पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने 23 अप्रैल को सिंधु जल समझौते (1960) को तत्काल प्रभाव से स्थगित करने की घोषणा की। यह कदम पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देने के जवाब में उठाया गया। इस फैसले ने न केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ाया, बल्कि मीडिया में तरह-तरह की अटकलों और भ्रामक दावों को भी जन्म दिया।
कुछ खबरों में दावा किया गया कि भारत ने सिंधु नदी प्रणाली का पानी पूरी तरह रोक दिया है, जिससे पाकिस्तान में सूखा पड़ गया है। जबकि अब तक यह भारत का दबाव ही है। वास्तविकता इन दावों से कहीं अधिक जटिल है।
फिलहाल भारत ने चिनाब नदी पर बने बांध से पाकिस्तान को पानी की आपूर्ति रोक दी, यह कदम पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण के बाद उठाया गया। भारत का पानी पर नियंत्रण अवश्य है, मगर पूरी तरह पानी रोकना बहुत दूर की कौड़ी है।
भारत ने डेटा साझा करना बंद कर दिया है और पाकिस्तानी निरीक्षकों की परियोजना स्थलों पर यात्राओं को रोका है, लेकिन पानी का प्रवाह पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। अगर पाकिस्तान को सद्बुद्धि आ जाए तो पानी रोकने की नौबत ही नहीं आएगी।
संधि का निलंबन, रद्दीकरण नहीं
यह गौर करने वाली बात है कि भारत ने सिंधु जल समझौते को रद्द नहीं, बल्कि स्थगित (सस्पेंड) किया है। इसका मतलब है कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद को रोकने की ठोस गारंटी या भरोसा देता है, तो समझौता पुनः लागू हो सकता है। 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया: पूर्वी नदियां (सतलुज, ब्यास, रावी) भारत के नियंत्रण में, और पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए।
समझौता निलंबित होने से भारत अब जल डेटा साझा करने, नई परियोजनाओं की जानकारी देने, या पाकिस्तानी अधिकारियों को निरीक्षण की अनुमति देने जैसे दायित्वों से मुक्त है। यह भारत को पश्चिमी नदियों पर बांध और जल भंडारण परियोजनाओं को तेजी से विकसित करने की छूट देता है।
हालांकि, मीडिया में यह धारणा बन रही है कि भारत ने इन नदियों का पानी पूरी तरह रोक दिया है। यह सच नहीं है। भारत ने चिनाब नदी पर बगलिहार बांध से पानी के प्रवाह को आंशिक रूप से नियंत्रित किया है, जिसका असर सीमित क्षेत्रों में दिखा है। किशनगंगा बांध पर भी ऐसी योजना बन रही है, लेकिन अभी इसे लागू नहीं किया गया। पाकिस्तान में पानी की कमी की खबरें अतिशयोक्तिपूर्ण हैं, क्योंकि वहां अभी बड़े पैमाने पर जल संकट की स्थिति नहीं बनी है।
पानी रोकने की प्रक्रिया: समय और संसाधन
पानी को पूरी तरह रोकना तकनीकी, आर्थिक, और भौगोलिक रूप से एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) के पानी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए भारत को 5 से 10 साल का समय लग सकता है।
इसका कारण यह है कि भारत की वर्तमान जल भंडारण क्षमता लगभग नगण्य है, क्योंकि समझौते के तहत केवल रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं की अनुमति थी। नए भंडारण बांधों के निर्माण के लिए खरबों रुपये, पर्यावरणीय मंजूरी, और जटिल पहाड़ी क्षेत्रों में इंजीनियरिंग की आवश्यकता होगी।
भारत सरकार ने इस दिशा में तीन चरण की रणनीति अपनाई है। पहले चरण में मौजूदा बांधों, जैसे बगलिहार और किशनगंगा, का उपयोग कर पानी का प्रवाह नियंत्रित किया जा रहा है। दूसरे चरण में रुकी हुई परियोजनाएं, जैसे तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट, को तेजी से शुरू करने की योजना है।
तीसरे और दीर्घकालिक चरण में नए बड़े भंडारण बांध बनाए जाएंगे, जो राजस्थान, पंजाब, और हरियाणा जैसे राज्यों को लाभ पहुंचाएंगे। हाल ही में सिंधु नदी पर दो नई स्टोरेज परियोजनाओं की घोषणा की गई है, लेकिन इनके पूरा होने में कई साल लगेंगे।
बगलिहार और किशनगंगा की भूमिका
जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर स्थित बगलिहार बांध 450 मेगावाट की पनबिजली परियोजना है, जो 2008 में शुरू हुई थी। यह एक रन-ऑफ-द-रिवर बांध है, जिसका मतलब है कि यह पानी को लंबे समय तक रोकने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया। हाल के हफ्तों में भारत ने इस बांध से पानी के प्रवाह को आंशिक रूप से कम किया है, जिससे पाकिस्तान में चिनाब नदी के कुछ हिस्सों में पानी की मात्रा घटी है। हालांकि, यह कमी अभी इतनी नहीं है कि पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सूखा पड़ जाए।
