फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गलवां घाटी भारत-चीन झड़प: चीनी सामान का बहिष्कार रास्ता है मंजिल नहीं, लेकिन ड्रैगन की मुश्किलें बढ़ जाएंगी

सार

यह ठीक है कि कोई भी देश स्वदेशी उत्पादों का उपयोग कर वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकता है, लेकिन वह विदेशी उत्पादों से पूरी तरह बच भी नहीं सकता। हमें इस दिशा में बहुत काम करना होगा। एक तरफ आत्म निर्भरता बढ़ाने पर ध्यान देना है तो दूसरी तरफ वैश्वीकरण के दौर में शेष विश्व के देशों से आत्मीय रिश्ते भी बनाये रखना है।
विज्ञापन
भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए धीरे-धीरे योजना बनाना होगी। - फोटो : social media
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

लद्दाख की गलवां घाटी में सोमवार रात चीनी सैनिकों के साथ हिंसक टकराव में सेना के सीओ रैंक के एक अधिकारी समेत 20 जवान शहीद हो गए। देर रात सेना से 20 जवानों के शहीद होने की पुष्टि की। सीमा पर हुए खूनी संघर्ष में चीन के 43 सैनिक हताहत हुए हैं। इनमें मृतक और गंभीर रूप से घायल चीनी सैनिक शामिल हैं। इस घटना के बाद पूरे इलाके में सेना ने सतर्कता तथा चौकसी बढ़ा दी है। चीन सीमा पर 45 साल बाद इस तरह की हुई यह पहली घटना है। इससे पहले 1975 में अरुणाचल प्रदेश में तुलुंग ला में संघर्ष हुआ था जिसमें चार जवान शहीद हुए थे।

विज्ञापन


बहरहाल, चीन की इस हरकत के बाद पूरे देश में चीन सामान के प्रति गुस्सा है। कई शहरों में चीनी सामान के बहिष्कार की खबरें भी आ रही हैं। एक तरह से देखा जाए तो युद्ध के अतिरिक्ति भारत के लिए चीन से निपटने के कई और रास्ते हैं और उनमें से एक चीनी सामान का बहिष्कार भी है। 

जब से भारत समेत समूची दुनिया में कोरोना संक्रमण फैला है, तब से चीन के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा विश्व समुदाय में है। भारत का जन मानस भी उबल रहा है। वजह यह है कि कोरोना वायरस के बारे में यह जानने में आ रहा है कि इसे चीन के उसी वुहान शहर की प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, जहां सबसे पहले संक्रमण फैला था।
विज्ञापन


इस फैसले के साथ ही यह बात भी उठ रही है कि चीन को सबक सिखाना चाहिए जिसमें चीन के साथ व्यापार संबंध कम करने या समाप्त करने तक की बातें हो रही हैं।

हम जानते हैं कि इस तरह के मसलों में लोगों का गुस्सा तात्कालिक ज्यादा रहता है। अभी कुछ ज्यादा इसलिए भी है कि तालाबंदी के चलते लोग-बाग घरों में बंद हैं तो सोचने के लिए अनेक विषय हैं।

बहरहाल, इस समय सच-झूठ के चक्कर में न पड़ते हुए यह देखें कि क्या व्यावहारिक रूप से चीनी सामान का उपयोग, खरीदारी बंद की जा सकती है? इतनी आसानी से तो नहीं जितना हम सोचते हैं, लेकिन असंभव कुछ भी नहीं है, यह भी ध्यान रखना होगा। जब सवाल देश की अस्मिता का हो तो कोई भी फैसला लेना संभव हो जाता है।

फिर भी हमें यह देखना चाहिए कि तत्काल तो किसी भी तरह से चीनी सामान का बहिष्कार किया नहीं जा सकता। तो क्या हमें इसके आर्थिक मकड़ जाल में उलझे रहना होगा? नहीं, ऐसा भी नहीं है। इसे तर्कसंगत तरीके से कम करना होगा।

दरअसल, इसके लिए पहली अनिवार्य शर्त तो यह है कि हम कृत संकल्पित हों कि हमें चीन माल से छुटकारा पाना है। इस पर दृढ़ रहें। इसके साथ ही बारी आती है उस सबसे अहम मुद्दे की कि हमने ऐसा किया तो हमारे पास विकल्प क्या हैं? क्या हम किसी और देश से वह सामान बुलाना प्रारंभ कर देंगे जो अभी चीन से रहा है तो क्या फर्क रहेगा?
   
