बाघ को जंगल का राजा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उसकी छत्रछाया में लाखों की संख्या में अन्य जीव प्रजातियां पनपती हैं- सांकेतिक तस्वीर
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बुढ़ापा, दुर्घटना और बड़े और ताकतवर जीव से लड़ाई में मौतें हो जाना भी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन बाघों के अस्तित्व के लिए असली खतरा आधुनिक हथियारों से लैस और चालाक आदमी से है। आदमी इन मांसाहरी जीवों को अपने ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने, वस्त्र बनाने, हड्डियों से औषधीय सामग्री बनाने, दांत और मूंछ आदि से टोने-टोटके करने आदि के लिये मार डालता है।
बहादुरी दिखाने के लिए इन बेकसूर जीवों को गेम के लिए मार डालना भी शाही शौक प्राचीन काल से चला आ रहा है। एक अनुमान के अनुसार मनुष्य ने बीसवीं सदी से लेकर अब तक विश्व में बाघों की 90 प्रतिशत आबादी को समाप्त कर दिया है।
पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री अनिल माधव दवे ने 10 अप्रैल 2017 को राज्यसभा में कहा था कि वर्ष 2014 से लेकर 2016 के बीच बाघों के शिकार की वारदातों में 63 प्रतिशत वृद्धि हुई है। वर्ष 2014 में जहां बाघों की हत्या की 14 वारदातें दर्ज हुईं थीं वहीं 2016 में ये वारदातें बढ़ कर 42 हो गईं। स्वैैच्छिक संगठन ‘वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में देश में 110 बाघों और 493 गुलदारों की मौतें हुई हैं जिनमें से 38 बाघों और 128 गुलदारों की मौतें शिकारियों के हाथों हुई हैं।
शिकार की सर्वाधिक 29 वारदातें मध्य प्रदेश में, 22 महाराष्ट्र में तथा 12-12 उत्तराखण्ड और कर्नाटक में हुईं। उससे पहले 2018 में शिकारियों के हाथों 34 बाघ मारे गये थे। गत वर्ष देश में शिकारियों द्वारा 128 गुलदार भी मारे गये। वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2008 से लेकर 2018 के बीच देश में शिकारियों ने 429 बाघ मारे।
बाघ को जंगल का राजा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उसकी छत्रछाया में लाखों की संख्या में अन्य जीव प्रजातियां पनपती हैं। चिन्ता की बात यह है कि हर साल अरबों रुपये खर्च करने पर भी बाघों का निर्मम संहार नहीं रुक रहा है। देश में नवीनतम गणना में कुल 2,967 बाघ पाये गये, जो कि बाघों की वैश्विक संख्या का 75 प्रतिशत है।
इंदिरा गांधी ने बाघों के पर्यावरणीय महत्व एवं उनकी घटती संख्या को देखे हुये 1973 में 9 टाइगर रिजर्व स्थापित किए थे जिनकी संख्या आज 50 हो गई है- सांकेतिक तस्वीर
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नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथाॅरिटी (एनटीसीए) द्वारा बाघों के संरक्षण के लिए वित्तीय वर्ष 2019-20 में देश के 17 राज्यों में स्थित 50 टाइगर रिजर्वाें को 49,067 करोड़ 79 लाख रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। यह राशि भी टाइगर रिजर्वों से बाहर के लिए नहीं थी। इस प्रकार देखा जाए तो एक बाघ की सुरक्षा के लिए प्राधिकरण द्वारा लगभग 16.53 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया।
चूंकि वन एवं वन्यजीव अब संविधान की समवर्ती सूची में हैं, इसलिए इस राशि में केद्रांश 28,565 करोड़ 36 लाख था और शेष राशि राज्य सरकारों को खर्च करनी थी। अगर केद्रांश पर ही गौर करें तो एक बाघ को बचाने के लिए पिछले साल केन्द्र सरकार ने अपनी ओर से 7.12 करोड़ रुपये रखे थे। केद्रांश का 2,986 करोड़ मध्य प्रदेश और 3709 करोड़ से अधिक महाराष्ट्र को गया जहां बाघों की सर्वाधिक हत्याएं हुई हैं।
इस मद में 1,794 करोड़ उत्तराखण्ड को भी मिले, फिर भी शिकारियों के हाथों राज्य सरकार 12 बाघों को नहीं बचा पाई। देखा जाए तो उत्तराखण्ड के 442 बाघों को बचाने पर केवल केन्द्र सरकार की ओर से प्रति बाघ 4 करोड़ से अधिक की रकम राज्य सरकार को मिली।
वन्यजीव जीवों से संबंधित अपराधों पर नियंत्रण के लिए 2006 में गठित वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो के खर्चों के लिये ही सरकार ने इस साल 14 करोड़ का बजट रखा है, जिसमें 7 करोड़ तो केवल वेतन के लिये और 20 लाख रुपये मुखबिरी के लिए हैं।
इंदिरा गांधी ने बाघों के पर्यावरणीय महत्व एवं उनकी घटती संख्या को देखे हुए 1973 में 9 टाइगर रिजर्व स्थापित किए थे जिनकी संख्या आज 50 हो गई है। उसी दौरान वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 बना जिसमें संशोधन होते रहे। फिर भी स्थानीय समुदाय को दुश्मन मानते हुए उनके हितों को दरकिनार कर शुरू किए गए प्रयास वन्यजीवों की सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सके।
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