राष्ट्रीय शिक्षा नीति में योग शिक्षा को अधिकारिक रूप से समर्थित किया गया है
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शिक्षा नीति में योग की भूमिका
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से भी हमारी सरकार ने योग को अहमियत दी है और इसे शिक्षा का अभिन्न हिस्सा माना है। योग शिक्षा को सम्पूर्ण शिक्षा प्रक्रम में सम्मिलित करने का उद्देश्य बहुत व्यापक है, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार चाहती है कि छात्रों को स्वस्थ, जीवंत और संतुलित जीवन जीने के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त हो सके।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में योग को स्वास्थ्य, नैतिक मूल्यों, शारीरिक शिक्षा, मानसिक संतुलन तथा अध्यात्मिक विकास के पहलुओं के साथ जोड़कर बताया गया है। इसके अनुसार सभी शिक्षण संस्थाओें में योग के लिए विशेष पाठ्यक्रम और गतिविधियां शामिल की जानी चाहिए।
योग शिक्षार्थियों के शारीरिक और मानसिक संघटकों को संवारने, स्वास्थ्य सुधारने, तंदुरुस्ती बढ़ाने, तनाव को कम करने, ध्यान को विकसित करने, स्वाभाविक रूप से विश्राम करने, एकाग्रता को बढ़ाने और नैतिक मूल्यों को समझाने का माध्यम बनाता है।
योग में स्नातक कराने वाला पहला विश्वविद्यालय
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय भारत का पहला विश्वविद्यालय है, जिसने योगा को 1959 में स्नातक स्तर पर एक वैकल्पिक विषय के रुप में प्रारंभ किया। सन 2001.2002 से योग विषय में स्नाकोत्तर तथा इसी वर्ष से यूजीसी पाठ्यक्रम पर आधारित योग विषय में एम.एस.सी. पाठ्यक्रम प्रारंभ किया। कई छात्र योग विषय में शोध भी कर रहे हैं तथा यह विभाग विश्वस्तर पर एक अनूठी पहचान बना चुका है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में योग शिक्षा को अधिकारिक रूप से समर्थित किया गया है और शिक्षकों को छात्रों की योग शिक्षा क्षमता को विकसित करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि छात्रों को योग की अच्छी शिक्षा दी जाएगी और वे योग के लाभों का सही रूप से उपयोग कर सकेंगे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति मूल्य आधारित शिक्षा पर भी बल देती है। योग का अभ्यास छात्रों के सामाजिक और नैतिक मूल्यों का विकास करने में भी मदद करता है तथा छात्रों में आत्मविश्वासए सद्भाव और सामरिकता की भावना विकसित करती है। सकारात्मक भावनाओं के साथ वे संयमित और सहनशील बनते हैं एवं उनके बीच सहयोग, समरसता और विवेक की भावना विकसित होती है।
योग शिक्षा स्वस्थ्य नागरिक का निर्माण करने में सहायक
महत्वपूर्ण बात यह है कि योग का अभ्यास न केवल शिक्षा के दौरान ही हो, बल्कि इसे छात्र जीवन भर अपना लेते है जिससे कि उनकी जीवन शैली ही योग.मय होकर उनके जीवन को ख़ुशहाली की दिशा में ले जाती है।
योग का अभ्यास छात्रों को स्वतंत्रता, विचारशीलता और समस्याओं का समाधान करने की क्षमता प्रदान करता है और उन्हें सफल और सुखी जीवन की ओर अग्रसर करता है। योग शिक्षा स्वस्थ्य नागरिक का निर्माण करने में मदद करती है क्योंकि यह शारीरिक और मानसिक सुख, स्थिरता और स्वस्थ्य की ओर ले जाता है।
योग शिक्षा को स्वस्थ्य नागरिक का निर्माण करने के लिए जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसे समस्त शिक्षण संस्थानों, सार्वजनिक स्थलों और कार्यालयों में शामिल करके योग की शिक्षा को सभी तक पहुंचाना अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का ध्येय है।
सरकार द्वारा योग को समर्पित कार्यक्रमों का पूर्ण रुप से पालन करके सभी लोग स्वस्थ, सुखी और सक्रिय जीवन जी सकते हैं और एक स्वस्थ नागरिक निर्माण कर समाज के ओजस्व को बढ़ा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग शिक्षा को जन.जन पहुँचाने का संकल्प हमें लेना चाहिए ताकि हम एक स्वस्थ तथा खुशहाल भारत का निर्माण कर सकें तथा 'हर आंगन योग' की परिकल्पना को पूर्ण कर सकें। योग शिक्षा द्वारा हम सिर्फ भारत के लिए ही नहीं, पूरे विश्व में योग एकता द्वारा एक अनूठी मिसाल स्थापित कर सकते हैं।
नोट- लेखक प्रो. नीलिमा गुप्ता, डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर म.प्र. की कुलपति हैं।
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