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विदेश नीति के मोर्चे पर भारत के सामने नई चुनौती, इस देश के साथ तेजी से बढ़ाना होंगे संबंध

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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : ANI
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बीते दिनों का घटनाक्रम संकेत देता है कि भारत के लिए आने वाले दिन विदेश नीति के नज़रिए से बड़े संवेदनशील हो सकते हैं। इस्लामिक देशों का भारत को झटका, मसूद अज़हर के मामले में सुरक्षा परिषद् में चीन का वीटो, फ़्रांस का मसूद अज़हर के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया और तुर्की ने चीन को मुसलमानों पर अत्याचार करने के कारण जिस तरह से आड़े हाथों लिया, वह इस ओर इशारा करता है कि भारत को अपने हितों से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अधिक चतुराई और समझदारी से काम लेना होगा।

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आखिर हुआ क्या है?
फ्रांस ने मसूद अज़हर के मामले में सबसे ज़्यादा साथ क्यों दिया? इसका कारण समझने के लिए फ़्रांस की अपनी स्थिति को भी समझना होगा। पिछले पांच साल में वहां क़रीब एक दर्ज़न आतंकवादी वारदातें हुईं हैं। इनमें कोई ढ़ाई सौ लोग मारे गए और दो हज़ार से अधिक घायल हुए हैं। आबादी में मध्य प्रदेश से भी छोटे फ्रांस जैसे देश के लिए ये वारदातें बेहद गंभीर हैं। इन सभी वारदातों के पीछे इस्लामी उग्रवादी समूहों का हाथ था। फ़्रांस के लिए भी ये एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा ब्रिटेन के योरपीय संघ से अलग होने के कारण फ़्रांस पर उसका उल्टा असर पड़  सकता है।
 

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narendra mod - फोटो : PTI
फिलहाल फ़्रांस अमेरिका और जर्मनी के बाद ब्रिटेन को सर्वाधिक निर्यात करता है। उसका ब्रिटेन के साथ कारोबार क़रीब 22 बिलियन पौंड के आसपास है। उसके लाखों लोग ब्रिटेन में रहते हैं। आने वाले दिनों में यदि ब्रिटेन से कारोबारी झटका लगा तो उसे एक बड़े बाज़ार की ज़रूरत है। इन दिनों फ़्रांस के लिए भारत से बेहतर बाज़ार कोई दूसरा नहीं है। इसी कारण पिछले साल भारत और फ्रांस के बीच चौदह बड़े समझौते हुए थे। इनमें राफेल लड़ाकू विमानों से लेकर अनेक रक्षा उपकरणों तथा उत्पादन के क्षेत्र में दोनों देश गहरे साझीदार बन कर उभरे हैं।

फ्रांस का भारत में निवेश
महाराष्ट्र के जैतपुर में छह परमाणु रिएक्टर लगाना भी इसमें शामिल है। चीन की नौ सेना और हिन्द महासागर में उसकी आक्रामक हाज़िरी भारत और फ्रांस - दोनों के लिए चिंता का सबब है। दोनों देशों की नौ सेनाएं अलग-अलग हैं और कमज़ोर हैं। कहा  जा सकता है कि भारत को रूस तो नहीं, लेकिन रूस जैसा सामरिक साझीदार मिल गया है।  

सन् दो हज़ार से सत्रह साल तक फ़्रांस का भारत में पूंजी निवेश केवल 6 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। बीते तीन साल के दौरान  बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। यह अब क़रीब क़रीब 12 बिलियन डॉलर हो गया है। इसमें फ़्रांस अपेक्षाकृत लाभ की स्थिति में है। अब भारत पर निर्भर है कि वह फ़्रांस के साथ इन रिश्तों को कितनी ऊंचाई तक ले जाता है। फ़्रांस तो तैयार बैठा है। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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