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ईरान पर अमेरिका के इस फैसले से भारत के सामने संकट, चीन-पाकिस्तान को मिलेगा ये मौका

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मसूद के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने के लिए भारत अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करेगा? - फोटो : अमर उजाला
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आतंकवाद पर भारत के सख्त तेवर दुनिया के मंच पर गंभीर तो दिखाई दे रहे हैं लेकिन आतंक के खिलाफ लड़ाई में दिग्गज मुल्कों का साथ उसके अपने अंतरराष्ट्रीय हितों को भी चुनौती दे रहा है। ताजा मामले में अमेरिका का यह कहना कि भारत ईरान से तेल खरीद बंद कर दे और पाक आतंकी मसूद अजहर पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका का साथ ले ले भारत के सामने दुविधा के साथ नया संकट पैदा कर रहा है।

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अमेरिका के इस संदेश में परोक्ष रूप से इस बात के संकेत हैं कि भारत फैसला करे कि उसे ईरान से तेल खरीदना है अथवा मसूद अजहर पर प्रतिबंध के मामले में अमेरिकी मदद हासिल करना है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या मसूद के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने के लिए भारत अमेरिकी शर्तों को स्वीकार करेगा। क्या अंतर्रराष्ट्रीय मीडिया में चल रही 2 मई से भारत के ईरान से तेल आयात बंद करने की खबरों पर ठप्पा लगेगा? 

भारत के अपने अंतरराष्ट्रीय हितों की रक्षा तो अमेरिका नहीं करेगा?   - फोटो : PTI
भारत को करना होगी साफ-साफ बात 
मान लिया जाए की 2 मई से भारत को ईरान से तेल आयात बन्द हो जाता है तो फिर हमें सऊदी अरब और अन्य देशों से आयात करना पड़ेगा। तेल की आपूर्ति तो हो जाएगी, लेकिन भारत के अपने अंतरराष्ट्रीय हितों की रक्षा तो अमेरिका नहीं करेगा? अमेरिका का राष्ट्रीय धर्म अपने हितों की रक्षा करना हो सकता है, लेकिन भारत को अमेरिका के राष्ट्रीय धर्म की रक्षा क्यों करना चाहिए? 

दरअसल, भारत को हमेशा अपने दृष्टिकोण से ही अमेरिका के सामने पक्ष रखना पड़ेगा। जब भारत में चुनाव संपन्न हो जाएंगे और नई सरकार काम शुरू करेगी तो उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में अमेरिका को यह साफ़-साफ़ बताना भी होगा कि भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं के मद्देनज़र ईरान से न अभी और न कभी इस तरह का आयात बंद किया जाएगा। 

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीतिक संदेश 
मामला सिर्फ तेल आपूर्ति का ही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कूटनीतिक संदेशों का बड़ा अर्थ होता है। ईरान शिया बहुल आबादी वाला देश है और उसका पड़ोसी सऊदी अरब सुन्नियों का मुल्क़ है। दोनों के बीच कभी मैत्रीपूर्ण रिश्ते नहीं रहे। हालत तो यह है कि सऊदी अरब के शिया मुस्लिम अब ग़द्दार समझे जाने लगे हैं, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान में हिन्दुओं पर भरोसा नहीं किया जाता। ख़बरें तो आई हैं कि वहां 35 शिया मुसलमानों की हत्या कर दी गई।

सऊदी अरब ने कश्मीर के मामले में कभी हिंदुस्तान का साथ नहीं दिया। वह हरदम पाकिस्तान के साथ खड़ा नज़र आता है। ऐसी स्थिति में ईरान से हिंदुस्तान के अच्छे रिश्ते इस महाद्वीप में शक्ति संतुलन की स्थिति बनाते हैं। अमेरिका यह स्थिति नहीं समझ रहा है अथवा जान बूझकर अनजान बनने की कोशिश कर रहा है। 
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चीन-पाकिस्तान की दोस्ती स दुनिया में किसी से छिपी नहीं है। - फोटो : फाइल फोटो
अमेरिका के मासूम तर्क और चीन-पाकिस्तान 
वैसे तो अमेरिका ने सतही तौर पर कहा है कि ईरान के चाबहार बंदरगाह के ज़रिए भारत के अफ़गानिस्तान से कारोबार पर उल्टा असर नहीं पड़ेगा। पर इस मासूम से तर्क के ज़रिए अमेरिका भारत के समझदार लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकता। अमेरिका को नहीं भूलना चाहिए कि चीन ने हिन्दुस्तान के पश्चिम में पाकिस्तान के बलूचिस्तान के ग्वादर और दक्षिण में श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर जिस तरह से क़ब्ज़ा किया है, उससे भारत के लिए चाबहार की स्थिति एक ज़बरदस्त तुरूप के पत्ते की तरह हो गई है। अगर ईरान हिन्दुस्तान को सिर्फ़ अफगानिस्तान में अपना कारोबार करने के लिए चाबहार खोल कर रखेगा तो उसका मतलब ही क्या है? ईरान से हिन्दुस्तान के मज़बूत कारोबारी रिश्ते ही इस उपमहाद्वीप में शक्ति संतुलन की गारंटी हैं। 

क्या हैं भारत के पास विकल्प 
इसके अलावा कोई विकल्प हिन्दुस्तान के पास नहीं है। आने वाले दिन संकेत कर रहे हैं कि अमेरिका पाकिस्तान की मदद लेकर तालिबान से समझौते के बाद अपनी फ़ौज वापस बुला लेगा और अपना पिंड छुड़ाएगा। अगर इस समय भारत अमेरिका की बात मानता है तो अमेरिकी सेना की वापसी के बाद उसकी स्थिति और विचित्र हो जाएगी। उसके बाद भारत की हालत सांप- छछूंदर की हो जाएगी, इसलिए चाबहार या तो पूरी तरह ईरान-भारत के कारोबारी संबंधों के साथ ज़िंदा रहेगा या फिर बिलकुल नहीं रहेगा। तब पाकिस्तान और चीन के लिए भारत की घेराबंदी आसान हो जाएगी। हिन्दुस्तान यह नौबत कभी नहीं आने देना चाहेगा।   

क्या अमेरिका बदलेगा फैसला? 
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की प्रमुख एजेंसियों में चल रही ख़बरें भी यही संकेत देती हैं कि अमेरिकी कांग्रेस एक बार फिर ट्रंप प्रशासन पर दबाव बनाने की तैयारी में है और देर-सबेर अमेरिका को अपना यह फ़ैसला भी बदलना पड़ेगा। इस बात में कहीं किसी को भ्रम नहीं पालना चाहिए। भारत के लिए यह मज़बूत इच्छाशक्ति दिखाने का समय है। अमेरिकी दबाव के आगे बिखरने का आत्मघाती क़दम उठाना हमें ठीक नहीं होगा।   

 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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