पाकिस्तान फिलीस्तीनियों को अपने नैतिक समर्थन के चलते इस्राइल से दूरी बनाता आया है।
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इस्राइल के प्रधानमंत्री की शपथ
इसके पहले इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा एक इंटरव्यू में सार्वजनिक रूप से कसम खाई थी कि वो ईरान और पाकिस्तान के परमाणु बमों को तबाह करके रहेंगे। उन्होंने कहा था कि हमारा सबसे बड़ा मिशन उग्रवादी इस्लामी शासन को परमाणु हथियार पाने से रोकना है। परमाणु हथियार इन आतंकी शासन के हाथों में नहीं जाना चाहिए। चाहे वो ईरान हो या फिर पाकिस्तान। इन कट्टरपंथियों के पास परमाणु हथियार होंगे तो डर है कि वो इनसे जुड़े नियमों का पालन नहीं करेंगे।' जनरल मोहसिन रेजाई के बयान के बाद पाकिस्तान के हाथ पैर फूल गए और उसने अधिकृत तौर पर कहा कि पाकिस्तान का एटम बम स्वदेश की रक्षा के लिए है, किसी और पर डालने के लिए नहीं है।
हमने कभी भी इस्राइल पर एटम बम डालने की धमकी नहीं दी। पाकिस्तान के इस यू टर्न को ईरान की ‘हरतरह से मदद’ के वादे के खिलाफ माना जा रहा है। यही नहीं उसने ईरान के साथ अपनी सीमा भी बंद कर दी है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि जनरल रेजाई का यह बयान कब का है।
वैसे पाकिस्तान फिलीस्तीनियों को अपने नैतिक समर्थन के चलते इस्राइल से दूरी बनाता आया है। उसके इस्राइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते भी नहीं हैं। फिलिस्तीनियों को भी पाकिस्तान का समर्थन मुख्य रूप से इसलिए है, क्योंकि वो मुसलमान हैं। अब पाकिस्तान को डर यह है कि अगर ईरान एपीसोड खत्म हो गया तो आगे क्या होगा? संभव है कि ईरान या तो दबाव में अमेरिका के साथ परमाणु डील पर दस्तखत कर दे या फिर अमेरिका और इस्राइल मिलकर ईरान में कट्टरपंथी खोमेनेई सरकार का तख्ता पलट दें। यद्यपि यह बहुत आसान नहीं है।
यह इस बात पर निर्भर है कि ईरानी जनता क्या चाहती है? संभव है कि इस काम में अमेरिका में पाकिस्तान की मदद भी मांगे, जिससे मुकरना पाक के लिए बहुत कठिन है। अगर ईरान में अमेरिका समर्थक सरकार कायम हो गई तो अगला लक्ष्य पाकिस्तान ही होगा, जिसके पास परमाणु बम हैं और वो जब तब भारत को इसकी धमकी देता रहता है। पाक के पास 170 परमाणु बम हैं, जबकि ईरान तो इसे बनाने की कोशिश में ही मारा गया।
हालांकि भारत ने भी ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देकर पाक को उसकी औकात बता दी है। लेकिन खतरा अभी भी बदस्तूर है कि पाक का परमाणु कभी भी उन आतंकियों के हाथ में जा सकता है, जिन्हें ईरान की तरह उसने पाल रखा है। यह बात न तो इस्राइल से और न ही अमेरिका से छिपी है। भारत तो दुनिया को यह बात शुरू से बताता रहा है।
लिहाजा इस बात की पूरी संभावना है कि ईरान प्रकरण निपटते ही अगला टारगेट पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम हो। इसके लिए भूमिका बननी शुरू हो जाएगी। पाक के परमाणु कार्यक्रम को लेकर शंकाओं के कुछ ठोस कारण हैं। पहला तो पाकिस्तान में कमजोर नागरिक सरकार है, जो फौज के दबाव में काम करती है और खुद फौज आंतकियों को खुले आम प्रश्रय दे रही है। दूसरे, पाक ने 1968 की परमाणु अप्रसार संधि ( एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
इस संधि पर दुनिया के 191 देशो के दस्तखत हैं। भारत सहित 9 देशों ने इससे दूरी इस आधार पर बनाई है कि यह संधि भेदभावपूर्ण और न्यायसंगत नहीं है। लेकिन भारत ने परमाणु हथियारों के मामले में ‘नो फर्स्ट यूज’ घोषणा की हुई है, जिसका अर्थ यह है कि भारत कभी भी युद्ध की स्थिति में पहले परमाणु बम का उपयोग नहीं करेगा। लेकिन परमाणु हमला हुआ तो उसी शैली में जवाब देगा। ऐसी ही घोषणा चीन ने भी की हुई है। लेकिन पाकिस्तान ने नहीं की है। यह रवैया उसके गैर जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने की ओर इंगित करता है और इस्राइल इसे मुद्दा बना सकता है।
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