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भारत-कुवैत संबंध : पुराने रिश्ते, नई उड़ान भरने को तैयार

सार

India Kuwait relations: भारत और कुवैत के रिश्ते दोनों देशों की आज़ादी से काफी पुराने रहे हैं। बसरा के प्रसिद्ध मोती जो भारत के धनिकों और राजा-महाराजाओं की शोभा बढ़ाते थे उन्हें जांबाज कुवैती गोताखोर ही निकालते थे और फिर यह मोती बसरा बंदरगाह से भारत लाए जाते थे।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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यह विडंबना ही है कि दो देशों के रिश्तों में जब सबकुछ ठीक चल रहा होता है तो अक्सर उनपर ज्यादा ध्यान नहीं जाता है। भारत के प्रधानमंत्री की 43 साल बाद हो रही कुवैत यात्रा को संभवतः यही कारण दिया जा सकता है। शीर्ष स्तर यात्राओं की बात करें तो इससे पहले 1981 में भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने कुवैत दौरा किया था और 11 साल पहले 2013 में कुवैती प्रधानमंत्री भारत आए थे।
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भारत और कुवैत के रिश्ते दोनों देशों की आज़ादी से काफी पुराने रहे हैं। बसरा के प्रसिद्ध मोती जो भारत के धनिकों और राजा-महाराजाओं की शोभा बढ़ाते थे उन्हें जांबाज कुवैती गोताखोर ही निकालते थे और फिर यह मोती बसरा बंदरगाह से भारत लाए जाते थे। वहीं कुवैती कारोबारी लौटते समय अपने साथ मसाले, कपड़े, खाद्य सामग्री और अन्य उत्पाद अपनी नौकाओं में ले जाया करते थे। कुवैत में तेल की खोज से पहले भारत से होने वाला कारोबार, खाड़ी मुल्कों में अपने कौशल के लिए मशहूर कुवैती व्यापारियों की समृद्धि का अहम स्रोत था।

हालांकि दोनों देशों के रिश्ते केवल व्यापार तक ही सीमित नहीं थे। कुवैत के अमीर परिवार के लिए बॉम्बे ( वर्तमान मुंबई) आना एक बड़ा चाव था। उन्होंने मरीन ड्राइव इलाके में एक प्राइम प्रॉपर्टी भी खरीदी थी जहाँ वे खासतौर पर मानसून के समय आया करते थे। यह प्रॉपर्टी अभी भी मौजूद है। दोनों देशों के लोगों के बीच नजदीकी रिश्ते के कारण ही 1961 में भारत उन पहले देशों में शामिल था जिन्होंने कुवैत के साथ रायजनियक संबंध स्थापित किए।
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कुवैत में 70 के दशक के बाद तेल क्षेत्र में कई गुना वृद्धि हुई और तकनीक, शिक्षा, रक्षा और सुरक्षा के लिए कुवैती नितियों का रुख पश्चिम की तरफ ज्यादा हो गया। भारत के साथ कुवैत के रिश्ते तो बरकरार रहे लेकिन उनकी अहमियत पहले जैसी नहीं रही।

बीते दो दशकों में भारत की व्यापक आर्थिक प्रगति और तकनीक, रक्षा जैसे क्षेत्र में बढ़ती क्षमताओं ने भारत-कुवैत संबंधों को आगे बढ़ाने में काफी मदद दी है। भारत के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव ने भी इसमें अपनी अहम भूमिका निभाई है। दोनों देशों के बीच सालाना द्विपक्षीय व्यापार 10 अरब डॉलर से अधिक बना हुआ है। साथ ही कुवैत में 10 लाख से अधिक भारतीय हैं। यह कुवैत की आबादी में 21 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। कुवैत की कुल वर्कफोर्स में भारतीय समुदाय की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत सेअधिक है।

कुवैत भारत के लिए तेल आपूर्ति का छठा सबसे बड़ा स्रोत है और हमारे लिए हमेशा एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता रहा है। भारत में कुवैत के संस्थागत निवेशकों का करीब 15 अरब डॉलर का निवेश है। कुवैत के अल घनिम औऱ अल शाया जैसे बड़े उद्योग घरानों ने भारत के साथ पुराने रिश्तों को बरकरार रखते हुए निर्माण औऱ सेवा क्षेत्र में अपना बड़ा निवेश किया है।

भारत की भी एल एंड टी, शापूरजी पलोनजी, कल्पतरु, केईसी, ईआईएल, मेघा, अशोक लेलैंड, विप्रो, टाटा समूह, टीसीआईएल और किर्लोस्कर जैसी बड़ी कंपनियों ने कुवैत में अपना निवेश किया है। इसके अवाला कुवैत के वित्तीय क्षेत्र में भारत की एलआईसी, न्यू इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस जैसी कंपनियां बीते कई सालों से सक्रिय हैं। कुवैत के साथ भारत के निर्यात ने 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज करते हुए साल 2023-24 में पहली बार 2 अरब डॉलर का आंकड़ा पार किया। वहीं कुवैत में काम करने वाले भारतीय जो धनराशि देश भेजते हैं उसका आंकड़ा 5 अरब डॉलर से अधिक है। कुवैत में भारतीय ब्रांड्स और उत्पादों का महत्व भी कुवैत में लगातार बढ़ रहा है।