ये सांप-सीढ़ी के खेल की तरह जटिल और बेहद उलझे हुए मसले हैं, जिनमें हम 99 पर जाकर एक पर लौट आते हैं। सबसे पहले तो हम यह समझ लें कि यह भावनात्मक मसला नहीं है, भले ही हम चीनी सामान के बहिष्कार का फैसला भावुकता के पलों में लें।

इस पर व्यवहारिक अमल व्यवहारिक तरीके से ही करना होगा। यह ठीक है कि एक बार फैसला ले लें तो फिर किसी नुकसान की चिंता न करें। नुकसान केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामरिक भी हो सकता है।

जिस तरह फन कुचला सांप दुगने गुस्से से डंसने का प्रयास करता है, वैसा ही चीन अपनी अर्थव्यवस्था को छेडऩे वाले के साथ भी करेगा ही। इस वक्त चारों तरफ से आलोचना का शिकार हो रहा चीन किसी से भी सीधे युद्ध के लिए न तो कतई तैयार होगा, न युद्ध करना चाहेगा।

हां, धमकाने का काम वह बखूबी करता ही रहता है। धमकाने में तो वह अमेरिका को भी नहीं छोड़ता। इस समय चीन में भी काम-धंधे 2019 की तरह नहीं चल रहे हैं। अंदर से आ रही खबरें तो बता रही हैं कि चीन भी समूची दुनिया की तरह मंदी का शिकार है। उसके यहां भी कारखाने धुंआ नहीं उगल रहे।

बेरोजगारी पसर रही है। मांग और पूर्ति का तालमेल बुरी तरह से गड़बड़ाया हुआ है। चीन के शासकों को डर सता रहा है कि ये हालात लंबे समय तक रहे तो लोगों का गुस्सा सड़कों का रूख कर सकता है।

हालांकि चीन थ्यानमन चौक जैसे हालात से निपटना जानता है, जब उसने 1989 में लोकतंत्र की मांग को लेकर 15 अप्रैल से 4 जून तक चले छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए टैंक और 3 लाख सैनिक सडक़ पर उतार दिए थे, जिसमें चीन में पदस्थ तत्कालीन ब्रिटिश राजदूत के मुताबिक अनुमानत: दस हजार लोग मारे गये थे। उनमें से अनेक की लाशें भी नहीं मिली थीं।

बावजूद उस पृष्ठभूमि के इस वक्त चीन की कोशिश यही रहेगी कि देश में ऐसी नौबत नहीं आए। इसलिए वह पड़ोसी मुल्कों के साथ छोटा-मोटा पंगा करने की फिराक में है। ताइवान के लिए युद्धपोत रवाना कर दिए हैं तो हांगकांग की भी घेराबंदी कर रहा है।

भारत को परेशान करने के लिए नेपाल के साथ हमारे सीमा विवाद को हवा दे रहा है तो लद्दाख की सीमा पर सेना का जमावड़ा बढ़ा रहा है और उसके सैनिक भारतीय सेना के जवानों से छोटी-छोटी बातों के लिए विवाद कर रहे हैं, ताकि वे भड़कें और चीन को मौका मिल जाए। भारतीय सैनिक संयम बरतते हुए जवाब दे रहे हैं।

चीन इस समय वही कर रहा है जो पहले कभी अमेरिका करता था। - फोटो : सोशल मीडिया
चीन इस समय वो सब कर रहा है जो कभी अमेरिका दुनिया के साथ करता था। पहले मुल्कों को आपस में लड़ाता था, फिर दोनों को हथियार बेचता था और अंत में समझौता कराकर अपना माल बेचता था, कर्ज देता था।

