सन् 2014 में सत्ता परिवर्तन केवल राजनीतिक घटना नहीं थी। यह उस लंबे वैचारिक संघर्ष का परिणाम भी माना गया जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी दशकों से उठाते रहे थे। संघ परिवार लगातार यह आरोप लगाता रहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था पर औपनिवेशिक और वामपंथी सोच का गहरा प्रभाव है। इतिहास लेखन से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक भारतीयता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवादी दृष्टि को कमजोर करने का विमर्श लगातार खड़ा किया गया। ऐसे में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो सबसे अधिक उम्मीदें शिक्षा क्षेत्र से ही थीं।
युवाओं का संघर्ष और व्यवस्था का मौन
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि सरकार इस सिंडिकेट को तोड़ने में अब तक असफल क्यों रही। जांच एजेंसियों की रिपोर्टों में छपाई श्रृंखला से लेकर हलकर्ता गिरोह, डिजिटल नेटवर्क और अंदरूनी मिलीभगत तक की बातें सामने आती रही हैं। इसके बावजूद कठोर और निर्णायक सुधार दिखाई नहीं देते। कोटा, पटना, दिल्ली और छोटे कस्बों में वर्षों मेहनत करने वाला छात्र अब यह महसूस करने लगा है कि उसकी लड़ाई किताबों से ज्यादा नेटवर्क से है। जब छात्र सड़कों पर थे और उनका भविष्य अनिश्चितता में था तब मंत्रालय का मौन सरकार की साख को और अधिक चोट पहुंचा गया। यही वह मोड़ था जहां मोदी सरकार की लंबे समय से बनी अभेद्य छवि पर सबसे गहरा आघात लगा। आर्थिक निर्णयों या राजनीतिक विवादों से अलग शिक्षा संकट ने सीधे उस मध्यवर्गीय और युवा वर्ग को प्रभावित किया जिसने इस सरकार को सबसे मजबूत समर्थन दिया था।
निष्कर्ष: साख और समाधान
आज का युवा शायद प्रश्न पूछ रहा है कि क्या व्यवस्था उसके साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा कर रही है। इतिहास की पुस्तकों के अध्याय बदलना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उस छात्र का भरोसा वापस लाना अत्यंत कठिन है जिसे लगने लगे कि इस देश में मेहनत से अधिक प्रभाव और प्रबंधन की शक्ति चलती है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम या परीक्षा का विषय नहीं होती। यह किसी राष्ट्र की नैतिक विश्वसनीयता का आधार होती है। यदि छात्र को यह विश्वास ही न रहे कि उसकी मेहनत का निष्पक्ष मूल्यांकन होगा तो फिर कोई भी नई शिक्षा नीति या कोई भी वैचारिक विमर्श और कोई भी गौरवगान स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ सकता।
यह तय है कि जब तक शिक्षा माफिया का सिंडिकेट नहीं टूटेगा और शिक्षा मंत्रालय को बौद्धिक गहराई तथा प्रशासनिक दृढ़ता वाला नेतृत्व नहीं मिलेगा, तब तक नालंदा का गौरव केवल भाषणों का हिस्सा बना रहेगा। माफिया के आगे कमजोर पड़ता तंत्र आज की शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता बन चुका है।
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