आजकल के युवा अक्सर सोचते हैं कि हम जितना वेतन घर ले जाते हैं, उससे कहीं अधिक कमाते हैं। हकीकत में यह ठीक उल्टा है। आप जितना कमाते हैं, उससे कम घर ले आते हैं। यह आपको तब पता चलेगा, जब आप अपने बैंक खाते, खर्च और अन्य का हिसाब-किताब करेंगे।
कुछ हफ्ते पहले मुझे एक स्टार्टअप में 15 युवाओं से बातचीत का मौका मिला। 20 साल की उम्र में उनमें कुछ ऐसा आत्मविश्वास था, जो उनकी उम्र में मुझमें नहीं था। यह उनकी मानव संसाधन टीम की ओर से आयोजित एक सत्र था, जिसमें महसूस किया गया कि कर्मचारियों को बचत और निवेश के तरीकों के बारे में समझना चाहिए। लड़कियों में से एक ने खुलकर बात की और बताया कि महीने के अंत तक उसके पास निवेश के जितने पैसे नहीं बचेंगे। उसके माता-पिता उसे अक्सर याद दिलाते रहते थे कि उसने ठीक से बचत नहीं की है।
वह प्रति माह लगभग एक लाख रुपये कमाती थी। बाकी लोगों का भी यही हाल था। जब उनके खर्चों के बारे में मैने पता किया तो उन्होंने वास्तव में कभी अपने खर्चों पर नजर नहीं रखी है। मैंने उनसे पूछा कि क्या उनके फोन में उबर, स्विगी, अमेजन आदि जैसे एप हैं? उन सभी ने हां में सर हिलाया और फिर दर्जनों ऐप दिखाए जिनसे वे खाने, कपड़े, कैब और न जाने क्या-क्या ऑर्डर करते थे। फिर मैंने उस लड़की से पूछा कि क्या उसने कभी अपने बैंकिंग एप के माध्यम से अपना बैंक विवरण चेक किया है। उसका जवाब था...नहीं।
बजट बनाएं...जरूरी खर्चों का प्रबंधन करें
एक समय था जब लोग मासिक खर्चों और वित्तीय प्रतिबद्धताओं का प्रबंधन करने के लिए बजट बनाते थे। अब यह अवधारणा खत्म हो रही है। ईंधन की कीमतें कुछ हफ्तों में बदल रही हैं। घर पर बिजली की खपत इस बात पर निर्भर कर रही है कि आपने कितने दिन घर पर बिताए या काम पर गए। अब बजट बनाकर वित्तीय जीवन जीना कठिन है। फिर भी बचत और खर्चों की जांच जरूरी है।
यदि कोई मासिक सैलरी पाने वाला अपने माता-पिता के साथ रहता है तो उसे कुल आय का 25-35 फीसदी निवेश के लिए बचाना चाहिए। यदि वे अकेले रह रहे हैं तो लगभग 15-25% बचाएं। भोजन, किराया, किराने के सामान और ऐसी ही अन्य चीजों पर खर्च आपकी आय के 45-50 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए। 20-25% की बचत करनी चाहिए। कमाई का 35-40 फीसदी हिस्सा कर देनदारी चुकाने और गैजेट जैसी वस्तुओं पर खर्च कर सकते हैं।
सच वह नहीं, जो आप जानते हैं
वेतनभोगी अक्सर यही सोचते हैं कि वे बताई गई आय के जितना ही कमाते हैं। यह सच नहीं है, क्योंकि अगर कॉस्ट-टू-कंपनी (सीटीसी) 12 लाख रुपये सालाना यानी प्रति माह एक लाख रुपये है तो वास्तव में आपकी सैलरी मासिक 70,000 और 80,000 रुपये के बीच होती है। ऐसा इसलिए, क्योंकि कंपनी इसमें से टैक्स काटने के साथ पीएफ में निवेश करती है।
साल में 9 महीने ही मिलता है वेतन
अगर हम वेतन की गणना करें तो आपके अनुमानित वेतन का कुल ढाई से 3 महीने का वेतन आपके पास नहीं आता है। सैलरी पाने वाले लोग अमूमन सालाना सैलरी का 3 महीने की सैलरी टैक्स और दूसरे योगदान में देते हैं। इसके विपरीत, एक बिजनेसमैन खर्चों के बाद कुल आय पर टैक्स चुकाता है, जबकि एक वेतनभोगी को पहले ही टैक्स काट कर पैसा मिलता है। फिर वे हर चीज पर जीएसटी भी देते हैं।
सैलरी स्लिप में सारी जानकारी
जब मैं उनको यह समझाने में कामयाब रहा कि उनके हाथ में जितनी वास्तविक सैलरी आ रही है, वे उससे कहीं ज्यादा खर्च कर रहे हैं तो उनमें से कुछ ने तो एचआर पर भड़ास निकालनी शुरू कर दी। हालांकि, ये सभी डिटेल्स उनकी सैलरी स्लिप में होती है। कई लोग जांच करने की जहमत नहीं उठाते हैं। कुछ लोगों ने अगर जांच भी की तो उन्होंने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि उन्हें क्या मिला और बाकी कहां गया।
हर महीने करें बचत और निवेश
करियर के कुछ शुरुआती साल वित्तीय स्वतंत्रता का अनुभव करने के लिए अच्छे हैं, लेकिन ये ऐसे वर्ष भी हैं जो बचत और निवेश की नींव बनाने में मदद करेंगे। जितनी जल्दी बचत और निवेश शुरू करेंगे, उतनी ही अच्छी संभावना है कि आसानी से वित्तीय जिम्मेदारियों का सामना करने में सक्षम हो सकेंगे।