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उतार-चढ़ाव और कई रहस्यों को जन्म देता रहा भारत-इजरायल के बीच का संबंध

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भारत-इजराइल संबंध - फोटो : एजेंसी
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विश्व मंच पर अपने पुराने रुख के उलट, भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद, ईसीओएसओसी, में इजरायल के समर्थन में मतदान किया है। भारत के इस पहल को भारतीय विदेश एवं कूटनीति में परिवर्तन के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ जानकारों का कहना है कि यह हिन्दू राष्ट्रवाद से प्रभावित विदेश नीति है लेकिन ज्यादातर विद्वानों का मानना है कि इसमें कुछ भी नयापन नहीं है।

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अबतक भारत जिस तरह इजरायल का समर्थन करता रहा है, भारत ने अपने रुख में कोई बदलाव नहीं लाया है। भारत द्वीराष्ट्र के सिद्धांत को मानता है और फिलिस्तीन के साथ ही साथ इजरायल के अस्तित्व का भी समर्थन करता है। हालांकि, यह वोटिंग संयुक्त राष्ट्र में फिलस्तीन के मानवाधिकार संगठन ‘शहीद’ को पर्यवेक्षक का दर्जा देने के लिए हुई थी लेकिन कहने वाले चाहे जो कह लें पर भारत के इस रुख ने साफ कर दिया है कि वह अपनी परंपरागत विदेश नीति के इतर नए युग में प्रवेश कर रहा है।

इजरायल और स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत का उदय एक ही वर्ष 1947 में हुआ था। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इजरायल को स्वतंत्रता 1948 में मिली। दोनों देशों के शुरुआती संबंध अच्छे नहीं थे। 1947 में ही भारत ने इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने के विरोध में वोट किया। इसी तरह से 1949 में एक बार फिर भारत ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल को सदस्य देश बनाने के विरोध में वोट किया था। इजरायल के उदय के साथ शुरुआती 2 साल में भारत का पक्ष इजरायल के खिलाफ रहा। 

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भारत-इसराइल संबंध - फोटो : एजेंसी
1950 में पहली बार भारत ने बतौर स्वतंत्र राष्ट्र इजरायल को मान्यता दी। इसके साथ ही भारत ने इजरायल का काउंसल को मुंबई में एक स्थानीय यहूदी कॉलोनी में 1951 में नियुक्त किया। इसे 1953 में अपग्रेड कर काउंसलेट का दर्जा दिया। 1956 में स्वेज नहर के विवाद के बीच इजरायल के विदेश मंत्री मोशे शेरेट ने भारत का दौरा किया। जानकारों के अनुसार 1962 के चीन युद्ध के दौरान इजरायल ने पुरानी घटनाओं को एक सिरे से भुलाकर भारत की हथियारों और दूसरे युद्धक साधनों से मदद की।

आपको बता दें कि उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने इजरायली समकक्ष से पत्र लिखकर मदद मांगी थी। इजरायल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेन गुरियन ने हथियारों से भरे जहाज को भारत रवाना कर पत्र का उत्तर दिया। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर दोनों देशों ने एक-दूसरे से दूरी ही बरती क्योंकि तेल अवीव की निकटता वॉशिंगटन से हमेशा रही।

दूसरी तरफ भारत गुट निरपेक्ष राष्ट्र था और 1961 में बनाए गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का संगठन उसूलन सोवियत रूस की तरफ झुका था। हालांकि सभी प्रमुख युद्धों में इजरायल ने भारत की भरपूर मदद की। 1971 में पाकिस्तान युद्ध और 1999 में करगिल युद्ध में भी इजरायल ने भारत को अत्याधुनिक हथियारों से मदद की। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने जब भारत की खुफिया एजेंसी रॉ का गठन किया था तब भी इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने भारत का व्यापक स्तर पर सहयोग किया।

israel pm in india - फोटो : pti
पहली बार 1992 में भारत के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने भारत-इजरायल के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित किए। यहां यह भी बता दें कि अगस्त 1977 में मोरारजी देसाई के वक्त में इसराइली विदेश मंत्री मोशे दायान का भारत में एक गोपनीय दौरा हुआ था। इसके बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में गर्माहट आनी प्रारंभ हो गयी थी। 1992 में राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद से 2000 में पहली बार लालकृष्ण आडवाणी एक वरिष्ठ मंत्री की हस्ती से इसराइल गए थे।

