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खेल का जज्बा: ऋषभ पंत केवल एक क्रिकेटर नहीं, एक योद्धा भी हैं...

सार

  • यदि संघर्ष को ऋषभ पंत का नाम दिया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऋषभ पंत संघर्ष की भट्ठी में तपकर खरा सोने बने हैं। जब भी क्रिकेट इतिहास की पुस्तक लिखी जाएगी, उसमें ऋषभ पंत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा होगा। 
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ऋषभ पंत चोट के बाद भी मैदान पर रहे मौजूद - फोटो : PTI
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कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी, 

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सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जमां हमारा।


अल्लामा इकबाल का यह शेर भारतीय क्रिकेट टीम के विकेटकीपर-बल्लेबाज ऋषभ पंत पर सटीक बैठता है। इंग्लैंड के खिलाफ महत्वपूर्ण चौथे टेस्ट में क्रिस वोक्स की बॉल पर दाहिने पैर का अंगूठा तुड़वाने के बावजूद न केवल ऋषभ पंत टीम के लिए पिच पर लौटे, बल्कि हॉफ सेंचुरी भी बनाई।

यदि संघर्ष को ऋषभ पंत का नाम दिया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऋषभ पंत संघर्ष की भट्ठी में तपकर खरा सोने बने हैं। जब भी क्रिकेट इतिहास की पुस्तक लिखी जाएगी, उसमें ऋषभ पंत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा होगा। 
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ऋषभ पंत मूलतः उत्तराखंड के निवासी हैं। बचपन से उन्हें क्रिकेट खेलने का शौक था। पिता राजेंद्र पंत, जो पेशे से वकील थे, ने बेटे की इस खूबी को पहचाना। बेटे को क्रिकेटर बनने के लिए वह परिवार के साथ दिल्ली आ गए। दिल्ली में क्रिकेट कोच तारक सिन्हा ने ऋषभ पंत की प्रतिभा को देखा और उन्हें ट्रेनिंग दी। ऋषभ पंत जल्द दिल्ली की घरेलू टीम में शामिल हो गए।

वर्ष 2016 में अंडर-19 वर्ल्ड कप में वो भारतीय टीम का हिस्सा बने। एक मैच में पंत ने मात्र 18 गेंदों पर हॉफ सेंचुरी लगाई। अंडर-19 वर्ल्ड कप में वह भारत के शीर्ष रन बनाने वाले बल्लेबाज बने थे। अगले ही साल फरवरी 2017 में ऋषभ पंत टीम इंडिया का हिस्सा हो गए। उन्होंने अपना पहला टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच इंग्लैंड के खिलाफ बेंगलुरु में खेला। अगले वर्ष 2018 में उन्हें वनडे और टेस्ट, दोनों में शामिल कर लिया गया।

जब वर्ष 2017 में ऋषभ पंत अपना पहला आईपीएल सीजन खेल रहे थे, तब अचानक हार्ट अटैक से उनके पिता की मृत्यु हो गई। अगले दिन मैच था। पंत पिता के अंतिम संस्कार के बाद न केवल मैदान पर उतरे, बल्कि टीम के लिए शानदार प्रदर्शन भी किया। तब पंत ने कहा था कि पापा मेरे कोच थे, मेरे गाइड थे, मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे। यह उनके खेल के प्रति समर्पण का पहला उदाहरण था।
  
रोड एक्सीडेंट भी न तोड़ सका हौंसला

सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 30 दिसंबर 2022 को पंत के जीवन में एकाएक खतरनाक मोड़ आ गया। वो मां को सरप्राइज देने के लिए अपनी कार से उत्तराखंड जा रहे थे। सुबह 5.30 बजे दिल्ली-देहरादून हाईवे पर रुड़की के पास नींद की झपकी आने से उनकी कर डिवाइडर से टकरा गई। तेज गति से टक्कर के कारण कार में आग लग गई। कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी।

पंत जली हुई हालत में मुश्किल से कार से बाहर निकले। उनके शरीर के कपड़े तक जल गए थे। शरीर पर कई जगह गंभीर चोटें लगी थीं। हरियाणा रोडवेज की बस के ड्राइवर-कंडक्टर ने उन्हें नजदीक के अस्पताल पहुंचाया। तब कोई यह नहीं कह सकता था कि ऋषभ पंत दोबारा कभी क्रिकेट भी खेल पाएंगे।

दुर्घटना में पंत के दाहिने घुटने के लिगामेंट्स पूरी तरह फट गए थे। पैर और पीठ पर गंभीर चोटें थीं। चेहरा आंशिक रूप से झुलस गया था। हाथों में कई जगह कट लगे थे। डॉक्टर ने यहां तक कहा था कि यदि पंत कुछ सेकंड और अपनी कार में फंसे रहते तो जीवन मुश्किल में पड़ जाता।

डॉक्टरों ने कहा था कि पंत को मैदान पर उतरने में कम से कम 18 महीने लगेंगे, लेकिन यह जुझारू खिलाड़ी 15 महीने बाद ही शारीरिक और मानसिक संघर्ष से जीतकर मैदान पर न केवल उतरा, बल्कि दिल्ली कैपिटल्स की कप्तानी संभाली। 

अच्छे फॉर्म को देखते हुए वर्ष 2024 में ऋषभ पंत को पुनः टीम इंडिया की टेस्ट टीम में शामिल कर लिया गया। उनकी वापसी को भारतीय क्रिकेट के इतिहास की सबसे प्रेरणादायक वापसी कहा गया है। कई पूर्व क्रिकेटरों ने यहां तक कहा कि यह सिर्फ क्रिकेट की नहीं, एक योद्धा की वापसी है। उन्हें 'फिनिक्स' की तरह दोबारा उड़ने वाला खिलाड़ी भी कहा गया।

इंग्लैंड के खिलाफ मैनचेस्टर में चल रहे चौथे टेस्ट का नतीजा कुछ भी हो, लेकिन पंत का साहस के लिए इस टेस्ट मैच को याद रखा जाएगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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