पीएसएलवी के माध्यम से साल 2013 में इसरो के सबसे कामयाब मिशन मंगलयान को लॉन्च किया गया।
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इसरो और उसके मिशन्स पर एक नजर
आजादी केे बाद भारत केे अंतरिक्ष अनुसंधान की बुनियाद को खड़ा करने में विक्रम सारा भाई, पंडित जवाहर लाल नेहरू और होमी जे भाभा ने एक बड़ी भूमिका निभाई। 1963 में विक्रम सारा भाई ने स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर का गठन किया। इसकी शुरुआत रॉकेट इंजनीयरिंग, रिसर्च और उसके डेवलपमेंट के लिए की गई थी। विक्रम साराभाई के मार्गदर्शन में भारत का स्पेस प्रोग्राम काफी तेजी से आगे बढ़ रहा था। इसे देखते हुए भारत सरकार 15 अगस्त, 1969 में इसरो (ISRO) यानी इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन का गठन करती है।
आज इसरो की गिनती दुनिया की सर्वश्रेष्ठ स्पेस एजेंसियों में की जाती है। मंगलयान, चंद्रयान जैसे कई कामयाब मिशन्स के कारण इसरो को दुनिया में एक अलग पहचान मिली है। अपने कामयाबी के सफर में इसरो ने यूं तो कई सफलता हासिल की है। वहीं साल 1990 में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) आने के बाद से इसने भारत के स्पेस प्रोग्राम को नई गति देने का काम किया।
पीएसएलवी के जरिए ही इसरो ने साल 2008 में चंद्रयान 1 मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया था। मून पर भेजे गए इस मिशन की वजह से ही दुनिया को पहली बार चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी के बारे में पता चला।
पीएसएलवी के माध्यम से साल 2013 में इसरो के सबसे कामयाब मिशन मंगलयान को लॉन्च किया गया। इसके अलावा साल 2017 में पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल ने एक साथ 104 सैटेलाइट लॉन्च करके एक नए कीर्तिमान को रचने का काम किया। ऐसे में ये कहना जरा भी गलत नहीं होगा कि पीएसएलवी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसांधन को बुलंदियों पर पहुंचाने में एक निर्णानायक भूमिका निभाई है।
समय की मांग को देखते हुए इसरो ने स्पेस में हैवी लॉजिस्टिक और सैटेलाइट को डिलीवर करने के लिए कुछ सालों पहले जीएसएलवी को डेवलप किया। जीएसएलवी में हैवी सैटेलाइट को लोड करके स्पेस में आसानी के साथ लॉन्च किया जा सकता है।
यही नहीं इसरो ने रॉकेट लॉन्चिंग में इस्तेमाल होने वाले क्रायोजेनिक इंजन का भी निर्माण किया है। इस खोज ने भारत को उन चुनिंदा देशों की फेहरिस्त में शामिल कर दिया है, जिनके पास ऑपरेशनल क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक है। इस इंजन की वजह से ही आज हम गगनयान जैसे ह्यूमन स्पेस मिशन की योजना बना रहे हैं। साल 2019 में इसरो के मिशन शक्ति ने 300 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में एक सैटेलाइट को मार गिराया। इस कदम ने स्पेस सुपर पावर बनने की दिशा में भारत को एक नई कामयाबी दी है।
इन सभी मिशन्स में जिस एक चीज ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। वह उसका कॉस्ट इफेक्टिव बजट है। इसरो ने इन सभी मिशन्स को बेहद कम पैसों में पूरा किया। एक तरफ जहां भारत ने मंगलयान को मार्स की ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए 74 मिलियन डॉलर खर्च किए थे। वहीं अमेरिका ने उसी मिशन के लिए 671 मिलियन डॉलर खर्च किए।