उसी साल आतंकवाद पर एक इंडो-इसराइली जॉइंट वर्किंग ग्रुप का गठन किया गया। 2003 में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्रा ने अमरीकी यहूदी कमिटी में एक भाषण दिया और उन्होंने इस्लामिक अतिवाद से लड़ने के लिए भारत, इसराइल और अमरीका के साथ आने की वकालत की। हालांकि, इस फैसले के पीछे बहुत से वैश्विक कारण थे, लेकिन भारतीय विदेश नीति में इजरायल का महत्व बढ़ना प्रारंभ हो गया था।

भारत इस बात की समीक्षा कर रहा था जैसे ही सोवियत रूस का विघटन हुआ और इजरायल- फलस्तीन के बीच शांति प्रक्रिया के शुरू हुई भारत ने इजरायल में अपना हस्तक्षेप बढ़ा दिया। इजरायल के साथ भारत के बदलते संबंधों की एक वजह जॉर्डन, सीरिया और लेबनान जैसे अरब मुल्कों ने भी भारत को अपनी रूस और अरब की ओर झुकी विदेश नीति पर सोचने के लिए मजबूर किया। पीएलओ (फलस्तीन की आजादी के लिए संघर्ष करनेवाली संस्था) के प्रमुख, यासिर अराफात के व्यक्तिगत तौर पर इंदिरा गांधी से अच्छे संबंध थे और कहा जाता है कि मुस्लिम वोटों के लिए वह इंदिरा के साथ रैली करने को भी तत्पर रहते थे लेकिन अराफात और लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी हर समय भारत की कश्मीर नीति का विरोध किया और इसके कारण दुनिया के मंचों पर भारत की फजीहत होती रही।  

इजरायल और भारत के बीच बदले संबंधों की असली कहानी सार्वजनिक तौर पर 2015 से नजर आने लगी। संयुक्त राष्ट्र में इजरायल में मानवाधिकार अधिकारों के हनन संबंधी वोट प्रस्ताव के वक्त भारत गैर-मौजूद रहा और इसी के साथ सार्वजनिक रूप से भारत ने इजरायल का साथ देना प्रारंभ कर दिया।  इसके बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला दौरा इजरायल में 2017 में हुआ और पीएम नरेंद्र मोदी ने 3 दिनों का इजरायल दौरा किया। 2018 में बेंजामिन नेतन्याहू ने 6 दिनों का भारत का विस्तृत दौरा किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता संबंधी प्रस्ताव के विरोध में वोट डाले लेकिन अब जाहिर तौर पर इजरायल और भारत के बीच दोस्ती पक्की हो चुकी थी।

मोदी और इजरायल के पीएम
मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही इस बात का अंदाजा लगने लगा था कि अब भारत की विदेश नीति बड़े पैमाने पर परिवर्तित होगी। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो 2006 में इसराइल जा चुके थे और जब वो प्रधानमंत्री के रूप में इसराइली पीएम नेतन्याहू से पहली बार मिले तो उन्हें बतौर राष्ट्र प्रमुख इसराइल आने का उन्होंने न्योता दिया। भारत में भी लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि मोदी काल में इसराइल और भारत के बीच रणनीतिक साझेदारी स्थापित मानदंडों से अलग होने जा रही है, लेकिन इसी महीने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा यरूशलम को इसराइल की राजधानी के रूप में दी गई मान्यता को खारिज करने का प्रस्ताव आया तो भारत ने इसराइल के खलिाफ वोट किया।

भारत और इसराइल के संबंधों को लेकर कहा जाता है कि दोनों देशों के बीच गोपनीय प्रेम संबंध बहुत पहले से रहे हैं। इस मामले में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं कि यह बात अब पुरानी हो गई। उन्होंने मानना है कि दोनों देश में अब खुला प्रेम संबंध हैं। भारतीय प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं, इसराइली प्रधानमंत्री यहां आ रहे हैं। मोदी और नेतन्याहू के बीच कई मुलाकातें हो चुकी हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा सौदों में बढ़ोतरी हुई है। सिब्बल कहते हैं कि अब इसमें क्या गोपनीयता है?

