मेनन को लेकर नेहरू का विरोध संसद के भीतर और बाहर जारी रहा- फाइल फोटो
जैसे ये रक्षामंत्री और सेनाध्यक्ष का झगड़ा न होकर इलाहाबाद मुन्सिपाल्टी के किसी मेयर और सभासद का झगड़ा हो। बेमन से सही थिम्मैया मान गए। लेकिन मेनन को लेकर नेहरू का विरोध संसद के भीतर और बाहर जारी रहा। तब संसद में सबसे तीखे हमले सोशलिस्ट पार्टी के जेबी कृपलानी की तरफ से होते थे।
अभी कुछ साल पहले ही तक कृपलानी कांग्रेस के ही अध्यक्ष रह चुके थे। गांधीजी के करीबी थे। बहुत साफ और खरा-खरा बोलने वाले आदमी थे।
लड़कियों के साथ नग्न सोने के अपने अटपटे प्रयोग पर एक बार गांधीजी ने उनसे राय मांगी तो उन्होंने गांधीजी को लिखा था-"जब तक आपमें मुझे पागलपन और विकृति के लक्षण दिखाई नहीं देते तब तक आपके बारे में मेरा भ्रम कभी दूर नहीं होगा।" (महात्मा गांधीः ब्रह्मचर्य के प्रयोग पेज 369)।
अब ऐसे टेढ़े आदमी की नेहरू से कितने दिन बन सकती थी। नेहरू ने उन्हें बहुत जल्द किनारे लगा दिया। वे सोशलिस्ट पार्टी में चले गए, हालांकि उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी कांग्रेस में ही सांसद थीं। खैर कृपलानी ने 11 अप्रैल 1961 को संसद में सीधे मेनन और नेहरू दोनों पर हमला बोल दिया।
वे बोले- 'सेना में प्रमोशन योग्यता पर नहीं रक्षा मंत्री की मनमर्जी पर हो रहे हैं। वे अपने नजदीकी लोगों को पद बांट रहे हैं। इससे सेना का मनोबल गिर रहा है।' कृपलानी ने खुला इल्जाम लगाया- 'रक्षामंत्री देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
भूख और गरीबी से बेहाल इस देश का पैसा बर्बाद कर रहे हैं।' कृपलानी का इशारा ले. जनरल कौल की तरफ था। जो खुद उस दिन दर्शक दीर्घा में बैठे लोकसभा की कार्रवाही देख रहे थे।
कृपलानी ने आगे कहा- 'कांग्रेसियों को चाहिए कि वह नेहरू के विरोध में आएं और उन्हें इस्तीफा देने पर मजबूर करें। जैसा कि कंजरवेटिव पार्टी के सांसदों ने अपने ही प्रधानमंत्री चैम्बरलिन को मजबूर किया था।' (लोकसभा डिबेटस 11 अप्रैल 1961)
भरे सदन में नेहरू जी सकपका गए- सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
इसी दौरान प्रधानमंत्री नेहरू ने संसद में चीनी कब्जे पर सफाई देते हुए कहा- "अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है।" ये सुनकर मुरादाबाद से सांसद महावीर त्यागी को न रहा गया। नेहरू सरकार में वे खुद मंत्री थे।
भरी संसद में महावीर त्यागी ने अपना गंजा सिर नेहरू को दिखाया और बोले- "यहां भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा के चीन को या फिर किसी और को दे दूं।" नेहरूजी लोकसभा में सदस्यों की उत्तेजना शांत कर रहे थे।
नेहरूजी ने भी बहुत जोशीले अंदाज में कहा-"हम अपनी एक इंच जमीन भी चीन को नहीं देंगे।" तो इस पर होशंगाबाद से सांसद और समाजवादी नेता हरि विष्णु कामथ अपने आपको रोक नहीं पाए। वे नेहरूजी से बोले-" आपके नक्शे में एक इंच कितने मील के बराबर है?"
भरे सदन में नेहरू जी सकपका गए। (भारतीय राजनीति और संसद : विपक्ष की भूमिका , सुभाष कश्यप पेज 52) तो आप देखिए तब विपक्ष कितना मजबूत था। विपक्ष का नेता खुलेआम चैम्बरलिन की तरह नेहरू को हटाने की बात कर रहा था और कांग्रेस सांसद मेज थपथपा कर कृपलानी के भाषण की तारीफ कर रहे थे।
अखबार संपादकीय लिखकर प्रधानमंत्री को समझा रहे थे। मंत्री और तमाम शुभचिंतक नेहरू को निजी और सार्वजनिक रूप से आगाह कर रहे थे कि मेनन को हटाइए। उन्हीं के दल के वरिष्ठ सांसद और मंत्री महावीर त्यागी और कामथ लोकप्रिय नेता नेहरू का सरेआम मजाक उड़ा रहे थे।
लेकिन जिद के आगे नेहरू हिमालय की तरह अटल थे, क्योंकि वे जानते थे उन्हें चुनौती देना वाला कोई नहीं है। भारत के असली भाग्य विधाता वहीं हैं, और कोई नहीं।
जारी...
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