पूरी तरह से गुलामी की जंजीरों में जकड़ लेता था और प्रताड़ित राष्ट्र को मालूम भी नहीं चलता था या वह कुछ करने की स्थिति में नहीं बचता था।

चूंकि इक्कीसवीं शताब्दी में सीधे युद्ध की जरूरत नहीं है और अपेक्षाकृत आसान भी नहीं है तो सबसे कारगर तरीका ढ़ूंढ निकाला गया कारोबार और कर्ज का।

अब चीन ने कमोबेश पूरी दुनिया को अपने कर्ज और कारोबार से पाट दिया है। दुनिया में उपलब्ध अधिकतम उत्पाद वह ही बनाता है। उसने एक-एक शहर अलग-अलग चीजों के उत्पादन व वितरण के लिए बना रखे हैं।

आपको इस बात के लिए उसकी तारीफ करना चाहिए कि कैसे योजनाबद्ध तरीके से उसने साम्राज्य खड़ा किया। वैसे ही जैसे कभी ब्रिटेन ने किया था। उन्होंने व्यापारी के भेस में आकर आक्रमणकारी, लुटेरे में अपना रूपातंरण किया और मुल्कों को खाली कर लौट गया।

किसी मुल्क को नेस्तनाबूद करना हो तो दीमक की तरह पेश आओ। रानी दीमक कहीं नजर नहीं आती। वह केवल हुक्म जारी करती है और लाखों की तादाद में उसकी सेना ठेठ जमीन के अंदर से आकर महलों तक को खोखला कर लौट जाती है, अपनी रसद लेकर।

इस समय दुनिया के करीब डेढ़ सौ से ज्यादा देशों को मिलाकर चीन ने 5 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज दे रखा है। यह उसने एक-दो साल में नहीं किया, बल्कि दशकों पूर्व शुरू कर दिया था।

सन् 2000 के बाद इस पर खास तौर से काम किया। इसे वहां के शासकों की दूरदर्शिता ही कहा जाएगा। सन् 2000 में कर्ज की यह रकम 500 बिलियन डॉलर थी, जो 20 साल में 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई। 

5 ट्रिलियन डॉलर को इस तरह से समझ सकते हैं। एक ट्रिलियन यानी एक लाख करोड़। इस वक्त डॉलर की भारतीय मुद्रा में कीमत है 75 रुपये। एक लाख करोड़ डॉलर यानी 75 लाख करोड़ रुपये। पांच लाख करोड़ डॉलर यानी 375 लाख करोड़ रुपये।

भारत का सन 2019-20 का बजट था करीब 28 लाख करोड़ रुपये का यानी चीन ने हमारे देश के एक साल के बजट से करीब 13 गुना अधिक कर्ज दुनिया के डेढ़ सौ देशों को बांट रखा है। यह सही है कि यह मूल रकम नहीं है और यह पूरी रकम कभी-भी एकसाथ वापस भी नहीं मिलना है।

फिर भी यह एक ऐसा बोझ होता है जो कभी किसी मुल्क से नहीं उतरता। ब्याज-दर-ब्याज बढ़ता ही जाता है। वे राष्ट्र उस कर्ज को चुकाने के लिए फिर नया कर्ज लेते हैं या एक रुपया चुकाकर पांच रुपये फिर मांग लेते हैं।

इन डेढ़ सौ देशों में से अधिकतर चीन की शर्तें मानने को बाध्य होते हैं। अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता ही यह है कि जिस दुनिया पर एकछत्र उसका राज था, वह चीन के कब्जे में जा रही है। अमेरिका तक में चीन का कारोबारी सम्राज्य इतना फैल चुका है कि अमेरिका कितना ही जोर लगा ले तो तत्काल छुटकारा नहीं पा सकता, तब भारत की क्या बिसात है? ऐसा सोचना स्वाभाविक है।

