मानवाधिकारों के मानकों को भारतीय मुद्दों पर आंख बंद करके लागू नहीं किया जा सकता है।
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हाल के कुछ वर्षों में भारत में मानवधिकार की परिभाषा पर जुबानी जंग छिड़ी हुई है। भारत सरकार के मंच से आधिकारिक रूप से मानवाधिकार पर वैश्विक खास कर पश्चिमी नजरिए को खुली चुनौती मिली है, कहा जा रहा है कि भारतीय सन्दर्भों के मानव अधिकार को अंतर्राष्ट्रीय चश्मे से नहीं देखा जा सकता। 12 अक्टूबर 2019 को 26वें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्थापना दिवस पर बोलते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि भारत के संदर्भ में मानवाधिकार का पैमाना पश्चिमी देश नहीं हो सकते हैं।
मानवाधिकारों के मानकों को भारतीय मुद्दों पर आंख बंद करके लागू नहीं किया जा सकता है। उन्होंने सरकार द्वारा नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार के प्रयासों जैसे औरतों के लिए शौचालय, खाना पकाने का सुरक्षित तरीका गैस चूल्हा आदि को मानवाधिकार का मुद्दा मानना की वकालत की।
कोरोना काल के बाद हुए 28वें स्थापना दिवस समारोह में 12 अक्टूबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हाल के वर्षों में मानवाधिकार की व्याख्या कुछ लोग अपने-अपने तरीके से, अपने-अपने हितों को देखकर करने लगे हैं। चयनित तरीके से आचरण करते हुए कुछ लोग मानव अधिकारों के हनन के नाम पर देश की छवि को भी नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं और ऐसे लोगों से देश को सतर्क रहना है।
आजादी के बाद स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रणाली, सक्रिय मीडिया, सक्रिय नागरिक समाज और एनएचआरसी जैसे संगठन मानवाधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। न्याय प्रणाली तक पहुंच आसान बनाने के लिए ई-अदालतों की संख्या में बढ़ोतरी और राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड को मजबूत बनाने जैसे कदमों को भी मानवाधिकार के रूप से देखने की जरुरत है।
स्मरण रहे कि वर्ष 2018 में भारत के मानवाधिकार आयोग के 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने ये दावा किया कि 25 वर्ष (1993-2018 तक) 17 लाख से अधिक मामलों का निपटारा, मानवाधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को 100 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा दिया गया। मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत पर 750 से अधिक स्थान पर आयोग की जाँच टीम भेजी, पूरे देश में मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए 200 से अधिक सम्मेलन किये गए।
मानवाधिकार का मुद्दा अपनी डफली अपना राग का नहीं है।
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मानवाधिकार के लिए काम करने वाले स्वतंत्र संगठन के नजरिये सें मानवाधिकार आयोग के रिपोर्ट या काम करने के तरीके को देखें तो अधिकांश मामलों में केस को सम्बंधित कार्यालय भेजने अथवा पुलिस से रिपोर्ट मांगने तक सीमित है जो मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों के प्रति सही रुख नहीं है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 25 वर्ष के वार्षिक रिपोर्ट के अवलोकन से यह भी पता चलता है कि हिरासत में 31 हजार से अधिक मौतें दर्ज हुई हैं। ये भारतीय या पश्चिमी देशों के मानवाधिकार के नजरिये का फर्क का मसला नहीं है यह आज़ाद मुल्क़ के आज़ाद नागरिक का पहला अधिकार है।
मानवाधिकार का मुद्दा अपनी डफली अपना राग का नहीं है। इसकी व्याख्या अपने हितों या अपने तरीके से नहीं की जा सकती। मानवाधिकार शाश्वत मूल्य हैं। इसे व्यक्तिगत हित साधन में उपयोग में लाना वैश्विक और भारतीय दोनों ही दृष्टि से उपयुक्त नहीं है।
आदर्श वैश्विक मानक के रूप में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सार्वभौमिक घोषणा पत्र (कुल 30 अनुच्छेद) जिसमें समता का अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया गया है, को लक्ष्य माना जा सकता है। इसमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ साथ आर्थिक और सामाजिक अधिकारों को भी लिया गया है।
भारतीय संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का उल्लेख भाग 4 में किया गया है। संभवतः संसार के किसी भी संविधान में मूल अधिकारों का इतना व्यापक और विशद वर्णन नहीं किया गया है। प्राचीन ग्रंथों से लेकर सम्राटों और बादशाहों ने मानवाधिकारों को किसी न किसी रूप में अपनाया। सम्राट अशोक की समानाधिकारवादी, सार्वभौमिक सहनशीलता की सोच हो या बादशाह अकबर की सर्वधर्म समभाव एवं स्वतंत्रता का विचार। भारतीय समाज और राजनीति हमेशा से मानवाधिकारों के हर रूप का समर्थक रही है।
पहली बार 10 दिसंबर 1948 को यू एन द्वारा मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी कर व्यक्ति के अधिकारों का मुद्दा उठाया गया था, इसलिए इस दिवस को हर वर्ष मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है।इस वर्ष का थीम “एकता, सामाजिक-आर्थिक नवीनीकरण और राष्ट्र निर्माण का वर्ष” है मानवाधिकार पर भारतीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य के अंतर को पाटने की कुंजी है।
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