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अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस 2019ः नागरिकों की गरीबी और अभाव को कैसे दूर करेगी भारत सरकार?

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प्रतिवर्ष दुनिया भर में 17 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। - फोटो : अमर उजाला
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गरीबी उन्मूलन की दिशा में योगदान देने के लिए भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी का नोबेल पुरस्कार हेतु चयनित होना सुखद है। लेकिन दुखद पहलू यह है कि उनके ही देश के अधिकत्तर लोग गरीबी भरा जीवन जीने को विवश है। प्रतिवर्ष दुनिया भर में 17 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस गरीबी दूर करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के संबंध में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है।

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भारत में लंबे समय से है गरीबी की समस्या 
भारत लंबे समय से गरीबी का दंश झेल रहा है। स्वतंत्रता पूर्व से लेकर स्वतंत्रता पश्चात भी देश में गरीबी का आलम पसरा हुआ है। गरीबी उन्मूलन के लिए अब तक कई योजनाएं बनीं, कई प्रयास हुए, गरीबी हटाओ चुनावी नारा बना और चुनाव में जीत हासिल की गई। लेकिन इन सब के बाद भी न तो गरीब की स्थिति में सुधार हुआ और न गरीबी का खात्मा हो पाया। सच्चाई यह है कि गरीबी मिटने के बजाय देश में दिनोंदिन गरीबों की संख्या में गिरावट होने लगी है।

सत्ता हथियाने के लिए गरीब को वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया गया तो सत्ता मिलने के बाद उसे हमेशा के लिए अपने हाल पर छोड़ दिया गया। इसलिए गरीब आज भी वहीं खड़ा है जहां आजादी से पहले था। आज भी सवेरे की पहली किरण के साथ ही गरीब के सामने रोटी, कपड़ा और मकान का संकट खड़ा हो जाता है।
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दरअसल, यह कम विडंबना नहीं है कि सोने की चिड़िया के नाम से पहचाने जाने वाले देश का भविष्य आज गरीबी के कारण भूखा और नंगा दो जून की रोटी के जुगाड़ में दरबदर की ठोकरें खा रहा है। हकीकत तो यह है कि गरीब पैदा होना अब पाप समझा जाने लगा। गरीब की जिंदगी तो महज एक चिंगम की तरह होकर सिमट गई है, जिसे कोई भी खरीदता है और चबाकर थूक देता है।

देश में गरीबी कितनी है, इस बारे में सबसे चर्चित आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई वाली एक समिति का है। - फोटो : फाइल फोटो
क्या कहते हैं देश में गरीबी के आंकड़े 
देश में गरीबी कितनी है, इस बारे में सबसे चर्चित आंकड़ा अर्जुन सेनगुप्ता की अगुवाई वाली एक समिति का है। इस समिति ने कुछ साल पहले यह अनुमान लगाया था कि देश की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रुपये से कम पर गुजर बसर करने को मजबूर है।

सरकार के अनुसार गरीब की परिभाषा यह है कि शहरी क्षेत्र में प्रतिदिन 28.65 रुपये और ग्रामीण क्षेत्र में 22.24 रुपये कम से कम जिसकी आय है वे सब गरीबी रेखा में सम्मिलित हैं। आज जहां महंगाई आसमान छू रही है, क्या वहां 28 और 22 रुपये में एक दिन में तीन वक्त का पेटभर खाना खाया जा सकता है? क्या यह गरीबों का मजाक नहीं है?

सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार 30 रुपये प्रतिदिन की आय कमाने वाला भी गरीब नहीं है। शायद हमारे जनप्रतिनिधियों को इस बात का ध्यान ही नहीं है कि गरीबी में गरीबों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

गरीबी केवल पेट का भोजन ही नहीं छीनती है, बल्कि कई सपनों पर पानी भी फेर देती है। लेकिन इन सब बातों से अंजान हमारे नेता गरीबी को लेकर अभी भी संजीदा नहीं है। हम भारत को न्यू इंडिया तो बनाना चाहते हैं पर गरीबी को मिटाना नहीं चाहते।  हमारे प्रयास हर बार अधूरे ही रह जाते हैं। क्योंकि हमने कभी सच्चे मन से इस समस्या को मिटाने को लेकर कोशिश की ही नहीं है।