नेहरूयुगीन विदेश नीति जिसमें तीसरी दुनिया की एकता और अहिंसा के सिद्धांत अहम हैं, के आधार पर भारत फलस्तीनियों का खुलकर समर्थन करता रहा है बावजूद इसके भारत ने 1950 में इसराइल को एक स्टेट के रूप में मान्यता दी थी।  कई विशेषज्ञ इस बात को मानते हैं कि भारत जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत किरदार के रूप में उभरता गया वैसे-वैसै अपने हित आधारित नीतियों को अपनाता गया।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया ने नई करवट ली और भारत ने खुद को अंतरराष्ट्रीय परिधि के मध्य में लाया। मध्य-पूर्व में भी भारत ने अपने हितों के हिसाब से नीतियों को अपनाया। व्यवसाय, सुरक्षा, ऊर्जा और राजनयिक हितों के लिहाज से मध्य-पूर्व भारत के लिए काफी खास है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2016-17 में अरब देशों से भारत का व्यापार 121 अरब डॉलर का रहा। यह भारत के कुल विदेशी व्यापार का 18.25 फीसदी हिस्सा है। वहीं इसराइल के साथ भारत का व्यापार पांच अरब डॉलर का था जो कि कुल व्यापार का एक फीसदी भी हिस्सा नहीं है। भारत का इसराइल के साथ सुरक्षा संबंध काफी गहरे हैं जबकि अरब के देश रोजगार, विदेशी मुद्रा और ऊर्जा के लिहाज से काफी अहम हैं। ऐसी परिस्थति में भारत के लिए इजरायल का महत्व तो है लेकिन अरब देशों की शर्तों पर यह संभव नहीं हो सकता है। 

भारत को वहां संतुलन बनाकर रखना होगा। मोदी काल में भारत, इसराइल और अमरीका इतने करीब आए कि इसराइल के पक्ष में कई लोग वोट की उम्मीद कर रहे थे। भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा का इसराइल के साथ शुरू से ही सहानुभूति रही है। इसका एक मात्र कारण यह है कि भारत का बहुसंख्यक समाज मुसलमानों से आक्रांत है और इजरायल का गठन भी मुस्लिम समाज के खिलाफ जाकर ही हुआ है। यहूदी मुसलमानों के कारण ही अपने कथित मूल भूमि से हजारों साल तक कटे रहे।

हालांकि कारण चाहे जो भी कांग्रेस के शासन काल में प्रत्यक्ष रूप से न सही लेकिन परोक्ष रूप से भारत इजरायल का पक्ष लेता रहा है। यही कारण है कि भारत ने गुटनिरपेक्ष देशों के बीच कभी भी इसराइल विरोधी प्रस्तावों को हावी नहीं होने दिया। भारत नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शासन काल में भी फिलिस्तीन के प्रति गंभीर है। यही कारण है कि जब फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास भारत आए थे तो पीएम मोदी ने फिलिस्तीनी चिंताओं का समर्थन किया था। मोदी ने शांतिपूर्ण इसराइल के साथ संप्रभु, स्वतंत्र और एकजुट फिलिस्तीन की बात कही थी।

हालांकि मोदी ने अरब देशों के साथ भी राजनयिक संबंधों में गर्माहट भरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसराइल जाने से पहले वो कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का दौरा कर चुके थे। गणतंत्र दिवस पर अबु धाबी के क्राउन प्रिंस को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित भी किया है। इस प्रकार मोदी ने यह संदेश पहले ही दे दिया है कि वे चाहे इजरायल का जितना समर्थन कर लें लेकिन अरब देशों के प्रति वे उदार हैं और अपना संबंध उनके साथ बनाए रखेंगे। मोदी युग में भी भारत मूल रूप से फिलिस्तीनियों को लेकर द्वी-राष्ट्र सिद्धांत और उसी के आधार पर समाधान पर अडिग है। गहराई से देखें तो इसराइल पर नीतियों को लेकर कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में कोई फर्क नहीं है।

एक साफ-साफ इजरायल का समर्थन करती दिख रही है तो दूसरा गहराई से समर्थन करती रही है। याद रहे विदेश, आर्थिक और कूटनीति में कोई भी देश अपना हित जरूर देखता है। सरकार चाहे जो भी रहे देश में विदेश नीति, आर्थिक नीति और कूटनीति में कोई फर्क नहीं आता है। कई विशेषज्ञ भारत की वर्तमान इजरायल नीति को बेहद सरल तरीके से देखते हैं। भारत के द्वारा इजरायल का खुले तौर पर समर्थन विदेश नीति की सहजता भी हो सकती है। सच पूछिए तो इसराइल के साथ मेलजोल बढ़ाने का मतलब, मुसलमान विरोधी होना नहीं है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का रुख यथार्थवादी रहा है। जैसे-जैसे विश्व परिदृष्य में परिवर्तन आया है भारत अपनी नीतियों को और प्रगाढ बनाता चला गया है साथ ही अपने हितों के प्रति सक्रियता दिखाता चला गया है।

 

