देश की जैव विविधता में वनस्पति के साथ-साथ वन्यजीवों का विशेष महत्व है। वन्यजीवों को हमारे जंगलों और अभयारण्यों में देखा जा सकता है। वन्य जीवों को बचाने एवं संरक्षित करने के लिए देश में अभयारण्यों का विकास किया गया एवं कई जगह चिड़ियाघर विकसित किए गए।
घड़ियाल पूरे विश्व में केवल गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, सिन्ध तथा चम्बल में ही पाए जाते थे। वर्ष 1974 में सिन्ध नदी में लगभग 70 घडियाल थे किन्तु अस्सी के दशक में सिन्ध नदी में एक भी घड़ियाल शेष नहीं रहा।
वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जलचरों की प्रजातियों के समाप्त होते जाने का प्रमुख कारण उनके नैसर्गिक निवास स्थलों का नष्ट होना, चमड़े के लिए शिकार किया जाना तथा मछली पकड़ने के जालों में फंस जाने के कारण डूबने से मर जाना बताया।
अत: भारत सरकार ने घड़ियाल के पुनर्वास की व्यापक योजना बनाई जिसके तहत घडियालों एवं मगरमच्छों के अण्डों से बच्चे तैयार कर उन्हें फिर से नदियों में छोड़ा जाना सम्मिलित था। चम्बल नदी घडियालों के लिए बेहतर प्राकृतिक आवास है। इसके अतिरिक्त अन्य लुप्तप्राय: जीव जैसे ऊदबिलाव, गांगेय सूंस (डाल्फिन) तथा मगर मच्छ भी इसमें पाए जाते हैं।
लुप्त होते घड़ियालों के संरक्षण के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा 30 सितम्बर 1978 को रास्ट्रीय चम्बल अभ्यारण्य के लिए प्रशासनिक स्वीकृति जारी की गई। यह अभयारण्य तीन राज्यों की सीमा क्षेत्र में आने से मध्य प्रदेश राज्य क्षेत्र की अधिसूचना 20 दिसम्बर 1978 को की गई।
इसी प्रकार की अधिसूचना उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा 20 जनवरी 1979 को एवं राजस्थान राज्य द्वारा 7 दिसम्बर 1979 को जारी की गई। लगभग 600 किलोमीटर लम्बे तथा नदी तट के दोनों ओर 1000 मीटर चैड़े क्षेत्र को अभयारण्य घोषित कर दिया। चम्बल घड़ियाल अभयारण्य का दक्षिणी छोर कोटा शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जवाहर सागर बांध से प्रारम्भ होता है।
कोटा बैराज के केशोरायपाटन तक के 18 किलोमीटर के मुक्त क्षेत्र को छोड़कर यह अभयारण्य पालीघाट, बटेसुरा होते हुए पंचनदा में चम्बल, पहूंज, कुंवारी और सिंध नदियों के यमुना में मिलन स्थल तक फैला हुआ है।
अभयारण्य की देखरेख एवं प्रशासनिक कार्य के लिए वन विभाग के अधीन परियोजना अधिकारी का कार्यालय मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थापित किया गया।
चम्बल नदी में घड़ियाल संरक्षण परियोजना 1979 से प्रारंभ की गई और 1980 में इसकी स्थापना की गई। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य मगरमच्छ प्रजातियों के संरक्षण का दुनिया में सब से बड़ा अभयारण्य है।
चम्बल नदी में 1979 से 1987 के मध्य अलग-अलग स्थानों पर तीन से चार वर्ष की आयु के लगभग एक से दो मीटर तक की लम्बाई वाले 1287 शिशु घडियाल छोड़े गए। ये घडियाल शिशु मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के देवरी घडियाल प्रजनन केन्द्र से लाए गए थे।
घड़ियाल प्रजनन के लिए राजस्थान में कोटा के निकट गुड़ला में बेहतर साइट है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश की इटावा रेंज में खेड़ा अजब सिंह, कसऊआ,पिनाहट रेंज के रेहा घाट, विप्रवली, चम्बल की रेतिया, बाह केन्जरा, हरलालपुरा एवं नंदगवां में घड़ियाल की प्रजनन साइटस है। इनका प्रजनन काल 15 जून तक होता है जब अंडों से बच्चे निकलते हैं।
एक मादा घड़ियाल एक समय में अपने घोंसले जिसे बिल भी कहते है 40 से 60 अंडे देती हैं। अक्सर 15 जून के बाद मानसून का मौसम शुरू हो जाता है। बरसात से और नदी में पानी के तेज वेग से काफी अंडे बह कर नष्ट हो जाते हैं और 10 प्रतिशत बच्चे ही बच पाते हैं।
रेत का अवैध खनन भी इनके जीवन को प्रभावित करता है। इन जगहों पर घड़ियालों को प्रजनन करते, अंडों से नन्हे-नन्हे बच्चे निकलते,उनकी अठखेलियां देख खास कर विदेशी सैलानी आनन्दित होते हैं।
घड़ियाल अभयारण्य को देखने के के लिए उपवन संरक्षक (वन्य जीव) मुरैना से अनुमति लेनी होती है। जवाहर सागर से कोटा बैराज तक या तो नदी में नाव के माध्यम से या फिर नदी के तट पर जीप के द्वारा यात्रा की जा सकती है।
चम्बल घड़ियाल अभयारण्य को नजदीक से देखने के लिए अनेक स्थानों पर व्यू पॉइंट्स बनाये गए हैं। कई व्यू पॉइंट से कोटा में उपलब्ध गाइड के साथ जलचर, किनारे के पक्षी एवं लैंड्सकैप का आनन्द और फोटोग्राफी के लिए बोट सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।
पिनाहट,नंदगांव घाट,सेहसों एवं भरच तक वाहन से भी जाया जा सकता है। वन्यजीव संरक्षण अधिकारी के माध्यम से बोटिंग की व्यवस्था की जा सकती है। अभयारण्य परियोजना क्षेत्र में नदी की गहराई में गेपरनाथ महादेव का स्थल है।
केशोरायपाटन में भगवान कृष्ण के प्राचीन मंदिर हैं, जहाँ पर्यटक ग्रामीण मेलों का आनन्द उठा सकते हैं। पालीघाट से रणथम्भौर का ऐतिहासिक किला, बाघ परियोजना क्षेत्र और अभयारण्य अधिक दूर नहीं हैं।