गरीबी उन्मूलन की दिशा में चीन की कोशिश न केवल सराहनीय है, बल्कि अनुकरणीय भी है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार पहले चीन में भारत से 26 फीसदी ज्यादा गरीब थे। लेकिन 1978 के बाद चीन में तेजी से बदलाव आने लगा। अब वो दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। चीन के लोग भारत से पांच गुना से ज्यादा अमीर हो चुके हैं।
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शादी व समारोह में व्यापक फलक पर हो रही भोजन की बर्बादी को लेकर कानून - फोटो : फाइल फोटो
क्या भारत के पास है गरीबी से निपटने की योजना?  
गरीबी की बीमारी जब तक भारत को लगी रहेगी, तब तक भारत का विकासशील से विकसित बनने का सपना पूरा नहीं हो सकता है। वास्तव में गरीबी इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी बढ़-चढ़कर उसी हर बार बताया जाता है।

सच तो यह है कि गरीबों के लिए चलने वाली दर्जनों सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल ही नहीं पाता। जिसका एक कारण अज्ञानता का दंश भी है। हालांकि, वर्तमान सरकार द्वारा डिजिटलीकरण इस दिशा में सार्थक कदम है।

दरअसल, गरीबी के बढ़ने का प्रमुख कारण जनसंख्या का लगातार अनियंत्रित तरीके से वृद्धि करना है। यदि हम भारत के संदर्भ में देखें तो आजादी के बाद से साल दर साल हमारे देश की जनसंख्या में इजाफा होता गया है।

जाहिर है जिस सीमित जनसंख्या को ध्यान में रखकर विकास का मॉडल व योजनाएं बनाई गईं  हर बार जनसंख्या वृद्धि ने बाधा उत्पन्न की है। वस्तुतः विकास धरा का धरा रह गया। आवश्यकता है कि हम जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में न केवल जागरूकता लाएं, बल्कि दो बच्चे ही अच्छे की नीति के आधार पर सरकारी सेवाओं का लाभ भी तय करें। 

सरकार कैसे निभाएगी जिम्मेदारी 
किसी भी सरकार की यह नैतिक जिम्मेदार होती है कि नागरिकों को पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध कराए। शादी व समारोह में व्यापक फलक पर हो रही भोजन की बर्बादी को लेकर कानून बनाने व उसके सफल क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराकर उनके बच्चों के लिए शिक्षा का उचित प्रबंध के साथ ही गरीबों के लिए जल, भूमि, स्वास्थ्य व ईंधन में विस्तार किया जाना चाहिए। गरीबों के लिए आर्थिक नीतियां बनाई जाएं और पूंजीवादियों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। किसी भी गरीबी उन्मूलन रणनीति का एक आवश्यक तत्व घरेलू आय में बड़ी गिरावट को रोकना है।

राज्य प्रायोजित गरीबी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को सही सोच के साथ लागू किया जाना चाहिए। हालांकि, पूर्ण लाभ पाने के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण प्रदान करने में सक्षम सामाजिक बुनियादी ढांचे के निर्माण की आवश्यकता है।

यूटिलिटी, विद्युतीकरण, आवास, ट्रांसपोर्टेशन सुविधाओं के विकास पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। देश में कृषि उत्पादन पर्याप्त नहीं है। गांवों में आर्थिक गतिविधियों का अभाव है।

इन क्षेत्रों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में सुधार की जरूरत है ताकि मॉनसून पर निर्भरता कम हो। बैंकिंग, क्रेडिट क्षेत्र, सामाजिक सुरक्षा नेटवर्क, उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा तथा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सुधार की जरूरत।

सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा पर अधिक निवेश किए जाने की जरूरत है ताकि मानव उत्पादकता में वृद्धि हो सके। गुणात्मक शिक्षा, कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही रोजगार के अवसर, महिलाओं की भागीदारी, बुनियादी ढांचा तथा सार्वजनिक निवेश पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

हमें आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने की आवश्यकता है। आर्थिक वृद्धि दर जितनी अधिक होगी गरीबी का स्तर उतना ही नीचे चला जाएगा।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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