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International family day 2020:मानव मूल्यों को पल्लवित करती सुदृढ़ पारिवारिक व्यवस्था

सार

  • परिवार प्राणी जगत की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई है।
  • 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आधिकारिक तौर पर इस दिवस को मनाने की घोषणा की।
  • भारतीय संस्कृति का तो मूल आधार ही है -"वसुधैव कुटुंबकम"।
  • हमारी संस्कृति सदैव अनेकता में एकता की रही है।
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परिवार किसी भी समाज का केंद्रीय हिस्सा है - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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मानव समाज की ही नहीं अपितु प्राणी जगत् की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई है परिवार। सामाजिक संगठन की इस मौलिक इकाई के अभाव में मानव समाज के सुचारू रूप से संचालन की कल्पना ही असंभव है।

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परिवार के इसी महत्व को दृष्टिगत् रखते हुए 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संकल्प ए/आर डी एस/ 47/237 के साथ आधिकारिक तौर पर इस दिवस को मनाने की घोषणा की।

"अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस" का प्रतीक चिन्ह है- एक गोलाकार चित्र में लाल रंग की छवि जिसमें एक घर और एक दिल शामिल है। जो प्रदर्शित करता है कि परिवार किसी भी समाज का केंद्रीय हिस्सा है, जो सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए एक समर्थन और स्थिर घर प्रदान करता है।
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आधुनिकतापूर्ण स्वतंत्रता और एकांतप्रिय जीवनशैली की दिशा की ओर अग्रसर हो रहा समाज धीरे-धीरे उस अमूल्य एहसास से भी दूर होता जा रहा है जिसे परिवार कहते हैं।

अतः अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का आयोजन आधुनिक समय में लोगों के बीच परिवारों के महत्व को के प्रति जागरूकता पैदा करता है। भारतीय संस्कृति का तो मूल आधार ही है -"वसुधैव कुटुंबकम"। अर्थात्- पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है। जिसका उल्लेख हमें उपनिषदों भगवत गीता तथा अनेक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

हमारी संस्कृति सदैव अनेकता में एकता की रही है। अथर्ववेद में परिवार की कल्पना करते हुए कहा गया है-"अनुब्रतः पितु पुत्रों मात्रा भवतु समानाः।  जाया पत्ये मधुमतीं वाचम वदतु शांतिवाम।। अर्थात्-"पुत्र पिता के प्रति निष्ठावान हो, माता के साथ पुत्र एकमन वाला हो, पत्नी पति से मधुर तथा कोमल शब्द बोले।" विश्व गुरु की भूमिका निभाते हुए भारत ने समस्त विश्व के सामने परिवार की जो आत्मीय, सुरक्षात्मक तथा मोहक छवि प्रस्तुत की है वह अपने आप में एक मिसाल है।

बीते समय में समाज के विकास क्रम में हमारी संस्कृति और सभ्यता अनेक परिवर्तनों से परिष्कृत होते हुए भी परिवार नामक संस्था के अस्तित्व को पूर्णरूपेण सुरक्षित रखने में समर्थ रही है। हां उस के स्वरूप में परिवर्तन अवश्य आया।

आधुनिकीकरण की भावना में बहकर हमने परिवार के स्वरूप और मूल्यों में कुछ परिवर्तन भले ही कर दिए हो परंतु आज भी उसकी महत्ता और स्थिति पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। आज विश्व भर में जो एकल परिवार की लहर दौड़ रही है उससे भारत भी अछूता नहीं है।परंतु भारत गांवों का देश है और आज भी वहां संयुक्त परिवार की मधुर परंपरा कायम है।

देश में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या संयुक्त परिवारों को बचाने के लिए...

गांवों मे आज भी 4 या 5 पीढ़ियों के लोग एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं। - फोटो : Social media
गांवों मे हमें आज भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जहां 4 या 5 पीढ़ियों के लोग एक साथ एक छत के नीचे रहते हैं तथा एक ही रसोई में उन सब का खाना बनता है। यद्यपि बदलती परिस्थितियों में संयुक्त परिवार का यह रूप अब कम ही देखने को मिलता है।

उपभोक्तावादी संस्कृति अपरिपक्वता, व्यक्तिगत आकांक्षा ,स्वकेंद्रित विचार, संकुचित मानसिकता तथा सामंजस्य की क्षमता में कमी के कारण संयुक्त परिवार की परंपरा में कमी आई है। गांव से भारी मात्रा में लोग रोजगार की तलाश में प्रतिदिन शहरों की ओर जाते हैं, जहां पूरे परिवार को ले जाना संभव नहीं होता ना तो उनके पास इतनी सुविधाएं होती हैं और ना ही साधन।