इसे हिन्दुत्व के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। भारत की वर्तमान विदेश नीति को स्वतंत्र विदेश नीति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। भारत ने इजरायल का समर्थन कर खुले तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वो विदेश नीति में किसी के मोतहत नहीं है और अपने हितों को ध्यान में रखकर वह अपनी नीतियां बना रहा है। मध्य-पूर्व में भारत एक खास स्थिति में है। भारत एक साथ इसराइल, ईरान और सऊदी तीनों के साथ संबंध रख रहा है और यही भारत के हित में भी है। यदि इसमें से एक भी देश नाराज होता है तो भारत का बहुत बड़ा नुकशान होगा। 


भारत-इजरायल के बीच का संबंध पांच बातों पर आधारित है। पहला स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, इजरायल के लिए भारत शीर्ष हथियार खरीददारों में से एक है। साल 2012 से 2016 के बीच इजरायल द्वारा किए गए कुल हथियार निर्यात में 41 फीसदी हिस्सा केवल भारत का था। इजरायल भारत के लिए तीसरा सबसे बड़ा हथियारों का श्रोत है, जिसके तहत 2012 से 2016 के बीच हुए आयात में अमेरिका (14 प्रतिशत), रूस (68 प्रतिशत) के बाद इजरायल की 7.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी। वैसे इन दोनों देशों के बीच सहयोग के शुरुआती संकेत 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान देखने को मिले थे, जब इजरायल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की थी। इजरायल ने पाकिस्तान के साथ दो युद्धों के दौरान भी भारत की सहायता की।

भारत के असैन्य हवाई वाहनों (यूएवी) का आयात भी अधिकांश इजरायल से होता है। इजरायल से खरीदे गए 176 यूएवी में से 108, खोजी यूएवी हैं और 68 हेरोन यूएवी हैं। अप्रैल 2017 में, भारत और इजरायल ने एक उन्नत मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली के लिए दो अरब डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर किए थे, जो भारतीय सेना को 70 किलोमीटर तक की सीमा के भीतर विमान, मिसाइल और ड्रोन को मार गिराने की क्षमता प्रदान करता है। भारत ने उस साल मई में इजरायल निर्मित स्पाइडर त्वरित प्रतिक्रिया युक्त सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। भारतीय वायुसेना (आईएएफ) इस प्रणाली को अपनी पश्चिमी सीमा पर तैनात करने की योजना बना रही है। आतंकवाद के खिलाफ एक संयुक्त कार्यसमूह के माध्यम से भारत और इजरायल आतंकवाद के मुद्दों पर भी घनिष्ठ सहयोग करते हैं।
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दूसरा कूटनीति, दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 25 साल के प्रतीक के रूप में तीन भारतीय नौसैन्य जहाजों, विध्वंसक आईएनएस मुंबई, युद्धपोत आईएनएस त्रिशूल और टैंकर आईएनएस आदित्य ने मई 2017 में हाइफा बंदरगाह पर एक सद्भावना यात्रा की थी।   तीसरा कृषि, 2015 से 2018 तक के लिए भारत-इजरायल कृषि कार्य योजना संचालित हो रही है और भारतीय किसानों के समक्ष नवीनतम तकनीक का प्रदर्शन करने वाले प्रस्तावित 26 कृषि उत्कृष्टता केंद्रों में से 15 इजरायल की मदद से विकसित किए जा रहे हैं। हरियाणा में करनाल के घरुंड में स्थित कृषि उत्कृष्टता केंद्र पर हर साल 20,000 से अधिक किसान जाकर लाभ लेते हैं। चैथा जल प्रबंधन, 28 जून, 2017 को कैबिनेट ने भारत में जल संरक्षण के राष्ट्रीय अभियान के लिए इजरायल के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) को मंजूरी दी थी।

प्रौद्योगिकी निपुण इजरायल ने जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियां विकसित की है, क्योंकि ताजा पेयजल के सीमित स्रोतों के साथ वह एक अर्ध-शुष्क क्षेत्र में स्थित देश है। इससे पहले भारत और इजरायल ने नवंबर 2016 में जल संसाधन प्रबंधन और विकास सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। पांचवा व्यापार, इजरायल 2016-17 में भारत का 38वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है, जिसके तहत 5.02 अरब डॉलर (33,634 करोड़ रुपये) का व्यापार हुआ, जो 2012-13 के मुकाबले 18 फीसदी कम था। भारत के पक्ष में व्यापार संतुलन 2016-17 में 1.10 अरब डॉलर (7,370 करोड़ रुपये) रहा था। भारत ने इजरायल को 2016-17 में 1.01 अरब डॉलर मूल्य के खनिज ईंधन और तेलों के निर्यात किए थे। 
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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