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अधूरी खोज और भीतर की शांति: सवालों को बोझ नहीं संभावना की तरह देखें, अपने कर्मों से अर्थ रचें

Thu, 05 Feb 2026 07:15 AM IST
शुभम कुमार रेनर मारिया रिल्के

सार

जीवन का सार सब कुछ जीने में है, स्पष्टता के साथ ही नहीं, अधूरेपन के साथ भी। इसलिए अभी मन में उठ रहे प्रश्नों के साथ जिएं। संभव है कि आगे चलकर आप स्वयं को उत्तरों के भीतर जीता हुआ पाएं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आपके भीतर उठने वाले सवालों और भावनाओं का उत्तर देने वाला बाहर नहीं है। कोई ऐसा स्थान, कोई व्यक्ति या कोई व्यवस्था नहीं, जो आपके हृदय की गहराइयों में चल रहे उस मौन संवाद को पूरी तरह समझ सके। आपके भीतर अपना एक स्वतंत्र जीवन है, जो बाहरी संसार से अलग अपनी गति में बहता है। शब्द चाहे जितने स्पष्ट, सुंदर या तर्कपूर्ण क्यों न हों, वे उस गहराई तक नहीं पहुंच पाते, जहां अनुभव जन्म लेते हैं। जो सत्य सबसे गहरे होते हैं, वे अक्सर कहे नहीं जा सकते, वे केवल जिए जा सकते हैं।

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यह आवश्यक नहीं कि जीवन आपको निरुत्तर छोड़ दे। उत्तर किसी एक क्षण में प्रकट नहीं होते, वे आकार लेते हैं। यदि आप उन साधारण चीजों पर भरोसा करना सीख लें, जिन पर इस समय आपकी दृष्टि ठहरी है, प्रकृति की सहज उपस्थिति पर, उन छोटे अनुभवों पर, जिन्हें प्रायः लोग अनदेखा कर देते हैं, तो आप पाएंगे कि वही क्षण अचानक असीम हो जाते हैं। वही छोटे अनुभव, जिन्हें हमने तुच्छ समझा था, भीतर कहीं स्थिरता और अर्थ का आधार बन जाते हैं।

यदि आप उस विनम्रता से प्रेम करना सीखें, तो जीवन अधिक संगत, अधिक मेल-जोल वाला और भीतर से अधिक सांत्वनादायक बन जाता है। संभव है कि यह परिवर्तन तुरंत आपकी चेतना में स्पष्ट न हो, क्योंकि चेतन मन अक्सर आश्चर्य में पीछे रह जाता है, प्रश्नों से उलझा रहता है। पर आपकी अंतरात्मा में, आपकी सजगता और गहन बोध में, यह परिवर्तन चुपचाप आकार लेता रहता है। आप अभी जीवन की दहलीज पर खड़े हैं। बहुत कुछ शुरू होना बाकी है, बहुत कुछ बनना शेष है। इसलिए यह आवश्यक है कि आप अपने हृदय में जो कुछ अभी अधूरा है, उसके साथ धैर्य रखें।
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उन प्रश्नों से प्रेम करना सीखें, जो अभी उत्तरहीन हैं। उन्हें बोझ नहीं, संभावना की तरह देखें। उन्हें ऐसे स्वीकार करें, जैसे वे बंद कमरे हों, या किसी अनजानी भाषा में लिखी पुस्तकें हों, जिन्हें समझने के लिए पहले उस भाषा में जीना आवश्यक है। उत्तर पाने की जल्दबाजी न करें। जीवन का सार यही है, सब कुछ जीना, स्पष्टता के साथ ही नहीं, बल्कि अधूरेपन के साथ भी। इसलिए अभी प्रश्नों को जिएं। संभव है कि आगे चलकर, आप स्वयं को उत्तरों के भीतर जीता हुआ पाएं। शायद आपके भीतर सृजन की कोई संभावना छिपी हो, जीने का एक विशिष्ट, मौलिक और पवित्र ढंग। स्वयं को उसके लिए तैयार करें। लेकिन जो कुछ भी जीवन आपके सामने लाए, उसे विश्वास के साथ स्वीकार करें। जब तक वह आपकी अपनी इच्छा से, आपकी आत्मा की किसी गहरी आवश्यकता से उपजता है, तब तक उसे अपना उत्तरदायित्व मानकर अपनाएं, क्योंकि जीवन हमें तैयार अर्थ नहीं देता। वह हमें स्वतंत्रता देता है, और उसी के साथ जिम्मेदारी भी। जीवन का अर्थ खोजा नहीं जाता, थोपा नहीं जाता, उसे रचा जाता है।

अपने कर्मों से अर्थ रचें
आपके भीतर उठने वाले प्रश्न और भावनाएं केवल आपके अनुभव हैं, उत्तर बाहर नहीं मिलेंगे। साधारण चीजों, प्रकृति और विनम्रता पर भरोसा करें। अपने कर्मों से अर्थ रचें, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को स्वीकार करें। भविष्य को संवारने के लिए वर्तमान में सही निर्णय लेना आवश्यक है। यही जीवन की सच्ची गरिमा और सृजन का मार्ग है।

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