भारत का स्पेस स्टेशन
गगनयान मिशन की सफलता के बाद इसरो भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का बेसिक मॉडल साल 2028 तक धरती के ऑर्बिट में सेट करने की योजना बना रहा है। इस स्पेस स्टेशन को पूरा बनाने का लक्ष्य साल 2035 तक रखा गया है। गगनयान मिशन और भारत का खुद का स्पेस स्टेशन स्ट्रैटजिक रूप से काफी जरूरी है। इसके पीछे के दो सबसे बड़े कारण हैं। आइए सिलसिलेवार ढंग से जानते हैं -
नाटो ने स्पेस को ऑपरेशनल डोमेन किया घोषित
साल 2019 में नाटो ने स्पेस को एक ऑपरेशनल डोमेन घोषित किया। नाटो का यह फैसला स्पष्ट संकेत है कि आने वाले समय में स्पेस, जंग का एक नया मैदान बनने वाला है। इस कारण आपको स्पेस की कुछ स्ट्रैटजिक लोकेशन्स के बारे में जानना बहुत जरूरी है। स्पेस में ये लोकेशन्स इतनी महत्वपूर्ण हैं कि यहां से किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को गिराया जा सकता है।
इसमें पहली स्ट्रैटेजिक लोकेशन धरती के तीनों ऑर्बिट जोन्स हैं। इसमें लो अर्थ ऑर्बिट, मिडिल अर्थ ऑर्बिट और जियो स्टेशनरी ऑर्बिट शामिल हैं। इन तीनों ऑर्बिट में सैटेलाइट को उनकी जरूरतों को देखकर इंस्टॉल किया जाता है। यही सैटेलाइट दुनियाभर में इंटरनेट, कम्यूनिकेशन, जीपीएस, अर्थ की ऑब्जर्वेशन, वेदर फॉरकास्टिंग से लेकर स्पाई और सर्विलांस करने के लिए इस्तेमाल में आ रही हैं। विश्व के कई देश इन सैटेलाइट कम्यूनिकेशन नेटवर्क पर आश्रित हैं और हमारा इंडिया भी इनमें से एक है।
आज के समय कई जरूरी समुद्री मार्ग जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल वैश्विक अर्थव्यवस्था को गति देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ठीक इसी तरह धरती के ऑर्बिट जोन्स में मौजूद ये सैटेलाइटें भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे रही हैं। ऐसे में स्ट्रैट ऑफ हार्मूज, मलक्का स्ट्रेट, स्वेज कैनाल की तरह ही धरती का ऑर्बाइटल जोन भी काफी स्ट्रैटेजिक है।
स्पेस में जिस तेजी से अमेरिका, चीन और रूस की मौजूदगी बढ़ रही है उससे हमारे सैटेलाइट नेटवर्क पर भी थ्रेट्स आ रहे हैं। कल को अगर युद्ध या किसी जियोपॉलिटिकल एजेंडा को पूरा करने के लिए कोई देश हमारे सेटेलाइट नेटवर्क के साथ जरा भी छेड़छाड़ करता है। ऐसे में हमारे देश का कम्यूनिकेशन नेटवर्क और इकोनॉमी तबाह हो सकती। इन्हीं खतरों से सैटेलाइट की सुरक्षा करने के लिए भारत का खुद का अंतरिक्ष स्टेशन समय की मांग बन चुका है। इसको लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं जिसे साल 2035 तक पूरा कर लिया जाएगा।
क्यों जरूरी है चांद?
