30 सितंबर 2026 को, दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाय दुबई’ की उड़ान एफजेड 1073 लगभग सामान्य लग रही थी। बोइंग 737 में करीब 174 यात्री सवार थे। उड़ान के दूसरे घंटे के आसपास कॉकपिट में वह हुआ, जिसकी कल्पना यात्री शायद ही करते हों। इजरायली अधिकारियों और यात्रियों के बयानों के अनुसार, ओमानी नागरिक बताए जा रहे को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर चाकू से जानलेवा हमला किया और विमान के नियंत्रण पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। विमान अचानक तेज गोता लगाने लगा।
कैप्टन स्मित मच्छर का अनुभव और प्रशिक्षण
ट्रैकिंग ऑकड़ों के हवाले से यह कहा गया है कि कुछ ही क्षणों में ऊंचाई कई हजार फीट गिर गई। घायल कप्तान ने लड़ते हुए कॉकपिट का दरवाजा खोला, जिससे यात्री और चालक दल हमलावर को काबू कर सके और एक भयंकर हवाई त्रासदी टल गई।
हमलावर का मकसद, चाकू का कॉकपिट में पहुंचना और अलार्म की पूरी शृंखला अभी जांच के अधीन है। एयरलाइन ने पायलटों की पहचान सार्वजनिक नहीं की थी। उनके नाम इजरायली मीडिया, अधिकारियों और बाद में भारतीय दूतावास के बयानों से सामने आए। हादसे के बाद कैप्टन स्मित सऊदी अरब के तबूक अस्पताल में स्थिर बताए गए हैं। फिर भी जो बात अब तक के बयानों से साफ है, वह साहस और सूझबूझ की परिभाषा बदल देती है। साहस हमेशा विमान को अकेले उतार लेने का नाम नहीं होता। कभी-कभी साहस खून से लथपथ होकर भी उस एक स्विच तक पहुंचने का नाम होता है, जिससे बाकी लोग अंदर आ सकें।
यात्रियों की हिम्मत और आपातकालीन लैंडिंग
कैप्टन स्मित मुंबई से एक भारतीय पायलट हैं। भारत की एक निजी एयरलाइन में कई साल रहने के बाद जून 2022 में फ्लाय दुबई में डायरेक्ट-एंट्री के द्वारा कैप्टन बने और बोइंग 737 पर हजारों घंटे की कमान संभाली है। प्रशिक्षण कप्तान के रूप में उनका काम दूसरों को विमान उड़ाना सिखाना था। लेकिन कल उन्होंने खुद को सिखाया हुआ सबसे कठिन पाठ दोहराया जब सिस्टम टूटने लगे, तो इंसान की प्राथमिकता विमान को लोगों के हवाले करना है, न कि अकेले नायक बने रहना।
गौरतलब है कि कॉकपिट का दरवाजा जान-बूझकर ऐसा बनाया जाता है कि बाहर से आसानी से न खुले। अमरीका में हुए 9/11 हमले के बाद यही डिजाइन हवाई सुरक्षा की रीढ़ बना। उसी डिजाइन ने कल एक विरोधाभास पैदा किया। अगर कप्तान बेहोश हो जाते और दरवाजा बंद रहता, तो बाहर खड़े यात्री चाहे कितने भी बहादुर होते, अंदर नहीं पहुंच पाते। यात्री यानिव हायून, जिन्हें प्लंबर बताया गया, ने बाद में कहा कि दरवाजा उनके पहुंचने पर खुला था और उनका अनुमान है कि घायल कप्तान ने गिरने से पहले उसे खोल दिया।
क्रू स्क्रीनिंग और कॉकपिट सुरक्षा पर सवाल
इजरायली प्रवक्ता के हवाले से यह भी कहा गया कि कैप्टन स्मित ने बची हुई ताकत के आखिरी क्षणों में रिलीज का बटन दबाया। यह सूझबूझ की पहचान है। घाव की पीड़ा, खून और विमान के गोता लगाने का शोर, इन सबके बीच दिमाग ने वह काम चुना जो सामूहिक बचाव को संभव बनाता है। नेतन्याहू ने इसे 9/11 जैसी आपदा रोकने वाली बहादुरी कहा। जांच चाहे जो भी निष्कर्ष दे, इस क्षण की कीमत कम नहीं होती।
वहीं इस कहानी में साहसी यात्रियों का योगदान भी सराहनीय है। हायून ने हमलावर को पकड़ा, गला दबाकर नियंत्रण पैनल से दूर खींचा और फिर उन लीवरों को खींचा जो उन्होंने एयर-क्रैश संबंधित डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में देखे थे। विमान में सवार ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने बाद में नियंत्रण संभाला और तबूक में इमरजेंसी लैंडिंग कराई। एक दंत चिकित्सक यात्री ने कप्तान का खून रोकने में मदद की। चार-पांच अनजान लोगों ने मिलकर वह काम किया, जिसके लिए कोई प्रशिक्षण मैनुअल केबिन में नहीं बांटा जाता। विमान सुरक्षित उतरा और सभी यात्री बच गए।
हम पायलट की वीरता के गीत गाते हैं और गाने भी चाहिए। लेकिन क्या हम यात्री के रूप में खुद को केवल सीट बेल्ट बांधने वाला उपभोक्ता मानकर चलते हैं? कल की उड़ान ने दिखाया कि कॉकपिट की दीवार के बाहर भी फैसले लिए जाते हैं। जो यात्री आगे की ओर दौड़े, उन्होंने घबराहट में चिल्लाकर गलियारा नहीं रोका। जिन्होंने हमलावर को दबाए रखा, उन्होंने कैमरा निकालकर वीडियो नहीं बनाया। यह फर्क प्रशिक्षण से कम, मानसिक तैयारी से ज्यादा आता है।
यात्री जागरूकता का मतलब हर व्यक्ति का कमांडो बनना नहीं है। बल्कि आपात स्थिति में तीन बातें पहले से पता हों। पहली, एग्जिट कहां हैं और वे कैसे खुलते हैं, सुरक्षा प्रदर्शन के दौरान फ़ोन देखना बाद में महंगा पड़ सकता है। दूसरी, अचानक गोता या तेज झुकाव में अपनी सीट पर टिके रहना और दूसरों को भी वही करने देना, क्योंकि अव्यवस्थित भीड़ कॉकपिट तक पहुंचने वाले लोगों का रास्ता रोक देती है।
तीसरी, अगर कॉकपिट से संघर्ष की आवाज आए और दरवाजा खुले, तो निर्णय का क्षण बहुत छोटा होता है। भीड़ में से कुछ लोगों का आगे बढ़ना, बाकी का रास्ता देना और हमलावर को नियंत्रण से दूर रखना। ऐसा ही कुछ कल हुआ। हायून ने स्वीकार किया कि उन्होंने टेलीविज़न पर देखे नियंत्रण खींचे। यह आदर्श प्रशिक्षण नहीं है। फिर भी शून्य से बेहतर है। एयरलाइंस और नियामकों को केबिन क्रू के साथ यात्रियों के लिए छोटे, वास्तविक अभ्यासों पर गंभीरता से सोचना चाहिए।
सतर्कता और सामूहिक वीरता का संदेश
एक और सबक क्रू की जांच और कॉकपिट संस्कृति का है। इजरायली अधिकारियों का कहना है कि विदेशी क्रू की स्क्रीनिंग सख्त होती है, फिर भी यह घटना हुई। चाकू या नुकीली वस्तु कॉकपिट तक कैसे पहुंची, यह सवाल एयरलाइन और दोनों देशों की जांच एजेंसियों पर है। साथ ही यह याद दिलाता है कि दो-पायलट सिस्टम की ताकत तभी है जब दोनों एक-दूसरे पर भरोसा कर सकें। जब भरोसा टूटे, तो बचे हुए पायलट के पास कुछ ही सेकंड होते हैं। कैप्टन स्मित ने वे सेकंड दूसरों को सौंप दिए।
भारतीय विमानन के लिए यह गर्व का क्षण है, लेकिन गर्व को ढाल न बनाया जाए। कैप्टन स्मित की कहानी यह नहीं कहती कि भारतीय पायलट स्वभाव से हीरो होते हैं। वह कहती है कि अनुशासन, घंटों का अनुभव और संकट में प्राथमिकता तय करने की आदत जान बचाती है। इस हादसे की जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। जिससे यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि हथियार की उत्पत्ति, अलार्म 7500 क्यों बना और ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने लैंडिंग कैसे संभाली? पारदर्शिता ही अगली उड़ान को सुरक्षित बनाएगी।
अंत में बात यात्री से है। अगली बार जब क्रू सुरक्षा कार्ड उठाए, तो उसे औपचारिकता मत समझिए। अपनी पंक्ति के एग्जिट गिनिए। यह याद रखिए कि घबराहट संक्रामक होती है और संयम भी। कल कॉकपिट में एक भारतीय पायलट ने खून बहते हुए दरवाजा खोला। केबिन में कुछ साहसी लोगों ने वह मौका व्यर्थ नहीं जाने दिया। वीरता अकेले कॉकपिट की संपत्ति नहीं रही। वह साझी हुई। यही इस घटना का सबसे जरूरी संदेश है।
------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।