वैसे तो सबसे आसान भाषा है आंखों की, होंट झूठ बोलते हैं तब भी आंखें सच बता ही देती हैं। लेकिन वो विपरीत था, आंखों का अभिनेता। जो अपने किरदार इतना जीता कि कागज पर लिखे संवाद उसकी आंखों में उतर आते थे। उसके होंठ बोलते डायलोग तो आंखें किरदार गढ़ती थीं। उनके भीतर लाल डोरे जिनमें जितना गुस्सा दीखता, उतना ही ग़म भी।
इरफ़ान पर एक गाना फ़िल्माया गया है ‘मैंने दिल से कहा ढूंढ़ लाना ख़ुशी’। इस पूरे गीत में न ही कोई संवाद है न विशेष दृश्य, इस गीत में अगर कुछ ख़ास है तो वो इरफ़ान हैं। ऐसे इरफ़ान जो आपको अपने भीतर भी महसूस होंगे।
एक अकेला आदमी, मेलन्कोलिक जो हर हाल में राज़ी है। फिर एक कैफ़े में बैठे इरफ़ान से ज़्यादा इस ये एक्ट और कौन दिखा पाता भला। गीत के किसी भी और पहलू से अधिक उनका अभिनय आपके भीतर उस दीवार पर प्रवेश करता है, जिसके पार झाँकने का जी नहीं चाहता।
अभिनेता का जीवन भी कितना दुष्कर है। रील में जितना दार्शनिक रहे, रियल में उतना ही विलोम हो सकता है। जब बीमारी की ख़बर लगी होगी इरफ़ान को, तब उन्होंने भी झाँका होगा न दीवार के उस पार।
रिल्के की कविता साझा करते, बीमारी की सूचना देते। इरफ़ान के आख़िरी दिन विदेश और देश के अस्पतालों में बीते। उनके तीमारदार डॉक्टरों से पूछा जाए कि, इरफ़ान की आंखें क्या कहती थीं उन दिनों। बड़ी-बड़ी आंखें जिनमें महीनों के रोग के बाद कितने संवाद, अभिनय, कला, कष्ट, उम्मीद के दरिया इकट्ठे हो गए होंगे। लेकिन फिर बंद हो गयी वे आंखें सदा के लिए।
बहुत बुरे दौर में एक बहुत अच्छा अभिनेता चला गया। इससे बुरा भी और क्या होगा कि उसका आख़िरी दीदार भी कई लोगों को सामने से न होगा। इरफ़ान, पर आने वाले नौसिखिए तुमसे ज़रूर जानेंगे कि 'मूक भी होते हैं संवाद, वे तुमसे आँखों की भाषा सीखेंगे'। सबसे सरल भाषा लेकिन सबसे दुर्लभ अभिनय।
विदा!
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