यही नहीं क्रिस्टोफर नोलन द्वारा निर्देशित मशहूर साइंस फिक्शन फिल्म इंटरस्टीलर को बनाने में जितने रुपये खर्च हुए थे। उससे कम कीमत पर इसरो ने अपने चंद्रयान मिशन को पूरा किया। एक तरफ जहां आज इसरो 1.2 बिलियन डॉलर के बजट पर अंतरिक्ष में तमाम बड़े मिशन्स भेजकर अपने परचम को लहरा रहा है। वहीं नासा जैसी स्पेस एजेंसी हर साल 20 से 22 बिलियन डॉलर अंतरिक्ष अनुसंधान में खर्च करती है।
गगनयान मिशन आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को एक नया आकार देने का काम करेगा।
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इसरो का गगनयान मिशन
अब इसरो भारत का पहला मानवयुक्त गगनयान मिशन अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी में है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसे अगले साल 2023 में पूरा किया जा सकता है। अब तक स्पेस में इंसानों को भेजने में केवल तीन देश (अमेरिका, रूस और चीन) ही सफल हो पाए हैं। अगर गगनयान मिशन कामयाब होता है। इस स्थिति में भारत का नाम भी इन तीन देशों की फेहरिस्त में शामिल हो जाएगा।
गगनयान मिशन के अंतर्गत पिछले साल ही भारत के 4 एस्ट्रोनॉमर्स ने रूस के गगारियन कॉस्मोनॉट ट्रेनिंग सेंटर में अपना प्रशिक्षण पूरा किया है। इस मिशन के तहत कुल 3 फ्लाइट की जाएंगी। इनमें पहली 2 एबोर्ट फ्लाइट होंगी। इनमें मिशन के सेफ्टी मेजरमेंट, ट्रेजेक्टरी परफॉर्मेंस आदि चीजों की जांच की जाएगी। इनके सफल होने के बाद तीसरी फ्लाइट में चारों एस्ट्रोनॉमर्स को स्पेस की लो अर्थ ऑर्बिट में 7 दिनों के लिए भेजा जाएगा।
अगर ये मिशन सफल होता है, तो भारत के लिए ये एक बड़ी कामयाबी होगी। इससे भविष्य में सस्ते और दूसरे नए मैन्ड मिशन की रूपरेखा तैयार करने में मदद मिलेगी। इससे स्पेस की दुनिया में भारत की दावेदारी और भी ज्यादा मजबूत होगी।
इस मिशन के सफल होने के बाद भारत ग्लोबल स्पेस स्टेशन के साथ मिलकर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कई साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट को परफॉर्म कर सकेगा। इसके अलावा दूसरे देशों के साथ हमारे सहयोग और रिश्ते भी बेहतर होने लगेंगे। यही नहीं इस मिशन की सफलता भारत के लिए जियो पॉलिटिक्स और इंटरनेशनल रिलेशन के क्षेत्र में कई नए रास्तों का खोलने का काम करेगी।
गगनयान मिशन और भारत का भविष्य
आने वाला दौर स्पेस रेस का है। इस कारण दुनियाभर में कई देश अब स्पेस में अपनी हेजेमनी बनाने के लिए अंतरिक्ष को एक्सप्लोर कर रहे हैं। चांद पर नए संसाधनों की खोज से लेकर स्पेस कॉलोनाइजिंग और एस्टेरॉयड माइनिंग की दिशा में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों ने अपनी उपस्थिति बनाने की शुरुआत कर दी है। ऐसे में गगनयान मिशन की सफलता भारत को अंतरिक्ष के इन क्षेत्रों में हो रही स्पेस रेस के केंद्र बिंदु में लाकर खड़ा कर देगी। इस स्पेस प्रोग्राम का इस्तेमाल हम अपने फॉरेन पॉलिसी टूल के रूप में भी कर सकेंगे।
गगनयान मिशन आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था को एक नया आकार देने का काम करेगा। इस मिशन की सफलता, इसरो को दूसरे बड़े मिशन्स की रूपरेखा तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करेगी। भविष्य में मून कोलोनाइजेशन, एस्टेरॉयड माइनिंग, स्पेस टूरिज्म से लेकर स्पेस लॉजिस्टिक सप्लाई चेन के क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने के लिए इसरो के लिए ये मिशन एक टिपिंग प्वाइंट साबित हो सकता है।
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