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सामाजिक चुनौती: आम आदमी को जल्द न्याय मिले, तभी अमृत महोत्सव की सार्थकता

सार

जब आम आदमी पुलिस और सरकारी कार्यालाय के कर्मचारियों से निराश होता है तो न्यायालयों का रुख करता है। उसे उम्मीद होती है कि न्याय के मंदिर में उसे इंसाफ मिलेगा, लेकिन यहां भी लंबी प्रक्रिया में उसके अरमान टूट जाते हैं। न्याय के लिए उसे लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई-कई पीढ़ियों तक केस चलते रहते हैं।
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न्याय में देरी क्यों, बड़ा सवाल - फोटो : pixabay
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विस्तार
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चर्चित बॉलीवुड फिल्म  'लगे रहो मुन्नाभाई' में एक बुजुर्ग अपनी पेंशन के लिए सरकारी क्लर्क के आगे निर्वस्त्र होना शुरू कर देता है, क्योंकि वो फाइल आगे नहीं बढ़ने से निराश होकर सबका ध्यान खींचना चाहता है। बुजुर्ग को देखकर भीड़ इकट्ठा होती है और क्लर्क आनन-फानन में फाइल पर साइन कर देता है। यह किस्सा फिल्मी जरूर है, पर हमारे सिस्टम को गहरी चोट करता है।

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देश में इन बुजुर्ग जैसे लाखों लोग हैं, जो सरकारी कार्यालयों की धूल फांक रहे हैं। ताजा उदाहरण राजस्थान के उदयपुर का है, जहां 12 नवंबर को अहमदाबाद रेल मार्ग पर ओड़ा ब्रिज पर ब्लास्ट कर पटरियों को उड़ा दिया गया। घटना के बाद जो खुलासा हुआ, वह  कुछ-कुछ फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई से मिलता-जुलता है, फर्क केवल इतना है कि पीड़ितों ने रास्ता गलत चुना।

सरकार के प्रति बढ़ती हताशा

उदयपुर के ओड़ा ब्रिज पर हुए ब्लास्ट के खुलासे ने आमजन की सरकार के प्रति बढ़ती हताशा को दर्शाया है। इस ब्लास्ट के जो आरोपी पकड़े गए हैं, उन्होंने खुलासा किया कि उनकी भूमि रेलवे और हिंदुस्तान जिंक कंपनी ने अधिकृत की थी, लेकिन 45 साल बीत जाने के बावजूद ना तो उन्हें मुआवजा मिला और ना ही नौकरी। सरकारी कार्यालय के वर्षों तक चक्कर लगाने के बाद भी जब सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने ध्यानाकर्षण के लिए रेलवे ट्रैक पर विस्फोटक लगा दिया। पुलिस भी कह रही है कि इनका इरादा किसी की जान लेना नहीं था।

एक दिन पहले मुंबई में मंत्रालय की इमारत से एक व्यक्ति ने कूदकर आत्महत्या की कोशिश की, क्योंकि उसकी महिला मित्र के साथ घटी दुष्कर्म की घटना पर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है, जबकि वो चार पत्र तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तक को लिख चुका था। शुक्र यह रहा कि मंत्रालय में सुरक्षा की दृष्टि से लगाए जाल में फंसकर उसकी जान बच गई।

यह तो चंद उदाहरण हैं। यदि देशभर की सूची बनाई जाए तो ऐसे लाखों मामले मिलेंगे, जहां आम आदमी सरकारी प्रक्रिया में उलझ कर हताश और निराश हो चुका है। न्याय के लिए गुहार लगाते-लगाते उसकी चप्पले घिस चुकी हैं।

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हमारे नेता चुनाव के समय वादे तो लंबे-चौड़े करते हैं। घर-घर जाकर दस्तक देते हैं, पर चुनाव के बाद इन्हीं नेताओं को आम आदमी ढूंढता रह जाता है। आखिर क्या वजह है कि जनता के टैक्स के पैसों से वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारी-अधिकारी आम आदमी का काम करने से परहेज करते हैं।

काम के बदले रिश्वत का चलन आम हो गया है। रोजाना भ्रष्ट अधिकारियों के पकड़े जाने की खबरें आती हैं। करोड़ों का कैश नेताओं और अधिकारियों के घरों से मिल रहा है।

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जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड - फोटो : Pixabay

