीन को सबक सिखाना चाहिए जिसमें चीन के साथ व्यापार संबंध कम करने या समाप्त करने तक की बातें हो रही हैं।
हम जानते हैं कि इस तरह के मसलों में लोगों का गुस्सा तात्कालिक ज्यादा रहता है। अभी कुछ ज्यादा इसलिए भी है कि तालाबंदी के चलते लोग-बाग घरों में बंद हैं तो सोचने के लिए अनेक विषय हैं।
बहरहाल, इस समय सच-झूठ के चक्कर में न पड़ते हुए यह देखें कि क्या व्यावहारिक रूप से चीनी सामान का उपयोग, खरीदारी बंद की जा सकती है? इतनी आसानी से तो नहीं जितना हम सोचते हैं, लेकिन असंभव कुछ भी नहीं है, यह भी ध्यान रखना होगा। जब सवाल देश की अस्मिता का हो तो कोई भी फैसला लेना संभव हो जाता है।
फिर भी हमें यह देखना चाहिए कि तत्काल तो किसी भी तरह से चीनी सामान का बहिष्कार किया नहीं जा सकता। तो क्या हमें इसके आर्थिक मकड़ जाल में उलझे रहना होगा? नहीं, ऐसा भी नहीं है। इसे तर्कसंगत तरीके से कम करना होगा।
दरअसल, इसके लिए पहली अनिवार्य शर्त तो यह है कि हम कृत संकल्पित हों कि हमें चीन माल से छुटकारा पाना है। इस पर दृढ़ रहें। इसके साथ ही बारी आती है उस सबसे अहम मुद्दे की कि हमने ऐसा किया तो हमारे पास विकल्प क्या हैं? क्या हम किसी और देश से वह सामान बुलाना प्रारंभ कर देंगे जो अभी चीन से रहा है तो क्या फर्क रहेगा?
ये सांप-सीढ़ी के खेल की तरह जटिल और बेहद उलझे हुए मसले हैं, जिनमें हम 99 पर जाकर एक पर लौट आते हैं। सबसे पहले तो हम यह समझ लें कि यह भावनात्मक मसला नहीं है, भले ही हम चीनी सामान के बहिष्कार का फैसला भावुकता के पलों में लें।
इस पर व्यवहारिक अमल व्यवहारिक तरीके से ही करना होगा। यह ठीक है कि एक बार फैसला ले लें तो फिर किसी नुकसान की चिंता न करें। नुकसान केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामरिक भी हो सकता है।
जिस तरह फन कुचला सांप दुगने गुस्से से डंसने का प्रयास करता है, वैसा ही चीन अपनी अर्थव्यवस्था को छेडऩे वाले के साथ भी करेगा ही। इस वक्त चारों तरफ से आलोचना का शिकार हो रहा चीन किसी से भी सीधे युद्ध के लिए न तो कतई तैयार होगा, न युद्ध करना चाहेगा।
हां, धमकाने का काम वह बखूबी करता ही रहता है। धमकाने में तो वह अमेरिका को भी नहीं छोड़ता। इस समय चीन में भी काम-धंधे 2019 की तरह नहीं चल रहे हैं। अंदर से आ रही खबरें तो बता रही हैं कि चीन भी समूची दुनिया की तरह मंदी का शिकार है। उसके यहां भी कारखाने धुंआ नहीं उगल रहे।
बेरोजगारी पसर रही है। मांग और पूर्ति का तालमेल बुरी तरह से गड़बड़ाया हुआ है। चीन के शासकों को डर सता रहा है कि ये हालात लंबे समय तक रहे तो लोगों का गुस्सा सड़कों का रूख कर सकता है।
हालांकि चीन थ्यानमन चौक जैसे हालात से निपटना जानता है, जब उसने 1989 में लोकतंत्र की मांग को लेकर 15 अप्रैल से 4 जून तक चले छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए टैंक और 3 लाख सैनिक सडक़ पर उतार दिए थे, जिसमें चीन में पदस्थ तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत के मुताबिक अनुमानत: दस हजार लोग मारे गये थे। उनमें से अनेक की लाशें भी नहीं मिली थीं।
बावजूद उस पृष्ठभूमि के इस वक्त चीन की कोशिश यही रहेगी कि देश में ऐसी नौबत नहीं आए। इसलिए वह पड़ोसी मुल्कों के साथ छोटा-मोटा पंगा करने की फिराक में है। ताइवान के लिए युद्धपोत रवाना कर दिए हैं तो हांगकांग की भी घेराबंदी कर रहा है।
भारत को परेशान करने के लिए नेपाल के साथ हमारे सीमा विवाद को हवा दे रहा है तो लद्दाख की सीमा पर सेना का जमावड़ा बढ़ा रहा है और उसके सैनिक भारतीय सेना के जवानों से छोटी-छोटी बातों के लिए विवाद कर रहे हैं, ताकि वे भड़कें और चीन को मौका मिल जाए। भारतीय सैनिक संयम बरतते हुए जवाब दे रहे हैं।