इसी तरह, झेलम की सहायक नीलम नदी पर किशनगंगा बांध 330 मेगावाट की परियोजना है, जो 2018 में शुरू हुई। भारत इस बांध से भी पानी रोकने की योजना बना रहा है, लेकिन अभी यह लागू नहीं हुआ है। दोनों बांधों की भंडारण क्षमता सीमित है, और इन्हें बड़े पैमाने पर पानी रोकने के लिए अपग्रेड करना होगा।
यह प्रक्रिया समय और संसाधन दोनों की मांग करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन बांधों से पानी का प्रवाह नियंत्रित तो किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह रोकना तब तक संभव नहीं है, जब तक बड़े भंडारण बांध न बनें।
पानी रोकने की चुनौतियां
पानी को पूरी तरह रोकने की प्रक्रिया कई चुनौतियों से भरी है। सबसे पहले, अंतरराष्ट्रीय कानून एक बड़ा मसला है। पाकिस्तान ने इस निलंबन को 1969 के वियना कन्वेंशन और अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन बताया है। वह विश्व बैंक, हेग की स्थायी मध्यस्थता अदालत, या अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में जा सकता है।
विश्व बैंक, जिसने समझौते की मध्यस्थता की थी, इस मामले में तटस्थ भूमिका निभा सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव भारत के लिए चुनौती बन सकता है।दूसरा, पर्यावरणीय मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। बड़े पैमाने पर पानी रोकने से नदी बेसिन का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।
स्थानीय वनस्पति, जीव-जंतु, और नदी पर निर्भर समुदायों पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, यदि पानी को बड़े पैमाने पर रोका गया, तो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। भारी बारिश या ग्लेशियर पिघलने की स्थिति में बांधों की क्षमता अपर्याप्त हो सकती है, जिससे नदियों के किनारे बसे इलाकों में तबाही मच सकती है।
तीसरा, तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। नए भंडारण बांधों का निर्माण पहाड़ी क्षेत्रों में करना होगा, जहां भूकंप का जोखिम, भूस्खलन, और जटिल भूगोल इंजीनियरिंग को मुश्किल बनाते हैं। इसके लिए भारी निवेश और लंबी अवधि की योजना की जरूरत है।
पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और कृषि सिंधु नदी प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है। वहां की 80% कृषि भूमि और प्रमुख शहर, जैसे कराची और लाहौर, इस जल प्रणाली पर निर्भर हैं। भारत के फैसले से पाकिस्तान में चिंता का माहौल है। पाकिस्तानी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ने कहा, "सिंधु में पानी बहेगा या खून बहेगा।" पाकिस्तान ने इस निलंबन को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए विश्व बैंक, हेग की मध्यस्थता अदालत, और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाने की बात कही है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। चीन और अफगानिस्तान, जो सिंधु बेसिन के हिस्से साझा करते हैं, इस फैसले के प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। यदि भारत पानी रोकने में सफल होता है, तो यह दक्षिण एशिया के जल-राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है।
आगे की राह
भारत का यह फैसला पाकिस्तान पर दबाव बनाने का एक रणनीतिक कदम है, जो आतंकवाद के मुद्दे पर कड़ा संदेश देता है। लेकिन यह केवल तकनीकी मसला नहीं, बल्कि कूटनीतिक, कानूनी, और पर्यावरणीय चुनौतियों से भरा है। भारत को नए बांधों के निर्माण, पर्यावरणीय प्रभावों, और स्थानीय समुदायों के पुनर्वास जैसे मुद्दों से जूझना होगा। साथ ही, बाढ़ जैसे जोखिमों को कम करने के लिए मजबूत योजना की जरूरत है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह फैसला दीर्घकालिक जल संकट का खतरा पैदा कर सकता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है। हालांकि, समझौता स्थगित होने से यह संभावना भी बनी है कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाता है, तो दोनों देश कूटनीतिक बातचीत के जरिए तनाव कम कर सकते हैं।
मीडिया में चल रही भ्रामक खबरों के बीच यह समझना जरूरी है कि भारत का फैसला एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। पानी का प्रवाह तत्काल नहीं रुका है, और न ही पाकिस्तान अभी सूखे की चपेट में है। लेकिन आने वाले वर्षों में भारत की नई परियोजनाएं और बांध इस क्षेत्र के जल-राजनीतिक समीकरण को बदल सकते हैं। यह समय दोनों देशों के लिए संयम, कूटनीति, और दूरदर्शिता का है, ताकि तनाव युद्ध या बड़े संकट में न बदल जाए।
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