कोविड-19 की धार में दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैंं। यह बदलाव भारत के लिए एक अवसर बन सकता है। चीन की सेना भारत के लद्दाख सेक्टर में गश्त लगा रही है। अस्वाभविक रूप से चीन की सैन्य टुकड़ी वहां जमी हुई है, यह बात भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी माना है।
दरअसल, ऐसा पहले नहीं हुआ था। दोकलाम के दौरान भी चीन का तेवर इतना तीखा नहीं था, जितना की अभी है। इसके कारण कई है। कोविड-19 ने चीन की विश्वसनीयता पर एक ऐसा धब्बा मढ़ दिया है, जिससे चीन को उबरने में कई वर्ष गुजर जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संघठन के साथ उसकी मिली भगत ने दुनिया को खतरे में डाल दिया है।
अब अमेरिका सहित ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस इस वायरस की उत्पति और विस्तार पर चीन को घेरने का मन बना चुके हैं। इस मुहीम में चीन के कई ऐसे सहयोगी देश है,, जो उसके ओबीआर की श्रृंखला में शामिल है।
अपने आप को घिरते हुए देख और देश के भीतर भी सुलगती राजनीतिक अविश्वास को रोकने के लिए चीन पड़ोसी देशों के साथ गुथम गुत्थी में जुट गया है।
पहले हांगकांग फिर ताइवान और साउथ चीन से में अपना हाइपर राष्ट्रवादी तेवर से अपनी खामियों को ढ़कने का प्रयास किया। फिर भारत के लद्दाख पर नीयत। यह सब अचानक हुआ है।
वैसे भारत चीन सीमा विवाद 3,400 किलोमीटर के दायरे में तीन खंडो में बटा हुआ है। लेकिन चीन महज 2000 किलोमीटर को ही विवाद की श्रेणी में रखता है, उसके अनुसार अरुणाचल प्रदेश तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है इसलिए वह चीन का अभिन्न अंग है।
दरअसल, चीन सीमा विवाद को लेकर खुद तार्किक नहीं रहा। कभी पैकेज डील के तहत पूर्वी भाग पर विशेष रियायत मांगता है और उसके बदले पश्चिमी सीमा पर भारतीय शर्त को मानने के लिए तैयार दिखता है फिर उसको उलट देता है और पश्चिमी सीमा को अपना मानने लगता है। अर्थात् चीन की सोच में एक सामरिक तत्व है जिसे 'सलामी' व्यवस्था के रूप में जाना जाता है।
इसका अर्थ अपने विरोधी की शक्ति और मनोविज्ञान के आधार पर सीमा छेत्र का निरंतर विकास करना। दौलत बैग ओल्डी में भी चीन वही कर रहा है।
लद्दाख का यह छेत्र पहाड़ी नदियों का है, जिसका आकर हाथ की उंगलियों की तरह बना हुआ। एक से लेकर आठ उंगलियों की एक श्रृंखला बनी हुई है। चीन की सेना पिछले दिनों अतिक्रमण के जरिए भारतीय सीमा के भीतर घुस गयी।
1962 के युद्ध में चीन ने लद्दाख के बहुत बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया था, जिसे अक्साई चीन के नाम से जाना जाता है। यह हिस्सा लद्दाख का था। यह सारा परिवर्तन तिब्बत को हड़पने के बाद हुआ है।
उसके बाद भारत तिब्बत के मसले पर चीन की लल्लो-चप्पो करता रहा, जिसका फयदा चीन को स्वाभाविक रूप से मिलता रहा। लेकिन भारत की वर्तमान सरकार पुराने केचुल को छोड़ने के लिए तत्पर है, ऐसा करने की छमता भी है।