फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत-चीन विवाद: पस्त हुआ ड्रैगन या अपना रहा है 1962 की रणनीति

सार

सोचनीय है कि गलवान को लेकर चीन का नरम रुख क्या वास्तव में उसके भारत के साथ इस विवाद को शांति पूर्वक सुलझाने की कोशिश है या ये महज़ एक दिखावा है।  दरअसल, देखा जाए तो वर्तमान हालात बहुत कुछ 1962 में भारत- चीन युद्ध से पहले बनी परिस्थितियों के समान प्रतीत होते हैं।  
  
 
विज्ञापन
15 जून को गलवान नदी घाटी में हुए खूनी संघर्ष ने चीन की मंशा पर एक बार फिर से सवालिया निशान लगा दिया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारत की सैन्य शक्ति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ, कोरोना की त्रासदी झेल रहे विश्व के कई प्रभुत्वसंपन्न देश भी इस समय भारत के साथ खड़े हैं। ऐसे में पंचशील के सिद्धांतों को एक बार फिर से दोहरा लेने का चीन के लिए संभवतः ये सही समय है।  

विज्ञापन


कोरोना वायरस को लेकर अपनी लापरवाही के चलते पूरी दुनिया की उपेक्षा झेल रहा चीन अब अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं के चलते सबके निशाने में आ गया है। दक्षिण चीन सागर में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की उसकी मंशा जगजाहिर है , बीते कुछ महीनों में उसने अपने पड़ोसी देशों की ज़मीन हड़पने के भी कई प्रयास किए हैं।  

नेपाल की विपक्षी पार्टी, द नेपाली कांग्रेस के नेताओं ने चीन पर गोरखा, रसुआ समेत नेपाल के 6 जिलों की कुल 64 हेक्टेयर भूमि जबरन हथियाने का आरोप लगाया है।  वहीं रूस के ब्लादिवोस्तोव शहर को भी चीन के कई नेताओं और वरिष्ठ पत्रकारों ने मूलतः चीनी क्षेत्र बताया है।
विज्ञापन


गौरतलब है की चीन रूस समेत कई अन्य देशों के साथ अपने सीमा विवादों के सफलतापूर्वक सुलझने की बात हमेशा से करता आया है। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों के स्थापित होने की राह में एक बड़ी रुकावट रहा है।

पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश और उत्तर में लेह-लद्दाख, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी समय-समय पर वास्तविक नियंत्रण रेखा  का उल्लंघन कर भारतीय क्षेत्र में जबरन घुसपैठ करती है।  हालांंकि भारत ने कई बार चीन के समक्ष इस सीमा विवाद को सुलझाने की पहल की है पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार का रवैया भारत की इस पहल पर उदासीन ही रहा है।

15 जून को गलवान नदी घाटी में हुए खूनी संघर्ष ने चीन की मंशा पर एक बार फिर से सवालिया निशान लगा दिया है। चीनी सेना द्वारा प्रयोग किए गए कंटीले तार, नुकीले पत्थर, बेसबॉल स्टिक और भारी संख्या में चीनी सैनिकों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि ये आमना - सामना कोई आकस्मिक परिस्थिति नहीं बल्कि चीनी सेना की सोची-समझी साजिश थी। जिसमें भारत ने 16 बिहार इन्फेंट्री रेजिमेंट के कमांडिंग अफसर कर्नल संतोष बाबू सहित अपने 20 जांबाज़ सैनिकों को खोया वहीं चीन की सेना को भी भारी नुक्सान उठाना पड़ा, जिसकी आधी अधूरी पुष्टि चीन द्वारा आधिकारिक तौर पर की गई।

इस खूनी झड़प के परिणामस्वरुप भारत ने भी...

