मेरी दिक्कत है कि आज के समय में मेरी उपस्थिति बहुत कम है। मेरा समय मेरी वृद्धावस्था की तरह ही है। मैं घर से बाहर निकलता नहीं। मेरा लोगों से मिलना-जुलना कम हो गया है। मैं सिमट गया हूं। अब मेरी दुनिया मेरे घर के करीब हो गई है। बरामदे के झूले पर बैठ कर मैं सड़क के लोगों को आते-जाते देखते रहता हूं। उन्हें देखकर मैं उनकी दुनिया की कल्पना करता हूं। उनमें स्त्री, पुरुष, स्कूल जाने वाले और न जाने वाले बच्चे होते हैं। उन्हें देखकर मैं दुनिया की कल्पना करता हूं।
वैसे मैं बहुत ही घुमक्कड़ किस्म का व्यक्ति कभी नहीं रहा। मैं बहुत ज्यादा बाहर नहीं निकला और चूंकि मैं लिखने-पढ़ने में लग गया था, तो मुझे भारत में इधर-उधर जाने का जो मौका मिला, वह केवल इसी की वजह से। जहां मुझे आमंत्रित किया गया, बुलाया गया, मैं वहां गया। अपने मन से घूमने के लिए मैं कहीं नहीं गया। मेरे पास समय कम था, मुझे लगता था कि मेरा सारा समय जो है, यहीं होने से, अपने घरवालों के साथ होने में बीत जाता है, और मुझे लगता था कि समय की कमी है। तो मैं यह कह रहा था कि अगर मैं कहीं विदेश भी गया, तो कविता पाठ के कारण ही गया। अपने पैसों से मैंने कोई घुमक्कड़ी नहीं की, न मेरे परिवार ने की है। हम लोग सिमटे हुए रहे। तो जो कुछ भी मेरा अनुभव है, वह अनुभव यहीं का है, इस अनुभव को आप छत्तीसगढ़ का अनुभव कह सकते हैं। बिना स्थानिक हुए आप वैश्विक नहीं हो सकते। मैं बहुत स्थानिक किस्म का व्यक्ति रहा हूं, और मुझ में जो कुछ भी वैश्विकता की जानकारी है, वह अधिक स्थानीयता की वजह से है।
हां, अच्छा मनुष्य बनने के लिए मैंने बराबर संघर्ष किया। हम मरते दम तक एक अच्छा मनुष्य बनने की कोशिश करते हैं। ये लिखना-पढ़ना भी एक उसी कोशिश की कथा है, ये लोगों की कथा है कि मैं उनके साथ एक लोग की तरह शामिल हूं। मेरी आस्था जो है, वह मनुष्यता की तरफ है।
मुझे यह बहुत अच्छा लगता है कि घर में दीया जल रहा है। चूंकि, मैं इसको एक परंपरा की तरह देखता हूं कि घर में दीया जल रहा है, तो जब कभी पत्नी भूल गई, या उसे दीया जलाने की याद देर से आई, तो मैं उसे याद दिलाता था, कि तुमने अभी तक दीया नहीं जलाया। मेरी आस्था, मेरी आस्तिकता, मेरे परिवार के साथ में है और मेरी प्रार्थना हमेशा से यही रही है कि मुझे एक अच्छा मनुष्य बना दो।
मेरे लिए परंपरा का मतलब अच्छी परंपरा से और समय के अनुसार अनुकूल परंपरा से है। परंपरा अपने आप बदलती है; समय की स्थितियां और परिस्थितियां इस तरह से बनती हैं कि जो परंपरा उसके अनुकूल नहीं है, वह बदल जाती है और समय के अनुकूल हो जाती है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जैसे ऋतुएं बदल जाती हैं, वैसे परंपरा बदल जाती है। पता नहीं पहले जब बरसात होती थी, तो कितनी बरसात होती थी। हम पुरानी चीजों को समेट कर रखना चाहते हैं। हम उन्हीं अच्छी चीजों को समेट कर रखें, जो हमारी परंपरा में कभी रहीं हों। स्थितियों और समय के बदलने के अनुसार हमें बीते हुए के बारे में आज के समय के लोगों को जरूर बताना चाहिए। यह साथ में होने का जरूरी हिस्सा है। बिना अनुभव के, किसी दूसरे का अनुभव हमारा अनुभव बने, और हम अपने अनुभव के अनुसार, जो हमारे लिए जरूरी है, उसको अपना लें।
चीजें बहुत बदल गई हैं पहले से। अब वह पांच-दस हजार साल पुरानी स्थितियां नहीं रहीं। परंपरा को कितना भी समेटना चाहें, हम नहीं समेट सकेंगे। लेकिन हमारी याददाश्त जितना समेट पाती है, उतना हम समेट लेते हैं और समय के अनुसार तो चीजें बदलती रहती हैं। समय भी एक परंपरा है। देखिए, जिस तरह समय हमेशा एक-एक पल में बदलता रहता है, तो परंपरा भी समझ लीजिए कि एक-एक पल में बदलती रह सकती है। (साक्षात्कारों पर आधारित)