फिर भी यह नहीं किया जा सकता, ऐसा भी नहीं है। हमारी परिस्थितियां अमेरिका या किसी भी पश्चिमी राष्ट्र से काफी अलग हैं। दुनिया के संपन्न देश 5 से 35 करोड़ तक की आबादी के हैं, जबकि हम 135 करोड़ और चीन 144 करोड़।

ये आबादी ही चीन की ताकत बनी तो भारत भी ऐसा कर सकता है। मानव श्रम किसी भी अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, चीन ने यह साबित कर दिखाया है। अब बारी भारत की है। मानव श्रम सस्ता होने से उत्पादन लागत काफी कम हो जाती है। कच्चे माल की कीमत सभी दूर कमोबेश औसत ही रहती है।

चीन ने अपनी कर्ज नीति का देश का कारोबार और सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए भरपूर उपयोग किया। उसने अनेक अफ्रीकी देश, मलेशिया, श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान को मुंह मांगी फरियाद पर कर्ज देकर अपना मुरीद और प्रकारांतर से गुलाम बना लिया। फिर उसने उन देशों की विदेश नीति, सामरिक नीति और व्यापारिक नीतियों को प्रभावित किया और अनेक मुल्कों के बंदरगाह व आधारभूत संरचनाओं के निर्माण के ठेके हासिल किए।

उसने अपनी सुविधा के लिहाज से हवाई अड्डे, बंदरगाह व सडक़ें बनाईं। वहां निर्माण इकाइयां कायम कीं और निर्यात बढ़ाया। अनेक मुल्कों की सरकारें अब सीधे तौर पर चीन के नियंत्रण में हैं। कर्ज का आलम तो यह है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक से ज्यादा रकम चीन दे रहा है। 

केल इंस्टीट्यूट के क्रिस्टोफर के मुताबिक बीते दो दशक में चीन ने बेहद समझदारी से निवेश किया है और उसका जबरदस्त फायदा उसे हुआ है। श्रीलंका का ही उदाहरण लें।

चीन ने हम्बनटोटा बंदरगाह, एअरपोर्ट व सडक़ निर्माण के लिये श्रीलंका को 4.6 अरब डॉलर का कर्ज दिया, जो 2016 में 6 अरब डॉलर हो गया। जिसे न चुका पाने की स्थिति के कारण श्रीलंका को चीन की कंपनी को बंदरगाह 1.12 अरब डॉलर में 99 साल की लीज पर देना पड़ा और पास में ही चीन को आद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए 15 हजार एकड़ जमीन भी दी। चीन वहां उत्पादन कर वहीं और पड़ोस के मुल्कों में खपा देगा। उसकी लागत और परिवहन खर्च कम होगा तो मुनाफा एकदम से बढ़ जाएगा।
   
ऐसे हालात में जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार यदि देशवासियों की भावनाओं के मद्देनजर चीनी सामान का बहिष्कार व स्वदेशी को बढ़ावा देना चाहती है तो उसे मानव श्रम का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना होगा। साथ ही उसे कुटीर, लघु व मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन भी देना होगा।

यह काम अकेल केंद्र सरकार नहीं कर सकती। इसमें ज्यादा बडी भूमिका तो राज्य सरकारों की रहेगी। वे यदि तय कर लें कि छोटे-छोटे कारोबारी आगे बढ़ें और जो जहां है, उसे वहीं रोजगार मिले तो काफी जल्द परिणाम मिल सकते हैं।

चीन ने इस संबंध में एक नीति बनाई है, जिसके तहत गरीबी रेखा या एक निश्चित आय तक के लोगों को सरकारी लाभ तभी मिलेगा जब वे जहां हैं, वहीं रहेंगे। यदि वे पलायन कर शहर जाते हैं तो उन सुविधाओं से वंचित कर दिए जाएंंगे। इसके लिए अनिवार्य शर्त यही है कि सरकार ऐसी परिस्थितियां निर्मित करे जिससे ग्रामीणों को अन्यत्र जाना ही न पड़े।
विज्ञापन

