इरफान ने बॉलीवुड के ग्लैमर को खुदपर हावी नहीं होने दिया
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इरफान खान ने ये बताया कि जब गोविंद निहलाणी ने फिल्म आक्रोश बनाई थी, तब और अब में बहुत फर्क आया है। बॉलीवुड के फिल्मकार भी अब इस विषय पर तमाम फिल्में बना रहे हैं और इस विषय को बेहद संजीदगी से उठा रहे हैं।
इरफान खान ने तब ओमप्रकाश वाल्मिकी की कुछ कविताएं भी सुनाई थीं जिनमें – ‘सदियों का संताप’ और ‘वो मैं हूं’ जब उन्होंने पढ़ा तो उनके अंदाज में कविता के पात्र मानो जी उठे।
इन 6 सालों में इरफान खान ने बहुत ज्यादा फिल्में तो नहीं कीं, लेकिन जितनी भी कीं, उनकी चर्चा जरूर हुई। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने वैसे तो कई मंजे हुए कलाकार दिए, सबकी अपनी अपनी खासियतें रही हैं, जाहिर है इरफान ने भी यहीं से खुद को तराशा और एक अलग पहचान बनाई।
संघर्ष तो तमाम कलाकार करते ही हैं और अपनी जगह भी बड़ी मुश्किल से बनाते हैं, इरफान को भी शुरू में इस संघर्ष से जूझना पड़ा, 1988 में सलाम बॉम्बे में पहला मौका मिला, हर साल 4-5 फिल्में वो करते रहे लेकिन लोगों ने पहचाना मकबूल, पान सिंह तोमर, पीकू और स्लमडॉग मिलेनियर से। फिर बाद में तो हिन्दी मीडियम और अब अंग्रेजी मीडियम तक इफरान देश के बेहतरीन और बेहद प्रतिभावान कलाकारों की फेहरिस्त में शामिल हो ही गए।
फिल्मफेयर से लेकर पद्मश्री तक और तमाम अवार्ड्स की कतारें लग गईं, लेकिन सबसे अहम बात ये कि इरफान खान ने अपनी जमीन को याद रखा। उन्होंने कभी बॉलीवुड के ग्लैमर को खुदपर हावी नहीं होने दिया और उनकी पढ़ने लिखने की दिलचस्पी बनी रही, सामाजिक चेतना बची रही और समाज को करीब से देखने समझने की भूख बरकरार रही। बेशक इस बेहतरीन और संवेदनशील अभिनेता का इस तरह चले जाना मन के भीतर गहरी टीस पैदा करता है। नमन और श्रद्धांजलि।
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