स्पेस में दूसरी सबसे स्ट्रैटजिक लोकेशन चंद्रमा है। चांद पर ऐसे बेशकीमती संसाधनों का भंडार है, जिस पर अगर किसी भी देश का हाथ लग गया, तो उसकी बादशाहत को कोई नहीं रोक सकता है। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बड़ी मात्रा में क्रिस्टल वॉटर आइस है, जिसके बारे में चंद्रयान वन के इम्पैक्ट लैंडिंग के जरिए पता चला था।
भविष्य में इस क्रिस्टल वॉटर आइस को आसानी से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर चांद पर बनी कॉलोनीज में सांस लेने के लिए ऑक्सीजन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही नहीं चांद के क्रिस्टालाइज वॉटर का इस्तेमाल डीप स्पेस मिशन्स के लिए रॉकेट फ्यूल बनाने में भी किया जा सकता है।
चांद पर दूसरा सबसे कीमती संसाधन हीलियम 3 है। हीलियम 3 स्पेस रेस के पूरे डाइनामिक्स को बदल के रख देगा। हिलियम 3 नॉन रेडियो एक्टिव क्लीन एनर्जी का एक बहुत बड़ा स्रोत है। हिलियम 3 के न्यूक्लियर एनर्जी का इस्तेमाल करने पर किसी भी तरह का रेडियोएक्टिव वेस्ट नहीं निकलता है।
चांद पर इतनी ज्यादा मात्रा में हीलियम 3 है कि इसकी मदद से पृथ्वी की दस हजार सालों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। यही नहीं, हिलियम 3 का उपयोग भविष्य में एडवांस रॉकेट के प्रॉपल्जन सिस्टम में ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है।
आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि जहां आज की करंट टेक्नोलॉजी की मदद से हमें मंगल ग्रह तक जाने में महीनों का समय लगता है। वहीं हिलियम 3 फ्यूजन रॉकेट की मदद से महज कुछ दिनों में मंगल ग्रह तक का सफर पूरा किया जा सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि हीलियम 3 स्पेस में लंबी दूरी के मैन्ड मिशन्स के रास्तों को खोल देगा। इसकी मदद से बेहद कम खर्च में एस्ट्रोनॉट को आसानी से जुपिटर, सैटर्न के यूरोपा और टाइटन जैसे महत्वपूर्ण चंद्र मिशनों पर बेहद कम समय में भेजा जा सकेगा। हालांकि, आज की हमारी करंट टैक्नोलॉजी के जरिए हिलियम थ्री को एक्स्ट्रैक्ट करना काफी मुश्किल काम है। हालांकि, आने वाले वक्तों में जो देश इसको क्रैक कर लेता है, उसके लिए अंतरिक्ष की दौड़ में आगे बने रहने के लिए कई नए आयाम खुल जाएंगे।
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर मौजूद वॉटर आइस और हिलियम थ्री के जरिए कई देश उन एस्टेरॉयड पर डीपर स्पेस मिशन भेज सकेंगे, जो अपने भीतर ट्रिलियंस ऑफ डॉलर की वर्थ को छुपाकर रखे हैं। अर्थात चांद पर जिस देश का भी वर्चस्व होता है उसके पास ट्रिलियंस ऑफ डॉलर के खजाने को पाने के रास्ते खुल जाएंगे। आप में से जिस किसी ने भी अवतार फिल्म देखी है। उसमें आपने देखा होगा कि हमारी धरती से एक मिशन पेंडोरा नाम के मून पर जाता है। वहां ये मिशन यूनोबटेनियम नाम के एक बेहद ही रेयर अर्थ रिसोर्स की खोज करता है।
इस एक किलो यूनोबटेनियम की कीमत धरती पर करीब 20 मिलियन डॉलर होती है। खैर ये तो फिल्म की कहानी थी लेकिन आने वाले भविष्य में इस तरह के जो डीपर स्पेस मिशन्स संसाधनों की खोज में दूसरे एस्टेरॉयड पर निकलेंगे। चांद इन सभी मिशनों के लिए लॉन्चिंग पैड के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि मून से रॉकेट को लॉन्च करना धरती की तुलना में काफी ज्यादा कॉस्ट इफेक्टिव है क्योंकि चांद का गुरुत्वाकर्षण काफी कम है। कम ग्रैविटी होने के कारण वहां से रॉकेट को लॉन्च करने में काफी कम खर्च आएगा और रॉकेटों में ईंधन की सप्लाई भी वहीं से होगी।
भारत ने हाल ही में आर्टेमिस अकोर्ड पर साइन किया है। ये भारत का एक स्ट्रैटेजिक निर्णय था। इससे हमें आने वाले भविष्य में नासा और दूसरी स्पेस एजेंसियों के सहयोग से ऐसी तकनीक और स्पेस से जुड़े उपकरण मिलेंगे, जिनकी मदद से हम चांद से जुड़े अपने मिशन्स को पूरा कर सकेंगे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।