भ्रष्टाचार बड़ी चुनौती

यदि अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के आंकड़ों को देखें तो भारत का भ्रष्टाचार में जो नंबर है, वह बहुत ही निराशाजनक है।भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक 2021 के आंकड़े जारी किए गए, उसमें भारत का नंबर 180 देशों में 85वां रहा। यदि हम विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2022 पर नजर डालें, जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास समाधान नेटवर्क द्वारा जारी किया जाता है, उसमें भारत को 146 देशों में 136वें नंबर पर रखा गया।

यदि इस रिपोर्ट को सच मान लिया जाए तो हमारे यहां लोग प्रसन्न भी नहीं हैं। यह कहना तो सही नहीं है कि हर व्यक्ति सरकार के कामकाज से नाखुश है, लेकिन यह भी सच है कि आंकड़े तो इसी ओर इशारा करते हैं कि स्थितियां अच्छी नहीं हैं।

जब आम आदमी पुलिस और सरकारी कार्यालाय के कर्मचारियों से निराश होता है तो न्यायालयों का रुख करता है। उसे उम्मीद होती है कि न्याय के मंदिर में उसे इंसाफ मिलेगा, लेकिन यहां भी लंबी प्रक्रिया में उसके अरमान टूट रहे हैं। न्याय के लिए उसे लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। कई-कई पीढ़ियों तक केस चलते रहते हैं।


जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड

देश की निचली अदालतों की बात करें तो एक लाख से अधिक केस ऐसे हैं, जो पिछले 30 साल से न्यायालयों में पेंडिंग हैं। यदि न्यायालयों में चल रहे सभी केसों की संख्या देखें तो 4.50 करोड़ से ज्यादा केस कोर्ट में लंबित हैं, इनमें सुप्रीम कोर्ट में 70 हजार से ज्यादा और हाईकोर्ट में 58 हजार से ज्यादा केस शामिल हैं। यहां यह कहावत सटिक बैठती है, जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड यानी न्याय में देरी अन्याय के समान है।

आम आदमी सरकार पलटने की ताकत रखता है। यह देश ने कई बार देखा है। वर्ष 1975 में आपातकाल के बाद जनता से इंदिरा गांधी जैसी मजबूत नेता की सरकार को बदल दिया था, जबकि चंद वर्ष पहले वो भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय की नायिका बनकर उभरी थीं।

यूपीए-2 सरकार के अंतिम वर्षों में भ्रष्टाचार को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश की जनता तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई थी। सरकार की विदाई हो गई थी। सवाल यह है कि जनता परिवर्तन तो कर देती है, लेकिन न्याय उसे फिर भी नहीं मिल पाता। इससे तो यही लगता है कि कुर्सी पर केवल चेहरे बदल रहे हैं, व्यवस्था को सुधार पाना आसान नहीं है।

अंग्रेजी मानसिकता से कब आएंगे बाहर

भारत को वर्ष 1947 में स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन हम अंग्रेजों की शासन प्रणाली से आज तक बाहर नहीं निकल पाए हैं। आज भी ब्यूरोक्रेसी अंग्रेजी मानसिकता से ग्रसित है। सरकार बदलती रहती हैं, पर अधिकारियों का रवैया नहीं बदलता। हालांकि, स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक प्रणाली में सुधार के लिए समितियां बनती आ रही हैं।
वर्ष 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन हुआ। आयोग ने ढेरों सुझाव दिए, लेकिन सरकारी अनिच्छा और नौकरशाही की उदासीनता के कारण कोई खास बदलाव नहीं हुआ। वर्ष 2005 में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोईली की अध्यक्षता में द्वितीय प्रशासनिक आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने भी सुधार की बातें कहीं, पर समस्या यह है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकता नतीजे देने के बजाय नौकरी बचाने की है।

देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए। हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, लेकिन इस महोत्सव में आम आदमी अपने लिए खुशी नहीं ढूंढ पा रहा है। 75 साल बाद भी वह अपनी समस्या बताने के लिए रेलवे ट्रैक पर बम लगाने को विवश नजर आता है, जबकि उसे पता है कि पकड़े जाने पर जेल मिलेगी। आखिर व्यवस्था में परिवर्तन क्यों नहीं हो पा रहा है?

क्या केवल सरकार इसके लिए जिम्मेदार है या आम आदमी भी कहीं न कहीं अपने दायित्वों का निर्वाहन नहीं कर पा रहा? अमृत महोत्सव में इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढना भी आवश्यक है, ताकि न्याय के लिए किसी को रेलवे ट्रैक न उड़ाना पड़े और न ही मंत्रालय की इमारत से कूदना पड़े।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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