डॉ. साराभाई का योगदान
डॉ. साराभाई ने टेलीविजन के सीधे प्रसारण के जैसे बहुआयामी प्रयोग में लाए जाने वाले कृत्रिम उपग्रहों की सम्भव्यता के सन्दर्भ में नासा के साथ प्रारंभिक अध्ययन में हिस्सा लिया। इस अध्ययन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि प्रसारण के लिए यही सबसे सस्ता और सरल साधन है।
शुरुआत से ही उपग्रहों को भारत में लाने के फायदों को ध्यान में रखकर, साराभाई और इसरो ने मिलकर एक स्वतंत्र प्रक्षेपण वाहन का निर्माण किया जो कि कृत्रिम उपग्रहों को कक्ष में स्थापित करने, एवं भविष्य में वृहत प्रक्षेपण वाहनों में निर्माण के लिए आवश्यक अभ्यास उपलब्ध कराने में सक्षम था।
रोहिणी श्रेणी के साथ ठोस मोटर बनाने में भारत की क्षमता को परखते हुए अन्य देशों ने भी समांतर कार्यक्रमों के लिए ठोस रॉकेट का उपयोग बेहतर समझा और इसरो ने कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपण वाहन (एस.एल.वी.) की आधारभूत संरचना एवं तकनीक का निर्माण प्रारम्भ कर दिया।
इस दौरान भारत ने भविष्य में संचार की आवश्यकता एवं दूरसंचार का पूर्वानुमान लगाते हुए उपग्रह के लिए तकनीक का विकास प्रारम्भ कर दिया। भारत की अंतरिक्ष में प्रथम यात्रा 1975 में रूस के सहयोग से कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से शुरू हुई। 1979 तक नव-स्थापित द्वितीय प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से एस.एल.वी. प्रक्षेपण के लिए तैयार हो चुका था।
द्वितीय स्तरीय असफलता की वजह से इसका 1979 में प्रथम प्रक्षेपण सफल नहीं हो पाया था। 1980 तक इस समस्या का निवारण कर लिया गया। भारत का देश में प्रथम निर्मित कृत्रिम उपग्रह रोहिणी-प्रथम प्रक्षेपित किया गया।
कहां है इसरो और क्या हैं उद्देश्य?
बता दें कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है, जिसका मुख्यालय बेंगलुरू, कर्नाटक में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत् हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिए अंतरिक्ष संबंधी तकनीक उपलब्ध कराना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, प्रक्षेपण वाले राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।
प्राथमिक अंतरिक्ष प्रक्षेपण केन्द्र, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरीकोटा, आंध्र प्रदेश में स्थित है और इस संगठन का आदर्श वाक्य है-मानव जाति की सेवा में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास। वर्तमान में डॉ. के. शिवान इसके निदेशक हैं। इसरो भारत सरकार की एक इकाई है। इसरो को शांति, निरस्त्रीकरण और विकास के लिए साल 2014 के इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के लगभग एक वर्ष बाद इसने 29 सितंबर 2015 को एस्ट्रोसैट के रूप में भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित की।
इसरो के द्वारा किए गए कार्य
वर्ष 1962 में परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक राष्ट्रीय समिति का गठन और त्रिवेन्द्रम के समीप थुम्बा में राकेट प्रक्षेपण स्थल के विकास की दिशा में पहला प्रयास प्रारंभ किया गया। वर्श 1963 में थुंबा से (21 नवंबर, 1963) को पहले राकेट का प्रक्षेपण की व्यवस्था की गई।
वर्ष 1965 थुंबा में अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनीकी केन्द्र की स्थापना। वर्ष 1967 में अहमदाबाद में उपग्रह संचार प्रणाली केन्द्र की स्थापना की गई। वर्ष 1972 में अंतरिक्ष आयोग एवं अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई। वर्ष 1975 में पहले भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण किया गया।
वर्ष 1976 में उपग्रह के माध्यम से पहली बार शिक्षा देने के लिए प्रायोगिक कदम उठाए गए। वर्ष 1979 में एक प्रायोगिक उपग्रह भास्कर- 01 का प्रक्षेपण किया गया। रोहिणी उपग्रह का पहले प्रायोगिक परीक्षण यान एस एल वी-03 की सहायता से प्रक्षेपण असफल रहा, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक अनवरत् अपने काम में लगे रहे। वर्ष 1980 में एस एल वी-3 की सहायता से रोहिणी उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया गया। वर्ष 1981 में ‘एप्पल’ नामक भूवैज्ञानिक संचार उपग्रह का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया।