नाना पाटेकर का अचानक जाना हिंदी सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति है। वह केवल अभिनेता नहीं थे। वह अपने आप में एक अलग किस्म के इंसान थे। उन्हें देखकर लगता था कि वह अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि जो कह रहे हैं, उसे जी रहे हैं। नाना की जिंदगी भी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं थी। एक साधारण परिवार में जन्मे नाना ने बहुत छोटी उम्र में गरीबी देखी। उनके पिता का कारोबार डूब गया था। घर की हालत इतनी खराब हो गई कि पढ़ाई के साथ उन्हें काम भी करना पड़ा।
नाना कम उम्र में फिल्मों के पोस्टर रंगने का काम करते थे। इसके लिए उन्हें बहुत थोड़े पैसे मिलते थे और एक वक्त का खाना भी। उस उम्र में दूसरे बच्चे खेलते थे, लेकिन नाना जिंदगी की मुश्किलों से लड़ना सीख रहे थे। शायद यही वजह थी कि बाद में जब वह पर्दे पर किसी गरीब, परेशान या गुस्से में भरे आदमी का किरदार निभाते थे तो वह अभिनय नहीं लगता था। लगता था कि वह आदमी उनके सामने खड़ा है।
नाना ने कभी अपने संघर्ष को छिपाया नहीं। वह खुलकर बताते थे कि उन्होंने भूख देखी है, गरीबी देखी है और अपमान भी सहा है। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने अभिनय की बहुत सी बातें जिंदगी से सीखी हैं। उनके जीवन में दु:ख कम नहीं थे। पिता के साथ उनका बहुत गहरा रिश्ता था। पिता की बीमारी और फिर उनकी मृत्यु ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया।
उस समय भी नाना काम करते रहे। जिंदगी रुकने का मौका नहीं देती थी, लेकिन सबसे बड़ा दुख उन्हें तब मिला जब उन्होंने अपने छोटे बेटे को खो दिया। उनका बेटा जन्म से ही गंभीर बीमारी से जूझ रहा था और बहुत कम उम्र में उसकी मृत्यु हो गई। यह ऐसा दु:ख था, जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है। इस घटना ने नाना को भीतर से बदल दिया।
शायद इसी कारण बाद के वर्षों में नाना की बातों में जिंदगी को लेकर एक अलग तरह की समझ दिखाई देती थी। उन्हें मालूम था कि पैसा, प्रसिद्धि और सफलता सब कुछ नहीं हैं। जिंदगी किसी भी मोड़ पर इंसान से बहुत कुछ छीन सकती है। फिल्मों में आने के बाद भी नाना ने कभी खुद को बाकी सितारों जैसा नहीं बनाया। उन्हें चमक-दमक से ज्यादा मतलब नहीं था। वह अपने तरीके से जीने वाले इंसान थे।
रंगमंच उनका पहला प्यार था। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने थिएटर में लंबा संघर्ष किया। यही कारण है कि उनके अभिनय में वह गहराई दिखाई देती थी जो केवल कैमरे के सामने खड़े होकर नहीं आ सकती। ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘खामोशी’, ‘तिरंगा’, ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। फिर ‘वेलकम’ जैसी फिल्म में उन्होंने ऐसा हास्य किया कि नई पीढ़ी भी उनकी प्रशंसक हो गई।
नाना की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वह किसी एक छवि में बंधकर नहीं रहे। वह खलनायक भी बने, पुलिस अधिकारी भी, सैनिक भी, आम आदमी भी और हास्य कलाकार भी। हर भूमिका में वह अलग दिखाई दिए, लेकिन उनके अभिनय में एक चीज हमेशा एक जैसी रही, वो थी सच्चाई।
उनके संवाद बोलने का तरीका भी अलग था। वह चिल्लाते नहीं थे, फिर भी उनकी आवाज में इतना असर होता था कि दर्शक चुप हो जाता था। कई बार तो वह कुछ कहते भी नहीं थे और उनकी आंखें ही बहुत कुछ कह देती थीं।
नाना पाटेकर का एक कम चर्चित पक्ष उनका सैनिकों के प्रति लगाव भी था। वह टेरिटोरियल आर्मी से जुड़े और कारगिल के दौरान सैनिकों के साथ समय बिताया। यह काम उन्होंने किसी फिल्मी भूमिका के लिए नहीं किया था। शायद सैनिकों की जिंदगी की कठिनाई को समझने की उनकी अपनी इच्छा थी।
नाना की जिंदगी में सादगी भी थी। इतनी प्रसिद्धि मिलने के बाद भी वह आम आदमी की तरह रहना पसंद करते थे। वह अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूले। शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
नाना का गुस्सा भी काफी चर्चित रहा, लेकिन जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, वे कहते थे कि उस गुस्से के पीछे एक बहुत संवेदनशील आदमी था। वह गलत बात को आसानी से स्वीकार नहीं करते थे। कई बार अपनी बात कहने का उनका तरीका बहुत सीधा और कठोर होता था। नाना पाटेकर ने जीवन को बहुत करीब से देखा था। गरीबी भी देखी, सफलता भी देखी।
अपमान भी सहा और सम्मान भी पाया। अपनों को खोने का दर्द भी झेला और करोड़ों लोगों का प्यार भी मिला। शायद इसी वजह से उनके अभिनय में बनावट नहीं थी। उनकी आंखों में जो दर्द दिखाई देता था, वह केवल अभिनय का हिस्सा नहीं था। वह जिंदगी से आया था।
आज नाना हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में रहेंगी। उनके संवाद रहेंगे। उनकी आवाज रहेगी। सबसे बढ़कर वह याद रहेगी कि एक साधारण परिवार का लड़का अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर हिंदी सिनेमा का इतना बड़ा नाम बना। नाना पाटेकर को याद करने का सबसे अच्छा तरीका शायद यही है कि उन्हें सिर्फ एक अभिनेता के रूप में याद न किया जाए।
उन्हें उस इंसान के रूप में याद किया जाए जिसने जिंदगी की मुश्किलों से लड़कर अपना रास्ता बनाया। जिसने गरीबी देखी, लेकिन खुद को टूटने नहीं दिया। जिसने अपनों को खोया, लेकिन जीना नहीं छोड़ा और जिसने सफलता मिलने के बाद भी अपने भीतर के उस साधारण आदमी को मरने नहीं दिया। यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान थी। पर्दे पर वह किरदार निभाते थे, लेकिन जिंदगी में उन्होंने खुद को जिया।
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