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जिजीविषा: बादल जब उमड़ते हैं, वे जीवन की नई संभावनाएं लेकर आते हैं

सार

जिजीविषा: बादल हमें यह भी सिखाते हैं कि हर घटना का एक उचित समय होता है। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। यह वह धैर्य है जो अध्यात्म की नींव है। “कालः कर्षति भूतानि”, समय ही सबका निर्माता है।
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सांकेतिक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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क्या आपने कभी पहली वर्षा की उस गंध को महसूस किया है, जो तपती हुई धरती से उठती है? जैसे वर्षों पुराना कोई वादा पूरा हो गया हो? जैसे आकाश ने धरती को फिर से स्मरण किया हो? बादल जब उमड़ते हैं, तो वे जीवन की नयी संभावनाएं लेकर आते हैं। वर्षा केवल खेतों की नहीं, अंतरात्मा की भी सिंचाई करती है। वह बताती है कि ठहराव के बाद गति और सूखे के बाद हरियाली भी संभव है। जैसे बादल धीरे-धीरे आकार लेते हैं, वैसे ही साधना से भीतर की अनुभूति पूर्णता की ओर बढ़ती है। यही तो वेदों का संदेश है, कि ऋतुओं के परिवर्तन में ही ब्रह्म की गति है, और जब पहली बूंद गिरती है, तो वह चेतना की पुकार होती है।

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वेदों में वर्षा को “ऋतस्य गर्भः” कहा गया है, वह जो ऋतु (नियम, गति, धर्म) को जन्म देती है। प्रकृति की यह स्थायी पुनरावृत्ति हमारे भीतर की चेतना को एक नया प्रारंभ देती है। वर्षा का हर आगमन हमें यह सिखाता है कि हर अंत के बाद एक नव आरंभ संभव है। जब भूमि महीनों तक तपकर कठोर हो जाती है, तो वह पहली बूँद को आत्मसात कर फूल जाती है। हम भी जीवन में कई बार ऐसे कठिन काल से गुजरते हैं, जहां भावनाएं सूख जाती हैं, संबंध बंजर हो जाते हैं, और विश्वास की भूमि दरकने लगती है। लेकिन यदि धैर्य रखा जाए, तो भीतर का आकाश भी बादलों से भर सकता है। यह वर्षा केवल बाहर नहीं, भीतर भी घटती है।

मनोविज्ञान में एक सिद्धांत है, “Resilience” (प्रत्यास्थिता), जिसका अर्थ है: कठिन परिस्थितियों से पुनः उठ खड़ा होने की क्षमता। यह वही है जो वृक्षों के सूखने के बाद पुनः हरे-भरे पत्तों से पूर्ण कर देता है। हमारी आत्मा में भी वही प्रत्यास्थिता है, कि हम कितनी भी बार टूटें, फिर भी पुनः खिल सकते हैं। जैसे धरती जल को पीती नहीं, आत्मसात करती है; वैसे ही साधक प्रत्येक अनुभव को पीड़ा नहीं, प्रज्ञा में बदलता है। इसी प्रकार, जब बादल बिना किसी कारण के छा जाते हैं, और आसमान को घेर लेते हैं, वह अनिश्चितता नहीं, प्रतीक्षा होती है। उस प्रतीक्षा में आनंद छिपा होता है। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि जो योगयुक्त होता है, वह सहजता से आनंद को प्राप्त करता है। ठीक वैसे ही, जब हम जीवन की वर्षा का स्वागत करना सीख लेते हैं, बिना भय, बिना आशंका, तो वही साधारण क्षण एक महान अनुभव बन जाता है। वर्षा जब गिरती है, तो वह सबको एकसमान छूती है, यह समदृष्टि हमें सिखाती है कि आत्मिक दृष्टि किसी में भेद नहीं करती।
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जिजीविषा: जब आत्मा ऑक्सीजन मांगने लगे, एक अदृश्य प्रदूषण की पुकार

बादल हमें यह भी सिखाते हैं कि हर घटना का एक उचित समय होता है। इसके लिए धैर्य की आवश्यकता होती है। यह वह धैर्य है जो अध्यात्म की नींव है। “कालः कर्षति भूतानि”, समय ही सबका निर्माता है। साधना में भी यही होता है, हम जब भीतर की आग को सहते हैं, तब कोई अदृश्य शक्ति धीरे-धीरे बादलों को हमारे अंतरिक्ष में एकत्र करती है, और जब भीतर के तप की घड़ी पूरी होती है, तब वर्षा गिरती है। कभी वह करुणा बनकर, कभी मौन बनकर, कभी आत्म-ज्ञान की बूँद बनकर सामने आती है। वर्षा की बूँद का स्थिर स्वर हमें भीतर के मौन से परिचित कराता है, जहाँ शब्द नहीं, केवल अनुभव होता है। प्रकृति के इस चक्र में एक और रहस्य है, हर वर्षा के बाद इंद्रधनुष का उगना। वह सात रंग जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन में हर अनुभव, चाहे वह सुख हो या दुःख, एक रंग है, और सब मिलकर ही पूर्णता बनाते हैं। यदि एक भी रंग न हो, तो इंद्रधनुष अधूरा है।

इसी प्रकार, जीवन में जो वर्षा हमें दुखी करती है, वही हमें रंगों से भर देती है। यह सत्य है कि कभी-कभी हम जीवन में ऐसे समय से गुजरते हैं जहाँ सब कुछ स्पष्ट होता है, आकाश की तरह नीला, लेकिन शुष्क। हम जानते हैं कि हमें क्या करना है, किन्तु भीतर कोई तरलता नहीं बचती। ऐसे समय बादल हमें सिखाते हैं कि भरा हुआ होना एक प्रक्रिया है। उन्हें बनने में समय लगता है। जीवन में भी अनुभवों को, पीड़ाओं को, प्रेम को इकट्ठा होने देना होता है, तब कहीं जाकर एक पूर्ण भावना बनती है, जो किसी दिन वर्षा की तरह उतरती है। आज जब पर्यावरण असंतुलित हो गया है, वर्षा कभी समय से पहले आती है, कभी देर से, तो इसका संकेत केवल जलवायु परिवर्तन तक सीमित नहीं। यह आत्मिक संकेत भी है, कि हमें फिर से प्रकृति के साथ अपनी लय को साधना है। बादल हमें यह सिखाते हैं कि अधूरे होकर भी ठहरना संभव है। वे पूर्ण नहीं होते, लेकिन तब भी आकाश को ढँक लेते हैं। यह सहना, यह प्रतीक्षा, यह विसर्जन, सब कुछ एक आध्यात्मिक अभ्यास बन सकता है यदि हम देखने का भाव बदल दें।

जब हमारी आंतरिक ऋतुएँ, हमारी चेतना की गति, प्रकृति के साथ सामंजस्य में आती हैं, तभी जीवन में पूर्णता उतरती है। क्योंकि जब प्रकृति गिरती है, वह टूटती नहीं, निखरती है। वर्षा उसी निखरने की भाषा है। और हम भी प्रकृति की ही संतति हैं। बादल हमें सिखाते हैं, अपने भीतर की अस्थिरता को स्वीकारना। और वर्षा सिखाती है, उसे प्रकट कर देना, बिना संकोच, बिना भय। यही वह मार्ग है जो हमें भीतर की स्पष्टता और बाहर की सहजता दोनों देता है। जब जीवन में उलझन हो, जब दिशा स्पष्ट न हो, तब केवल एक क्षण आकाश की ओर देखना पर्याप्त हो सकता है, हो सकता है, आपके भीतर भी कुछ घटने लगे जो शब्दों से परे हो। इसलिए अगली बार जब वर्षा हो, जब बादल आकाश को ढँकें और पहली बूँद धरती को छुए, तो एक क्षण ठहरिए। न केवल छाते के नीचे, बल्कि आत्मा के भीतर। पूछिए स्वयं से, क्या मैंने भी कुछ संचित कर रखा है जो अब बहने को तैयार है? क्या मेरे भीतर भी कोई बादल बन चुका है जो कृपा की वर्षा बन सके? क्योंकि हर बादल एक अवसर है, और हर वर्षा एक उत्तर।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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