स्वीडन में बिखरे हुए काग़ज़ के टुकड़े सड़क पर नहीं दिखेंगे
फिर चाहे उन्हें कोई देख रहा हो या नहीं, ऐसा करना वे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। ताकि उनका शहर साफ- सुथरा रहे। वे अपने पेट्स के मल को सड़क से उठाकर पॉलीथीन में रखते हैं और कूड़ेदान तक फेंकने के लिए जाते हैं। अगर साथ में ज्यादा सामान है और हाथ ख़ाली नहीं है तो वे इस पॉलीथीन को अपनी जेब में रखने से भी परहेज़ नहीं करते। लेकिन गंदगी फेंकेंगे वहीं जहां इसके लिए उचित स्थान बना हुआ है।
बिखरे हुए काग़ज़ के टुकड़े , पॉलीथीन, खाने-पीने की चीज़ें या आवारा जानवर सड़कों पर कभी नहीं दिखेंगे। सड़कों के किनारे थूक-खखार या गुटके से बनी पट्टियां क़तई नहीं नज़र आएंगी। इनका ख़याल रखना हर नागरिक अपना कर्तव्य समझता है। इससे सड़कों पर पैदल पथिकों को भी चलने में कोई समस्या नहीं आती। यही वजह है कि यहां की सड़कें साफ- सफ़ाई के मामले में बेजोड़ हैं।
चौराहे पर ट्रैफ़िक पुलिस वाले चौबीसों घंटे खड़े नज़र नहीं आते। लोग खुद यातायात के नियमों का पालन बड़ी तत्परता से करते हैं। इससे सड़क जाम की समस्या नहीं आती। साईकिल, कार या फिर पैदल चलने वालों के लिए रास्ते बने हुए हैं। जिनका पालन निश्चित रूप से सभी नागरिक करते हैं।
स्वीडन में वाहनों के हॉर्न की आवाज काफी कम होती है
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पैदल चलने वालों को सड़क पर पहला अधिकार प्राप्त है। यानी अगर कोई सड़क पार कर रहा हो तो उसे सभी वाहन चालक पूरा समय देते हैं ताकि वह इत्मिनान से सड़क पार कर सके। ऐसा नहीं करना असम्मानित व अपराध तुल्य माना जाता है। इससे यहां सड़क दुर्घटना काफ़ी कम होती है। वाहनों के हॉर्न की आवाज यानी ध्वनि प्रदूषण काफी कम होती है।यह कल्चर अमूमन सभी यूरोपीय देशों में है।
आपको यह जानना सुख़द लगेगा कि यहां लोग मिलने पर फूलों के गुलदस्ते से ज्यादा पौधे देना बेहतर मानते हैं। वे जब एकदूसरे के यहां जाते हैं तो फूलों के गुच्छों के अलावा पॉट में लगे पौधे भी देते हैं। यह वृक्षारोपण और पर्यावरण को लेकर यहां के लोगों के भाव को दर्शाता है। यहां तक कि गर्मी की छुट्टियों से पहले स्कूलों में छोटे बच्चों को पौधे गिफ़्ट किये जाते हैं। जिसे वे छुट्टियों के दौरान घर में सींच कर बड़ा करते हैं। ऐसा बच्चों को पर्यावरण से जोड़ने और पौधे लगाने को प्रेरित करने के लिए किया जाता है।
स्कूलों में लड़के - लड़कियों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता। प्रीस्कूलों में लड़कों को ख़ासतौर पर किचन-किचन खेलने के लिए प्रेरित किया जाता है। जिसमें में खाने के बर्तनों, चूल्हे, माइक्रो ओवन से परिचित होते हैं। ऐसा करने के पीछे उद्देश्य लड़कों को रसोई से जोड़ना है। यहां घर का खाना बनाना, घर की साफ सफ़ाई और बच्चों का लालन पालन केवल महिलाओं का काम नहीं। ऐसा सोचने वालों को लोग कुंठित मानसिकता का मानते हैं।
समय की पाबंदी स्कूल, कॉलेज, दफ़्तर से लेकर सामान्य दुकानों तक में देखने को मिल जाएगी
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इनके साथ लोग उठना-बैठना पसंद नहीं करते। यहां महिलाओं और पुरूषों के बीच बराबरी के अवसर व अधिकार हैं। यही वजह है कि यहां महिलाओं के यौन शोषण, उन्हें दबाने-धमकाने और दूसरे पायदान पर रखने जैसी दिल दुखाने वाली घटनाएं नहीं के बराबर होती हैं।
समय की पाबंदी स्कूल, कॉलेज, दफ़्तर से लेकर सामान्य दुकानों तक में देखने को मिल जाएगी। चश्में की दुकान पर नज़र की जांच करवाने गए एक भारतीय युवक को दुकान से सिर्फ़ इसलिए वापस लौटना पड़ा क्योंकि वह दिये गये समय से चार मिनट देर से पहुंचा था। उसे इस काम के लिए दोबारा समय लेना पड़ा। और दुकान पर समय से पहुंचने की हिदायत भी मिली। अब जहां आम जनता अपने कर्तव्य के निर्वहन को लेकर इतनी ईमानदार और जागरूक हो वहां की वाहवाही तो होगी ही। हम भारतीयों को भी यहां से सबक़ लेकर अपने सिविक सेंस में सुधार और नियमों का पालन करना चाहिए।
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