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Climate Change: जलवायु परिवर्तन का समुद्री स्तनधारियों पर प्रभाव

सार

बढ़ते तापमान और बदलती समुद्री धाराएं व्हेल, डॉल्फिन और पोरपॉइज़ जैसे समुद्री स्तनधारियों के भोजन (शिकार) की उपलब्धता को प्रभावित कर रही हैं। ये प्राणी समुद्री खाद्य श्रृंखला (फूड वेब) को संतुलित रखने और पोषक चक्र (न्यूट्रिएंट साइक्लिंग) में मदद करते हैं।
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हंपबैक डॉल्फिन - फोटो : प्रदीप एन चोगले
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विस्तार
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समुद्री स्तनधारी, जिन्हें अक्सर "समुद्र के शांत दिग्गज" कहा जाता है, समुद्री पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन उनके आवास, जीवन और पारिस्थितिकी में बड़े बदलाव ला रहा है, जो चिंता का विषय है।

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20वीं सदी की शुरुआत से, महासागर ने ग्रीनहाउस गैसों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का लगभग 93% भाग अवशोषित कर लिया है। इसके कारण समुद्र की सतह का तापमान लगभग 1°C तक बढ़ गया है, जिससे पूरी दुनिया के समुद्री तंत्र प्रभावित हुए हैं।

इसके अलावा, महासागर ने मानव द्वारा उत्सर्जित लगभग 30% कार्बन डाइऑक्साइड को भी अवशोषित किया है, जिससे समुद्र का pH स्तर कम हुआ है और जल रसायन (केमिस्ट्री) बदल रही है। ये प्रभाव ठंडे, उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में सबसे गंभीर हैं, जहां ऑक्सीजन का स्तर भी घट रहा है।
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बढ़ते तापमान और बदलती समुद्री धाराएं व्हेल, डॉल्फिन और पोरपॉइज़ जैसे समुद्री स्तनधारियों के भोजन (शिकार) की उपलब्धता को प्रभावित कर रही हैं। ये प्राणी समुद्री खाद्य श्रृंखला (फूड वेब) को संतुलित रखने और पोषक चक्र (न्यूट्रिएंट साइक्लिंग) में मदद करते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ये नए तनाव का सामना कर रहे हैं।

आर्कटिक क्षेत्र के व्हेल जैसे नारव्हाल, बेलुगा व्हेल और बोहेड व्हेल सबसे अधिक खतरे में हैं। आर्कटिक में तापमान वैश्विक औसत से दोगुना तेजी से बढ़ रहा है, जिससे समुद्री बर्फ तेजी से पिघल रही है। यह बर्फ उनके लिए बेहद जरूरी आवास (हैबिटेट) है।

मिंकी व्हेल्स का आवास (हैबिटेट) घटती बर्फ के कारण खतरे में पड़ सकता है, जबकि राइट व्हेल्स को भोजन की कमी का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उनके शिकार क्षेत्रों में बदलाव आ रहा है। ये बदलाव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) की स्थिरता और इन प्रजातियों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।

आर्कटिक सील्स जैसे रिंग्ड सील्स, बीर्डेड सील्स, हार्प सील्स और हूडेड सील्स समुद्री बर्फ पर निर्भर रहते हैं। यह बर्फ उन्हें बच्चे (पिल्लों) को जन्म देने, शिकार से बचने और आराम करने के लिए सुरक्षित स्थान प्रदान करती है। लेकिन गर्म होते तापमान के कारण बर्फ की मोटाई और बर्फ पर बर्फीली परत (स्नो कवर) कम हो रही है।

2019 के नेचर क्लाइमेट चेंज अध्ययन के अनुसार, 2100 तक बर्फीली परत में 50% की कमी हो सकती है, जिससे रिंग्ड सील के पिल्लों के जीवित रहने की संभावना घट जाएगी।

इसके अलावा, समुद्री बर्फ का पिघलना सील्स के भोजन की उपलब्धता को भी प्रभावित करता है। मछलियां और छोटे जीव-जंतु ठंडे पानी में पनपते हैं, लेकिन जब बर्फ घटती है तो ये जीव भी कम हो जाते हैं। इससे सील्स को भोजन की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी ऊर्जा खपत बढ़ जाती है।

बर्फ के कम होने से इंसानों की गतिविधियां जैसे शिपिंग, तेल ड्रिलिंग और मछली पकड़ना बढ़ रहे हैं। ये गतिविधियां समुद्री स्तनधारियों के आवास को नष्ट करती हैं और प्रदूषण तथा बायकैच (गलती से फंसना) जैसे खतरे को बढ़ाती हैं।

समुद्री स्तनधारियों के भविष्य को बचाने के लिए तुरंत और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि जलवायु परिवर्तन किस तरह उनके व्यवहार, वितरण और पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है। समुद्री संरक्षित क्षेत्र (Marine Protected Areas) विकसित करने और शिपिंग, प्रदूषण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए नीतियां बनानी होंगी।

समुद्री स्तनधारी समुद्री इकोसिस्टम को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं और हमें प्रकृति की ताकत और सुंदरता का एहसास कराते हैं। यदि हम जलवायु परिवर्तन और संरक्षण की चुनौतियों का समाधान करेंगे, तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इन समुद्री जीवों और उनके आवास को बचा पाएंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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