भारत को राजनीतिक इच्छाशक्ति के बूते चीन से मुकाबला करना होगा। - फोटो : Social media
यह ठीक है कि कोई भी देश स्वदेशी उत्पादों का उपयोग कर वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकता है, लेकिन वह विदेशी उत्पादों से पूरी तरह बच भी नहीं सकता। हमें इस दिशा में बहुत काम करना होगा।

एक तरफ आत्म निर्भरता बढ़ाने पर ध्यान देना है तो दूसरी तरफ वैश्वीकरण के दौर में शेष विश्व के देशों से आत्मीय रिश्ते भी बनाए रखना है। यह कारोबार के जरिए ही संभव होता है।

कृषि आधारित मुल्क में इससे जुड़े उद्योग की स्थापना, ग्रामीण क्षेत्र में ही अधिकतम रोजगार, उद्योग संबंधी नीतियों का लचीलापन, नौकरशाही पर लगाम, भ्रष्टाचार पर अंकुश, धन की सुगम उपलब्धता, बैंकों से आसान दरों पर कर्ज दिलाना, बिजली सस्ती दरों पर देना, जिस कच्चे माल की जहां प्रचुरता है, वहां उससे जुड़े उद्योगों के लिए वातावरण तैयार करना, उद्योग के लिए जगह से लेकर उत्पादन प्रारंभ करने तक एक ही स्थान पर सभी तरह की अनुमतियां प्रदान करना, वह भी समय सीमा के भीतर।

किसी आवेदन की अनदेखी या निरस्ती का उचित कारण न पाए जाने पर जवाबदेही तय करना और सबसे प्रमुख बात यह कि उत्पादकों को तैयार माल के लिए घरेलू से लेकर अतंरराष्ट्रीय बाजार तक उपलब्ध कराने की व्यवस्था सरकार को करना होगा। तब जाकर 10 से 20 साल के भीतर हम आत्म निर्भर बन सकते हैं। वह भी तब जब कि देश में एक ही पार्टी की सरकार हो या जो सरकार आये वे एक बार बन चुकी नीति की अनावश्यक समीक्षा कर उसमें मूलभूत बदलाव न करे।

हमारे यहां का सबसे दुखद पहलू यह है कि विकास की कोई एक सर्व सम्मत अवधारणा नहीं है। सत्ता के हस्तांतरण के साथ ही तमाम नीतियां कूड़ेदान में फेंक दी जाती हैं। यह माना जाता है कि दूसरा दल देश के बारे में अच्छा सोच ही नहीं सकता।

जब तक हमारे राजनेता अपने सोच को व्यापक नहीं बनाएंंगे और परस्पर सहमति के न्यूनतम बिंदु निर्धारित नहीं करेंगे, तब तक चीन तो ठीक है नेपाल से मुकाबला भी कोरी लफ्फाजी साबित होगी।
    
यही सही समय है जब देश के दो प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस मिल बैठकर चिंतन करें और देश हित के मुद्दों पर आंख मूंदकर सहमति बनाए। इसमें विदेश, आर्थिक और रक्षा नीति प्रमुख होना चाहिये। शेष नीतियां आप अलग रख सकते हैं।

साथ ही विपक्ष को अमेरिका की तरह अपने दल के भीतर भी प्रमुख मंत्रालयों जैसी व्यवस्था कर अपनी नीतियों पर चिंतन-मनन कर उसे समय-समय पर जनता के सामने रखना चाहिए ।

अमेरिका में विपक्ष अपने दल में प्रमुख मंत्रालय बनाता है जिसका विशेषज्ञ सासंद प्रभारी होता है जो सरकार को सतर्क बनाए रखता है। हमें याद रखना होगा कि अब युद्ध किसी भूभाग पर आमने-सामने नहीं लड़े जाते, बल्कि छापामार तरीके से लड़े जाते हैं, जिसमें हथियारों की बजाय कारोबार को अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में हमारे राजनीतिक दल कौरव-पाण्डव 100 और 5 बने रहे तो सत्यानाश सुनिश्चित है। जरूरत है किसी और से मुकाबला करते हुए कौरव-पाण्डव मिलकर 105 हो जाए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें