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जीवन और साहित्य से दूर होते खतों के नाम एक खत

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हमेशा की तरह दो - तीन किताबें लैपटॉप बैग में डालीं और हैदराबाद नामपल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ा । - फोटो : pixabay
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हफ़्ते भर पहले ऑफिस के किसी काम के सिलसिले में चेन्नई जाना हुआ। हमेशा की तरह दो - तीन किताबें लैपटॉप बैग में डालीं और हैदराबाद नामपल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़ा । अपनी बर्थ पर सेटल होने के बाद रीडिंग लैंप जलाया और हाल ही में ‘नॉर्दन इंडिया पत्रिका’ के संपादक श्री वी. एस. दत्ता द्वारा भेंट की हुई तथा श्री रमेशचन्द्र द्विवेदी की लिखी ‘ मैंने फ़िराक़ को देखा था ’ को पढ़ना आरम्भ कर दिया।

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यह किताब फ़िराक़ साहब के जीवन से जुड़ी बहुत सारी मज़ेदार और रोचक घटनाओं से भरी पड़ी थी, इसलिए कब रात के तीन बज गए पता ही न चला। द्विवेदी जी ने बहुत सारे निजी ख़त, जो फ़िराक़ साहब ने उन्हें लिखे थे, उनकी ब्लैक एंड वाइट कॉपीज़ भी किताब के अंत में संकलित की हैं।

उन निजी पत्रों के बीच एक ज़माने बाद अंतर्देशीय पत्र तथा पोस्ट कार्ड्स की झलक देखने को मिली। संयोग ऐसा कि दूसरे ही दिन व्हॉट्सएप ग्रुप में किसी एक मित्र ने ‘कम लिखे को ज़्यादा समझना’ शीर्षक के साथ असमानी-नीले रंग का अंतर्देशीय पत्र और बड़ी जानी-पहचानी सी खाकी रंग के पोस्टकार्ड की तस्वीर शेयर कर दी। द्विवेदी जी की किताब तथा व्हॉट्सएप के इस पोस्ट ने मानो मुझे फिर दो दशकों पूर्व के युग में ज़ोर से धकेल दिया हो। एहसास हुआ कि हम कितना आगे निकल आए हैं। आज जहां पलक झपकते हमारे संदेश प्रिय जनों तक पहुंचते हैं, वहीं लगभग दो दशकों पूर्व आम तौर पर आपकी बात गन्तव्य तक पहुंचने में हफ़्तों और कभी- कभी महीनों भी लग जाते थे ।
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तभी तो ग़ालिब ने कहा था : 
“ क़ासिद के आते - आते ख़त इक और लिख रखूं , 
  मैं  जनता  हूं  जो  वो  लिखेंगे जवाब   में ”
 

पोस्ट ऑफिस तथा डाकिया (पोस्टमैन ) का हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान था। - फोटो : pixabay
पोस्ट ऑफिस तथा डाकिया (पोस्टमैन ) का हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान था। तब डाकिये को लोग अपने परिवार का ही सदस्य मानते थे। हमारी हिंदी फ़िल्मों में तो उन पर बहुत सारे गीत भी लिखे गए हैं। राजेश खन्ना पर फ़िल्माया गया ‘ डाकिया डाक लाया, ख़ुशी  का पैग़ाम लाया’ भला कौन भूल सकता है ? पोस्टमैन की साइकिल की घंटी सुनते ही, अधिकतर लोग खिल उठते थे।

आज जहां सैकड़ों मैसजिंग एप्स उपलब्ध हैं, उन दिनों सामान्यतः लोग ख़त लिखने के लिए अंतर्देशीय पत्र या पोस्टकार्ड का ही प्रयोग करते थे। विदेशों में संपर्क के लिए नीले-गुलाबी बॉर्डर वाले एयर- मेल लिफाफे प्रचलित थे और सबसे मज़ेदार होते थे - बैरंग ख़त, जिस पर पत्र लिखने वाला बिना कोई टिकट लगाए ही अपने परिचित को भेज देता था और उसका भुगतान उस बेचारे इन्सान को करना पड़ता था ।

हमारे यहां जब भी बैरंग ख़त आते थे, तो हमारी माता जी उन भेजने वाले रिश्तेदारों पर बहुत नाराज़ होती और कहती थीं, “ उनको ऐसी क्या जल्दी थी कि टिकट भी न लगा सके, हम लोग कहीं भागे जा रहे थे क्या’? इतना कहने के बाद ही वो डाकिया साहब को उस  बैरंग खत का मुआवज़ा देतीं ।

इलाहाबाद में हमारा घर प्रधान डाकखाने के पास ही था। अक्सर नाते-रिश्तेदार वहां आते, तो हमारे यहां चाय पी कर ही जाते। उनका ऐसा मानना था कि हमारे यहां वाले डाकघर के पोस्टबॉक्स में पत्र डालने से वह अपने गन्तव्य जल्दी पहुंचता है। हमारी मासी जी (जिनके पति विदेश में रहते थे ) हमको अपने आउट-लैंड लिफ़ाफ़े के साथ अतिरिक्त पांच रुपये भी देकर जाती थीं और कहती थीं , ‘जल्दी से इसे एयर मेल वाले पोस्टबॉक्स में बिना लापरवाही के डाल आना।‘  मैं छोटा था और मुझे हमेशा यह भय होता था कि पत्र डालते समय कहीं पोस्टबॉक्स में मेरा हांथ न फंस जाये।

 

ख़त या चिट्ठी लिखने का एक ख़ास प्रारूप होता था। ख़त की शुरू की तीन-चार लाइने तय होती थीं । - फोटो : shutterstock
पाताल लोक से लगते थे पोस्टबॉक्स
सही बताऊं तो यह पोस्टबॉक्स भी बहुत अजीब होते थे या यूं कहिये कि निरा पाताल लोक। आपने एक बार उसमें पत्र डाल दिया और फिर सोचें कि ई-मेल की तरह कोई ग़लती याद आने पर उसे  ‘रिकॉल’ कर लिया जाये, तो वह लगभग असम्भव था। अब तो हमारे पास ‘डिलीट फॉर एवरीवन’ का भी विकल्प है। उस समय इसकी परिकल्पना भी मुश्किल थी।

एक बार तो साहब ग़ज़ब ही हो गया। मैंने किसी पत्रिका के लिए एक लेख लिखा और फिर उसे दिल्ली डाक से भेजने के लिए पोस्टबॉक्स में शाम को डाल आया। रात में ध्यान आया  कि लेख के ‘बॉक्स’ में क्या जायेगा, उसको तो हाईलाइट ही नहीं किया। नया- नया लिखना शुरू किया था ,अपनी तरफ से सम्पादक महोदय को कोई तकलीफ नहीं देना चाहता था। इसलिए परेशान हो गया।

अब क्या करता ? मेरा लेख लिफ़ाफ़े में क़ैद होकर पोस्टबॉक्स रूपी पाताल लोक में जा चुका था। पर मैंने हार नहीं मानी। भोर होते ही टहलने के बहाने पोस्टबॉक्स के सामने जाकर खड़ा हो गया और पोस्ट- डेलिवेरी वैन की प्रतीक्षा करने लगा। लाल रंग की गाड़ी आयी। मैंने अपना परिचय देते हुए उसके स्टाफ को सारी कहानी बताई और उनसे मेरा लिफ़ाफ़ा वापस करने का आग्रह किया। बमुश्किल तमाम उन्होंने मेरा लिफ़ाफ़ा पान की कुछ गिलौरियों के बदले वापस किया।

बात निकली है और बहुत दूर तक जा रही है। हम पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्रों की बात कर रहे थे। 80-90 के दशक तक प्रायः घरों की बुज़ूर्ग महिलाओं का साक्षरता अनुपात आज की तुलना में काफ़ी कम होता था। प्रियजनों  तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ये बुजुर्ग महिलाएं  घर के बच्चों से ख़त लिखवाया करती थीं। मैंने भी कक्षा आठ तक ऐसे बहुत से रिश्तेदारों के पत्र उनकी ओर से लिखे हैं।


ख़त या चिट्ठी लिखने का एक ख़ास प्रारूप होता था। ख़त की शुरू की तीन-चार लाइने तय होती थीं । मेरी बड़ी मासी जब भी बरेली से इलाहाबाद आती थीं, तो तुरंत मुझे अन्तर्देशीय कार्ड लाकर उनकी बेटी को कुशल-मंगल का ख़त लिखने को कहतीं । ख़त की शुरुआत हमेशा ऐसे होती, “ नूर चश्मी  नुसरत जहाँ, ख़ुश रहो ! बाद दुआ के मालूम हो कि यहाँ पर सब ख़ैरियत है। दिगर अहवाल यह है कि ..”
 
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कोर्टशिप के दौरान हमारी श्रीमती जी भी गुरुग्राम हमें ख़तों के ज़रिए ही अपने दिल की बात बताती थीं । - फोटो : Pixabay
हमारी कॉलोनी में एक कुसुम आंटी थीं। मैं उनके यहां टीवी देखने जाया करता था , उनकी बड़ी बेटी - जिनका तलाक़ हो चुका था, मेरा इस्तेमाल अपने तलाकशुदा पति को पत्र लिखवाने के लिए करती थीं । वह न जाने क्या-क्या मुझसे लिखवाती थीं और आश्चर्य यह था कि कभी उन पत्रों को पोस्ट भी नहीं करती थीं और हमेशा यह कहतीं कि समय नहीं मिला, इन्हें जल्द भेजूंगी :

“ हम पर जो ग़ुज़री बताया न बताएंगे  कभी, 
कितने ख़त अब भी तेरे नाम  लिखे  रखे  हैं “ 


कोर्टशिप के दौरान हमारी श्रीमती जी भी गुरुग्राम हमें ख़तों के ज़रिए ही अपने दिल की बात बताती थीं । उनके लिए बस इतना कहूंगा – ‘आज तक तेरे खतों से तेरी ख़ुशबू न गयी !’ शादी को एक साल थे, तो जवाब में मैं किसी शायर का यही शेर यही कहता: 

“काफ़ी है मेरे दिल की तसल्ली को यही बात 
आप आ न सके, आपका  पैग़ाम  आ   गया “



बिलकुल सही बात है, बज़ाहिर  ये कार्ड्स, महज़  काग़ज़ का एक हिस्सा होते थे, पर अपने अंदर भावनाओं का एक समन्दर  बांधते थे । जिन्हें खोलकर अक्सर  पढ़ने वालों की आंखों से अश्रु रूपी अमृत शब्दों के उस समन्दर में घुल जाता था । किसी शायर ने ख़ूब कहा है: 

“अश्कों के  निशां पर्च -ए-सादा पे निहां  क़ासिद,  
 अब कूछ  न बयां कर ये  इबारत  ही  बहुत    है ”


मुझे अक्सर मेरे प्रोफेसर मित्र डॉ काज़मी की ये बात याद आती है कि अफ़सोस हमारे नवीन साहित्य / शायरी  से ‘ख़त’ जैसे अहम शब्द ग़ायब होते जा रहे हैं । क्या ‘चिट्ठी आयी है वतन से चिट्ठी आयी है’  जैसे गीत फिर हमसे यह कहेंगे कि ‘पहले जब तू ख़त लिखता था, काग़ज़ में चेहरा दिखता था?’

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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