ऐसे में संयुक्त परिवारों का विखंडन स्वभाविक है। परंतु समाज का एक दुखद पहलू यह है कि आज युवा वर्ग मात्र इसलिए माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहता ताकि वह अपने जीवन को अपनी इच्छा से जी सकें। बूढ़े माता-पिता की रोक-टोक को वह अपनी स्वतंत्रता का हनन मानता है।

भारत जैसे संस्कृति संपन्न राष्ट्र के लिए यह बहुत ही दुखद बात है। देश में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या संयुक्त परिवारों को बचाने के लिए एक स्वस्थ सामाजिक परिपेक्ष की नितांत आवश्यकता की ओर इंगित करती है।

यदि संयुक्त परिवारों का इसी तरह बिखण्डन होता रहा तो नई पीढ़ी दादा-दादी नाना-नानी चाची-चाचा जैसे मधुर रिश्तों के प्रेम और वात्सल्य से अनजान ही रह जाएगी। संयुक्त परिवारों के टूटने का यह दुखद परिणाम यह भी है कि बच्चों में सामाजिक मूल्यों व संस्कारों की  कमी देखी जा रही है।

विशेषकर इस युग में जब माता-पिता दोनों ही कामकाजी हो तो बच्चे अपने अकेलेपन को काटने की में दिशा में अक्सर भटक जाते हैं। ऐसे में उनके लिए बुजुर्गों की शीतल छांव बहुत जरूरी है। संयुक्त परिवारों की परंपरा के इस वटवृक्ष को यदि नहीं बचाया गया तो हमारी आने वाली पीढ़ी ज्ञान संपन्न होने के बाद भी दिशाहीन होकर विकृतियों में फंस कर अपना जीवन बर्बाद कर लेगी।
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परिवार एक ऐसा सुरक्षा घेरा है. जिसमें रहकर कोई भी व्यक्ति स्वयं को....

परिवार ही हमारी शक्ति है - फोटो : Pixabay
कहा भी गया है परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है मानव मूल्यों का प्रथम पाठ बच्चा परिवार से ही सीखता है। बढ़ते हुए बाल व किशोर अपराध कहीं ना कहीं कमजोर पड़ रही पारिवारिक व्यवस्था का ही परिणाम है।

अतः हमें पुनर्विचार करना होगा, अपनी उस पुरानी सुदृढ़ पारिवारिक व्यवस्था के विषय मे जिसमें पलकर नई पीढ़ी अपने मजबूत संस्कारों के साथ अपने सुदृढ़ भविष्य का निर्माण कर सकें तथा बुजुर्ग भी अपने बच्चों के साथ अपने बुढ़ापे को सुरक्षित महसूस कर सकें।

जो माता-पिता जीवन भर परिश्रम करके बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, वृद्धावस्था में उन्हें अकेले अपना बुढ़ापा काटने के लिए छोड़ देना संबंधो के प्रति ही नहीं मानवता के प्रति भी क्रूर अन्याय है, क्योंकि परिवार का निर्माण मात्र कुछ लोगों के साथ रहने से ही नहीं हो जाता है, अपितु एक दूसरे के प्रति प्रेम विश्वास सहयोग और सुरक्षा के अटूट भावों के बंधन से परिवार बनता है।

परिवार एक ऐसा सुरक्षा घेरा है. जिसमें रहकर कोई भी व्यक्ति स्वयं को शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करता है। किसी भी प्रकार की विपत्ति के समय परिवार के सदस्य एक दूसरे की शक्ति बनकर उसका सामना करते हैं।

इसका तत्कालीन उदाहरण आज हम वैश्विक स्तर पर छाई हुई आपदा कोविड-19 नामक महामारी के समय स्पष्ट देख सकते हैं। जहां परिस्थितियोंवस बाहरी दुनिया से हमारा संपर्क नाम मात्र का रह गया है।

ऐसे समय में परिवार ही हमारी शक्ति है। हमारा कर्तव्य है कि हम इसकी गरिमा को बनाए रखें। अधिकारों और कर्तव्यो के समुचित तालमेल तथा परस्पर श्रद्धा की भावना हमारे इस प्रयास में सहायक होगी और तभी हम एक स्वच्छ व सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकेंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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