करीब सौ साल के संघर्ष, आत्म-बलिदान और न मालूम कितने त्याग और तपस्या के बल पर 15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए। 15 अगस्त हमारा स्वतंत्रता दिवस है। इस साल हम अपनी स्वतंत्रता का 75वां साल अर्थात अमृत महोत्सव मना रहे हैं। यह अवसर है हम अपनी फ़िल्मों पर भी एक नजर डालें और देखें उनमें स्वतंत्रता कैसे चित्रित हुई है?
जिन्होंने जीवन की बाजी लगा कर हमें एक स्वतंत्र देश सौंपा, ये लोग वास्तव में तूफ़ान से कश्ती निकाल कर ही लाए थे। नई पीढ़ी को स्वतंत्र देश उपहार के रूप में प्राप्त हुआ। जो हमें अनायास प्राप्त होता है उसकी वास्तविक कीमत हम नहीं आंक पाते हैं।
कवि लिखता है, मुल्क हर बला को टाल कर अपनी मंजिल पर पहुँचा है। बापू ने इसे अपने खून से सींचा है और शहीदों ने दीपक जलाए रखा है अब तुम्हारी पारी है, तुम इसका भविष्य हो। कवि 1954 (फ़िल्म ‘जाग्रति’ का रिलीज वर्ष) में हमें आगाह करता है कि हम बारूद के ढ़ेर पर बैठे हुए हैं। सावधान रहना, आलस नहीं करना, देश को आगे ले जाना।
प्रदीप का लिखा, लता मंगेशकर का गाया, हेमंत कुमार का संगीतबद्ध ‘जागृति’ फ़िल्म का ही एक और गीत है, ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढ़ाल, साबरमति के संत तूने कर दिया कमाल’। गीत कुछ शब्दों में गाँधी, आजादी का संघर्ष और भारत की तस्वीर उकेर देता है। राष्ट्रीय त्योहारों पर इन्हें अवश्य बजाया जाता है।
स्वतंत्रता संग्राम, शहीद, गुलामी के अत्याचार, आजादी इन विषयों पर भारत की लगभग सारी भाषाओं के सिनेमा में काम हुआ है। मलयालम में 2011 में एक फ़िल्म का नाम ही रखा गया ‘अगस्त 15’। साजी कैलास की इस फ़िल्म को एस.एन. स्वामी ने लिखा है। यह सफ़ल नहीं रही, इसमें मलयालम के प्रसिद्ध अभिनेता मम्मूटी ने क्राइम ब्रान्च ऑफ़ीसर की प्रमुख भूमिका निभाई है।
मलयालम फ़िल्म ‘कालापानी’
1996 में बनी मलयालम फ़िल्म ‘कालापानी’ खूब सफ़ल रही। गुलामी के दौरान न मालूम कितने लोगों को कालापानी की सजा दी गई। कालापानी मतलब अंदमान द्वीप के सेलुलर जेल में सड़ा देना। यहाँ कैदियों पर अमानुषीय अत्याचार किए जाते थे। इन कैदियों में अधिकतर राजनैतिक कैदी हुआ करते थे। इनको झूठे मुकदमे में फ़ंसा कर कालापानी की सजा दे दी जाती थी।
आने वाली पीढ़ियों को अवश्य जानना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए लोगों ने कितना अत्याचार सहा था। ‘कालापानी’ 1915 के ब्रिटिश इंडिया की बात करती है। डॉक्टर गोवर्धन मेनन को ट्रेन में बम फ़ेंकने के झूठे आरोप में गिरफ़्तार करके पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल भेज दिया जाता है। वहाँ डॉक्टर कैदियों पर होने वाले भयंकर अत्याचार को देखता है। 1965 में भारतीय सेना का ऑफिसर सेतु अपनी ऑन्ट पार्वती के पति डॉक्टर गोवर्धन मेनन के विषय में पता करने के लिए कालापानी जाता है। वहाँ जाकर वह रिकॉर्ड्स खंगालता है, उसे गोवर्धन के इतिहास का पता चलता है।
गोवर्धन राष्ट्रवादी था उसे उसकी शादी के दिन गिरफ़्तार कर सेलुलर जेल भेज दिया गया था। उस पर 55 लोगों से भरी ट्रेन, जिसमें अंग्रेज भी थे में बम फ़ेंकने का आरोप था। यहाँ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल तमाम लोग सजा काट रहे थे। एक आइरिस जेलर डेविड बेरी (एलेक्स ड्रैपर) बहुत दुष्ट है, इंग्लिश डॉक्टर लेन हटन दयालु है।
14 लोगों की रिहाई का आदेश आता है, पर जेलर और मिर्ज़ा खान मिल कर जेल भागने के नाम पर कैदियों को मार डालते हैं। सच्चाई जान कर गोवर्धन जेलर तथा मिर्ज़ा को मार डालता है। गोवर्धन का क्या हुआ, सेतु अपनी ऑन्ट को क्या बताता है, यह सब आप स्वयं देखें।