लोग अक्सर पहले संसार को संवारने में इतने मशगूल हो जाते हैं कि दूसरा संसार धीरे-धीरे अंधेरे में डूबता जाता है। वे घर बनाते हैं, पर अपने भीतर लौटने का कोई घर नहीं बनाते। वे सम्मान कमाते हैं, पर आत्म-सम्मान खो देते हैं। वे सबकी अपेक्षाएं पूरी करते हैं, पर अपनी आत्मा की सबसे छोटी इच्छा भी सुन नहीं पाते। एक दिन वे पीछे मुड़कर देखते हैं और पाते हैं कि उन्होंने जीवन तो बहुत जिया, पर खुद को बहुत कम जाना।
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि शांति क्या पहाड़ों, जंगलों में मिलती है, या फिर किसी आश्रम में। मैं कहता हूं यदि तुम्हारे भीतर अशांति है, तो तुम उसे हर जगह साथ ले जाओगे। और यदि तुम्हारे भीतर शांति है, तो बाजार का शोर भी उसे नष्ट नहीं कर सकेगा। स्थान बदलने से पहले चेतना बदलनी पड़ती है। जीवन ने मुझे सिखाया है कि मनुष्य अपने भीतर के अंधकार से डरता है। इसलिए वह लगातार बाहर के शोर में उलझा रहता है। मौन उसे भयभीत करता है, क्योंकि मौन में वह स्वयं से मिलता है। लेकिन उसी मौन में वह दरवाजा भी है, जिसके पार आजादी है। जो अपने भीतर के भय को देखने का साहस करता है, वही अंततः उससे मुक्त होता है। इसलिए अपने भीतर की आवाज और बाहर की जिम्मेदारियों के बीच कभी भी युद्ध नहीं होने देना चाहिए। यदि आत्मा हमें करुणा सिखाती है, तो वह व्यवहार में दिखनी भी चाहिए। यदि हमें सत्य प्रिय है, तो वह केवल विचारों में नहीं, फैसलों में भी झलकना चाहिए। यदि भीतर प्रेम है, तो वह केवल भावना बन कर ही न रह जाए, वह संबंधों में भी सांस ले। मनुष्य उस वक्त विभाजित हो जाता है, जब उसका भीतर कुछ और चाहता है और वह बाहर कुछ और जीता है। यह विभाजन धीरे-धीरे थकान, निराशा और निरर्थकता के भाव को जन्म देता है। इसके विपरीत, जब भीतर का सत्य बाहर के जीवन में उतरने लगता है, तब साधारण काम भी अर्थपूर्ण लगने लगते हैं। यहां पूर्णता का अर्थ यह नहीं कि भीतर कोई संघर्ष न रहे। पूर्णता का अर्थ यह है कि हम अपने संघर्षों के साथ भी एक हो जाएं। अपने भीतर के मौन को सुनें, लेकिन संसार की पुकार से भी मुंह न मोड़ें। अपने स्वप्नों को बचाए रखें, लेकिन उन लोगों का हाथ भी थामे रखें, जो हमारे साथ चल रहे हैं। यही संतुलन मनुष्य को परिपक्व बनाता है।