चीन के साथ कई व्यापारिक अनुबंधों को भी देश की राज्य सरकारों ने रद्द कर दिया है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
इस खूनी झड़प के परिणामस्वरुप भारत ने भी सख्त रुख अपनाते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा के आस पास निर्माण कार्यों में तेज़ी ला दी है और सेना की स्थिति को पहले से अधिक मज़बूत कर दिया है। सैन्य फ्रंट के साथ ही इकनोमिक फ्रंट पर भी भारत ने चीन को कड़ा जवाब देने की ठान ली है और कई चीनी ऐप्स को प्रतिबंधित कर दिया है।

साथ ही चीन के साथ कई व्यापारिक अनुबंधों को भी देश की राज्य सरकारों ने रद्द कर दिया है।  इन सबके बीच, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ जनरल विपिन रावत और थल सेना प्रमुख जनरल एम् एम् निर्वणे के साथ लेह दौरे के बाद से चीन बातचीत का राग अलापते सुनाई दिया है। संभवतया चीन की इस शरारत पर भारत के सख्त रुख का उसे अंदाज़ा नहीं था।  

कई दौर की सैन्य वार्ताओं के बाद रविवार 5 जुलाई को भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री, वांग यी के बीच हुई बातचीत के बाद चीनी सेना झड़प वाली जगह से पीछे हट गई है और उसके द्वारा विवादित निर्माण कार्यों को ध्वस्त करने की ताज़ा जानकारी सामने आई है।

सोचनीय है कि गलवान को लेकर चीन का नरम रुख क्या वास्तव में उसके भारत के साथ इस विवाद को शांति पूर्वक सुलझाने की कोशिश है या ये महज़ एक दिखावा है। दरअसल, देखा जाए तो वर्तमान हालात बहुत कुछ 1962 में भारत- चीन युद्ध से पहले बनी परिस्थितियों के समान प्रतीत होते हैं।
विज्ञापन

बातचीत के सफेद मुखौटे के पीछे उसकी युद्ध कि स्याह मंशा भारत के सामने तब आई जब अक्टूबर 1962 में...

भारत और चीन दोनों ही परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : SELF
10  जुलाई 1962 को चीनी सेना के 350 सैनिकों ने चुसुल में भारतीय पोस्ट को घेर लिया था हालांंकि, भारत के तीव्र विरोध के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा। 1954 में भारत के साथ बनाए शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के पंचशील सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए थाग ला में चीन फिर से भारत के सामने आया।

बातचीत के सफ़ेद मुखौटे के पीछे उसकी युद्ध कि स्याह मंशा भारत के सामने तब आई जब अक्टूबर 1962 में उसने भारत के विरूद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया। उस वक़्त तक पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू जी की सरकार युद्ध के किसी भी अंदेशे से कोसों दूर थी। हम युद्ध के लिए तैयार नहीं थे, जिसके परिणाम स्वरुप हमें काफ़ी नुक्सान उठाना पड़ा।  

लेकिन आज का भारत 21 वीं सदी का भारत है।  भारतीय सेना आज चीन की किसी भी हिमाक़त का हर तरीके से उसी अंदाज़ में जवाब देने के लिए सक्षम है। एक ओर जहां हमारी स्पेशल फोर्सेज ज़मीनी सुरक्षा के लिए हरवक्त मुस्तैद हैं वहीं मिराज, सुखोई , जगुआर और अपाचे जैसे फाइटर एयरक्राफ्ट्स न्यूनतम प्रतिक्रिया समय के साथ दुश्मन के नापाक मंसूबों को धूल में मिलाने के लिए तैयार हैं। 

हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत और चीन दोनों ही परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र हैं।  विकास को लेकर दोनों की महत्वकांक्षाएँ और चुनौतियाँ भी कमोबेश एक जैसी ही हैं।  ऐसे में दोनों के लिए बेहतर यही होगा की किसी भी तरह की युद्ध की सम्भावना से बचें और द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिये इस लंबित सीमा विवाद का कोई हल निकालें।

विशेषकर पड़ोसी के लिए कोविड 19 की परिस्थियों में भारत को कमज़ोर समझना बड़ी भूल साबित होगा। भारत की सैन्य शक्ति और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ, कोरोना की त्रासदी झेल रहे विश्व के कई प्रभुत्वसंपन्न देश भी इस समय भारत के साथ खड़े हैं। ऐसे में पंचशील के सिद्धांतों को एक बार फिर से दोहरा लेने का चीन के लिए संभवतः ये सही समय है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें