गांवों मे आज भी 4 या 5 पीढ़ियों के लोग एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं।
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गांवों मे हमें आज भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जहां 4 या 5 पीढ़ियों के लोग एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं तथा एक ही रसोई में उन सब का खाना बनता है। यद्यपि बदलती परिस्थितियों में संयुक्त परिवार का यह रूप अब कम ही देखने को मिलता है।
उपभोक्तावादी संस्कृति अपरिपक्वता, व्यक्तिगत आकांक्षा ,स्वकेंद्रित विचार, संकुचित मानसिकता तथा सामंजस्य की क्षमता में कमी के कारण संयुक्त परिवार की परंपरा में कमी आई है। गांव से भारी मात्रा में लोग रोजगार की तलाश में प्रतिदिन शहरों की ओर जाते हैं, जहां पूरे परिवार को ले जाना संभव नहीं होता ना तो उनके पास इतनी सुविधाएं होती हैं और ना ही साधन।
ऐसे में संयुक्त परिवारों का विखंडन स्वभाविक है। परंतु समाज का एक दुखद पहलू यह है कि आज युवा वर्ग मात्र इसलिए माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहता ताकि वह अपने जीवन को अपनी इच्छा से जी सकें। बूढ़े माता-पिता की रोक-टोक को वह अपनी स्वतंत्रता का हनन मानता है।
भारत जैसे संस्कृति संपन्न राष्ट्र के लिए यह बहुत ही दुखद बात है। देश में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या संयुक्त परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ सामाजिक परिपेक्ष की नितांत आवश्यकता की ओर इंगित करती है।
यदि संयुक्त परिवारों का इसी तरह बिखण्डन होता रहा तो नई पीढ़ी दादा-दादी नाना-नानी चाची-चाचा जैसे मधुर रिश्तों के प्रेम और वात्सल्य से अनजान ही रह जाएगी। संयुक्त परिवारों के टूटने का यह दुखद परिणाम यह भी है कि बच्चों में सामाजिक मूल्यों व संस्कारों की कमी देखी जा रही है।
विशेषकर इस युग में जब माता-पिता दोनों ही कामकाजी हो तो बच्चे अपने अकेलेपन को काटने की में दिशा में अक्सर भटक जाते हैं। ऐसे में उनके लिए बुजुर्गों की शीतल छांव बहुत जरूरी है। संयुक्त परिवारों की परंपरा के इस वटवृक्ष को यदि नहीं बचाया गया तो हमारी आने वाली पीढ़ी ज्ञान संपन्न होने के बाद भी दिशाहीन होकर विकृतियों में फंस कर अपना जीवन बर्बाद कर लेगी।
परिवार ही हमारी शक्ति है
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कहा भी गया है परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है मानव मूल्यों का प्रथम पाठ बच्चा परिवार से ही सीखता है। बढ़ते हुए बाल व किशोर अपराध कहीं ना कहीं कमजोर पड़ रही पारिवारिक व्यवस्था का ही परिणाम है।
अतः हमें पुनर्विचार करना होगा, अपनी उस पुरानी सुदृढ़ पारिवारिक व्यवस्था के विषय मे जिसमें पलकर नई पीढ़ी अपने मजबूत संस्कारों के साथ अपने सुदृढ़ भविष्य का निर्माण कर सकें तथा बुजुर्ग भी अपने बच्चों के साथ अपने बुढ़ापे को सुरक्षित महसूस कर सकें।
जो माता-पिता जीवन भर परिश्रम करके बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, वृद्धावस्था में उन्हें अकेले अपना बुढ़ापा काटने के लिए छोड़ देना संबंधो के प्रति ही नहीं मानवता के प्रति भी क्रूर अन्याय है, क्योंकि परिवार का निर्माण मात्र कुछ लोगों के साथ रहने से ही नहीं हो जाता है, अपितु एक दूसरे के प्रति प्रेम विश्वास सहयोग और सुरक्षा के अटूट भावों के बंधन से परिवार बनता है।
परिवार एक ऐसा सुरक्षा घेरा है. जिसमें रहकर कोई भी व्यक्ति स्वयं को शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करता है। किसी भी प्रकार की विपत्ति के समय परिवार के सदस्य एक दूसरे की शक्ति बनकर उसका सामना करते हैं।
इसका तत्कालीन उदाहरण आज हम वैश्विक स्तर पर छाई हुई आपदा कोविड-19 नामक महामारी के समय स्पष्ट देख सकते हैं। जहां परिस्थितियोंवस बाहरी दुनिया से हमारा संपर्क नाम मात्र का रह गया है।
ऐसे समय में परिवार ही हमारी शक्ति है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसकी गरिमा को बनाए रखें। अधिकारों और कर्तव्यो के समुचित तालमेल तथा परस्पर श्रद्धा की भावना हमारे इस प्रयास में सहायक होगी और तभी हम एक स्वच्छ व सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकेंगे।
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