हालांकि अभी भारत और कुवैत के संबंधों में बहुत सी संभावनाएं हैं जिन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है। जरा गौर करिए- कुवैत जिसका भौगोलिक क्षेत्र, 18000 वर्ग किमी है (भारत के कई जिले इससे अधिक बड़े हैं) उसके पास 105 अरब बैरल से अधिक का तेल है जो दुनिया में छठा सबसे बड़ा तेल भंडार है। कुवैत के सॉवरिन फंड के पास करीब एक खरब डॉलर के निवेश हैं। ऊंची प्रतिव्यक्ति आय के साथ यह उच्च गुणवत्ता के भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए एक अच्छा बाजार है। ढांचागत विपास पर करीब 100 अरब डॉलर की बड़ी खर्च योजना के साथ कुवैत भारतीय कंपनियो के लिए एक बड़ा अवसर है। इसके अलावा धनी कुवैतियों के लिए भारत अच्छे पर्यटन और पोर्टफोलियो निवेश का मौका भी दे सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिसंबर 21-22, 2024 को हो रहा कुवैत दौरा ऐसी तमाम संभावनाओं का रास्ता मजबूत करेगा। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच हुआ उच्च स्तरीय संवाद इन संभावनाओं को लेकर परस्पर रुचि को साफ दिखाता है। भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर अगस्त 2024 में कुवैत गए थे। वहीं सितंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात न्यूयॉर्क में कुवैत के क्राउन प्रिंस से हुई थी। दिसंबर 2024 की शुरुआत में कुवैत के विदेश मंत्री भी भारत आए थे। बीते कुछ माह में हुआ यह सक्रिय संपर्क बताता है कि भारत औऱ कुवैत के रिश्ते अब एक नई उड़ान के लिए तैयार हैं।

दोनों देशों के संबंधों में मौजूद संभावनाओं का हर संभव फायदा उठाने के लिए काफी तैयारियों भी हुई हैं। इस कड़ी में सात नए कार्य समूह बनाए गए हैं जिसमें व्यापार, निवेश, सुरक्षा, रक्षा, शिक्षा, कौशल विकास, खाद्य सुरक्षा, कृषि और कौंसुलर मामलों जैसे विषय शामिल हैं। इसको लेकर दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की मुलाकात में सहमति भी हुई है। यह भारत औऱ कुवैत के बीच पहले से मौजूद तेल, श्रमिक और स्वास्थ्य संबंधी कार्यसमूहों के अतिरिक्त हैं।

उम्मीद है कि इन नए कार्यसमूहों के सहारे दोनों देश अपने संबंधों को अधिक व्यापक दायरे में बढ़ा पाएंगे और सहयोग कर सकेंगे। लक्ष्य है कि अधिक से अधिक कुवैती पोर्टफोलियो निवेश आकर्षित किया जा सके। साथ ही कुवैती रणनीतिक तेल भंडार भारत में बनाया जा सके जो आपातकाल में काम आ सके, क्योंकि कुवैत का मुख्य तेल बाजार एशिया में ही है। इसके अलावा कोशिश होगी कि कुवैत भारत के पेट्रोकैमिकल क्षेत्र में भागीदारी बढ़ाए। वहीं विश्वस्तरीय क्षमता वाली भारतीय कंपनियां भी कुवैत की आधुनिकीकरण योजनाओं में हिस्सेदार बन सकें। इसके अलावा कुवैत में बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय कामगारों से जुड़े मुद्दों का जल्द समाधान भी एक प्राथमिकता है।  

बीते कुछ समय में रक्षा और सुरक्षा संबंधी विषय को लेकर भारत और कुवैत के रिश्तों में अहमियत बढ़ी है। दोनों देश नियमित संवाद रखते हैं और भारतीय नौसेना के जहाज समय समय पर कुवैती बंदरगाहों पर लंगर भी डालते रहते हैं। मगर संभवतः भारत औऱ कुवैत के बीच इन मुद्दों पर और अधिक ध्यान देने और सक्रिय संपर्क की जरूरत है। पश्चिम एशिया में हाल के घटनाक्रमों के मद्देनजर, एक क्षेत्रीय बेचैनी है। खाड़ी देशों के क्षेत्रीय समूह जीसीसी के अध्यक्ष के तौर पर कुवैत इस इलाके में भारत की साख और प्रभाव का लाभ तनाव को कम करने में उठा सकता है।  
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(सतीश मेहता, पूर्व राजनयिक हैं और कुवैत में भारत के राजदूत रह चुके हैं। यह लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)
 
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