फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गलवां घाटी: दुनिया को बताना होगा की यह 1962 का भारत नहीं है

सार

  • 1962 के युद्ध में भारत को करारी हार का सामना और अपमान का घूंट पीना पड़ा था।
  • 1959 में चीन ने हरे रंग की मैकार्टनी मैक्डॉनल्ड लाइन को अपनी तरफ से स्वीकार कर लिया।
  • वर्तमान में चीन पूरे विश्व को चुनौती देने की मुद्रा में आ गया है।
  • भारत के पास गलवान और पेंगोंग क्षेत्र के वर्तमान अतिक्रमण को खाली कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।
विज्ञापन
चीन भारत का युद्ध स्पष्ट सीमाओं के चिन्हांकन के न होने का परिणाम है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

20 अक्टूबर 1962 को 8 बजे सुबह आकाशवाणी रेडियो से देवकी नंदन पाण्डेय की गंभीर आवाज में मैंने सुना,’ चीन ने भारत पर हमला कर दिया है।’ उस समय मैं आठवीं कक्षा का छात्र था और रेडियो पर समाचार मेरे पिताजी सुना करते थे।

विज्ञापन


युद्ध प्रारंभ होते ही मेरे स्कूल और मेरे तत्कालीन शहर बनारस में देश के प्रति समर्पण की एक भावना मैंने देखी। हमें बताया गया कि हर भारतीय सैनिक दस चीनी सैनिकों को मार रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा कोष के लिए पैसा एकत्र करने के लिए अभिनेत्री नरगिस का प्रोग्राम बनारस में हुआ जिसमें उनके द्वारा फैलाए गए शॉल में मैंने अपनी अंगूठी डाल दी थी।

1962 के युद्ध में भारत को करारी हार का सामना और अपमान का घूंट पीना पड़ा था। एक बार फिर सीमा पर अत्यधिक गंभीर स्थिति उत्पन्न होने के कारण इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।
विज्ञापन


चीन भारत का युद्ध स्पष्ट सीमाओं के चिन्हांकन के न होने का परिणाम है। यह समस्या अंग्रेज हमें विरासत में दे गए थे। वर्तमान स्थिति को देखते हुए मैं केवल लद्दाख क्षेत्र की बात करुंंगा क्योंकि पूर्वोत्तर अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में स्थिति फिलहाल शांत है।

लद्दाख के आक्साईचिन क्षेत्र के नक्शे पर ध्यान दीजिए, इसमें जॉनसन डॉटेड लाइन सबसे पूरब में है तथा सबसे बड़ा क्षेत्र भारत का बनाती है। यह लाइन कुनलुन पर्वत को छूते हुए बनाई गई थी और आज भी भारत के नक्शे में हम इसी को देखते हैं।

1925 में चीन की सरकार ने इस लाइन को मान भी लिया था। रूस के प्रभाव से दूर रहने के लिए ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने भारत (अर्थात् जम्मू कश्मीर रियासत) का क्षेत्र अनेक बार छोटा कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से कुल मिलाकर 11 बार सीमारेखा बदली गई।

प्रमुख लाइनेंं अलग-अलग रंग में इस नक्शे में दिखाई गई है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद इस क्षेत्र से होकर पीली लाइन पर एक सड़क चीन ने तिब्बत और जिंगजियांग को जोड़ते हुए बना दी। 1957 में इसका पता चलने पर भारत की ओर से इस क्षेत्र में कमजोर होने के कारण कोई कार्रवाई नहीं हुई।
 

नेहरू ने चीन के सभी दावों को खारिज तो कर दिया लेकिन नेहरू में सैन्य संगठन करने की कोई क्षमता नहीं थी...

1962 में चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश दोनों पर एक साथ हमला कर दिया- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
1959 में चीन ने हरे रंग की मैकार्टनी मैक्डॉनल्ड लाइन को अपनी तरफ से स्वीकार कर लिया। 1960 में चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने एक नई सीमा स्वीकार करने का प्रस्ताव नेहरू के सामने रखा जिसे नेहरू ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि हम चीन को पूरे आक्साइचिन से बाहर निकाल कर जॉनसन लाइन तक का भारतीय क्षेत्र खाली करा लेंगे।

नेहरू ने चीन के सभी दावों को खारिज तो कर दिया लेकिन नेहरू में सैन्य संगठन करने की कोई क्षमता नहीं थी। उन्होंने एक ऐसा रक्षामंत्री बना रखा था जो घोर वामपंथी था और चीन को प्रेम करता था। उसने भारतीय जनरलों और सेना की बेहद उपेक्षा की।

चीन की अर्थव्यवस्था हम से कमजोर थी परंतु उसकी सैन्य शक्ति अधिक संगठित थी। चीन को विश्वास था कि भारत उसके प्रस्ताव को मान जाएगा और युद्ध करने की उसकी कोई मंशा नहीं थी। भारत का भी आंकलन था कि चीन किसी भी स्थिति में हमला नहीं कर सकता है।  

नेहरू ने  फॉरवर्ड पॉलिसी लागू की जिसके अंतर्गत पूर्व में मैकमोहन लाइन के उस पार तथा लद्दाख में चीन के दावे के क्षेत्र में जाकर अनेक बॉर्डर पोस्ट बनाई गई। ये बिखरी हुई बॉर्डर पोस्ट बिना किसी मिलिट्री सपोर्ट के थी और इन्होंने केवल चीन को उत्तेजित करने का काम किया।

दलाई लामा को शरण देना भी चीन को पसंद नहीं आया। सीमा पर लगातार छिटपुट झड़पेंं भी होती रहीं। अरुणाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में हुई झड़पों से चीन ने अचानक भारत पर हमला करने का निर्णय ले लिया।

19 और 20 अक्टूबर, 1962 की रात्रि को चीन ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश दोनों पर एक साथ हमला कर दिया। लद्दाख के अक्साईचिन क्षेत्र का बड़ा भू-भाग चीन के पास पहले से ही कब्जे में था और 20 तारीख को ही उसने चिप चेप क्षेत्र,गलवान घाटी और पेंगोंग झील को कब्जे में ले लिया।

22 अक्टूबर तक चुशूल के उत्तर का पूरा इलाका चीन के कब्जे में आ गया। 24 अक्टूबर को चीन ने युद्ध रोक दिया। इसके बाद कूटनीतिक स्तर पर बातचीत चलती रही और चीन ने एक बार फिर नेहरू के सामने उसके द्वारा बताई गई सीमा को मान लेने का प्रस्ताव रखा।
विज्ञापन

इस समय अमेरिका को छोड़कर अधिकांश देश चीन से भयाक्रान्त हैं...

सेना को सभी प्रकार की रणनीति के लिए तैयार रहना चाहिए- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
नेहरू ने फिर वो प्रस्ताव अस्वीकृत कर भारतीय क्षेत्र को खाली कर देने का अपना प्रस्ताव रखा। इसके फलस्वरूप चीन ने नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को दुबारा हमला कर दिया।

18 नवंबर को चुशुल के रिजांग ला पर कब्जा कर लिया। यह क्षेत्र मेजर शैतान सिंह के अदम्य पराक्रम का था जिसमें उनके साथ पूरी प्लाटून ने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। 19 नवंबर को चीन ने फिर एक तरफा युद्धविराम घोषित कर दिया।

चीन ने युद्ध के बाद अरुणाचल प्रदेश का पूरा क्षेत्र खाली कर दिया और पुरानी सीमाओं पर चला गया, परंतु लद्दाख में वह उन स्थानों पर बैठा रहा जहां तक वह पहुंच गया था। वह रेखा LAC के नाम से जानी जाती है।

इस युद्ध के बाद केवल 1967 और 1975 में दोनों देशों के बीच में भारी गोलाबारी हुई, परंतु उसके बाद से आज तक कभी गोलीबारी नहीं हुई। आपसी समझौते के तहत दोनों देश बिना हथियार के पेट्रोलिंग करते हैं।

वर्तमान में चीन पूरे विश्व को चुनौती देने की मुद्रा में आ गया है और लद्दाख के साथ साथ हांगकांग, ताइवान, साउथ चाइना सी में आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। भारत को विश्व मंच पर अपनी नीति पर चलने से हतोत्साहित करना चीन का मुख्य उद्देश्य है।

इसके साथ उसने वर्तमान अतिक्रमण में सामरिक महत्व के कुछ क्षेत्रों पर कब्जा भी कर लिया है। सेना वापसी के निर्णय के बाद पीछे हटने की कार्रवाई करने के स्थान पर चीन ने जिस बर्बरता के साथ भारतीय सेना के 20 लोगों की हत्या की है वह अक्षम्य है।

यद्यपि चीन के पास अक्साई चिन का 37,244 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पहले से कब्जे में है लेकिन अभी कब्जा किया गया केवल लगभग 30 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र का अपना अलग महत्व है।

भारत के पास गलवान और पेंगोंग क्षेत्र के वर्तमान अतिक्रमण को खाली कराने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसे खाली कराने के लिए भारत को राजनयिक स्तर पर कोई भी प्रयास नहीं छोड़ना चाहिए। भारत को विश्व जनमत का दबाव भी चीन पर डलवाना चाहिए।

हालांकि इस समय अमेरिका को छोड़कर अधिकांश देश चीन से भयाक्रान्त हैं और उनके खुल कर भारत के साथ आने की संभावना बहुत कम है। इन कूटनीतिक प्रयासों में भारत को दो टूक शब्दों में चीन को यह संदेश देना चाहिए कि भारत इस क्षेत्र को खाली कराने के लिए शक्ति का भी प्रयोग कर सकता है।

सेना को सभी प्रकार की रणनीति के लिए तैयार रहना चाहिए। सेना को LAC के उस पार जाकर अपने सामरिक महत्व के कुछ अन्य स्थानों पर कब्जा कर लेने की योजना पर काम करना चाहिए जिससे समझौते की मेज पर भारत को ताकत मिल सके।

पिछले सात दशकों से भारत की सभी सरकारें चीन के सामने घुटने टेकती आईं हैं। अब समय आ गया है कि भारत अपने साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करे। मोदी को इस साहस का परिचय ठंडे मस्तिष्क से देना है और दुनिया को बता देना है कि यह 2020 का भारत है 1962 वाला नहीं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें