कानूनी पेशे में महिलाओं की कमी
हमारे देश में 1923 तक महिलाओं का कानूनी पेशे में आना वर्जित था। हालांकि कार्नेलिया सोराबजी ने इंग्लैण्ड में बैरिस्टरी पास करने के बाद 1921 महिलाओं को कानूनी सहायता देनी शुरू कर दी थी, लेकिन महिलाओं के वकील के रूप में कानूनी व्यवसाय अपनाने पर लगी रोक लीगल प्रैक्टिशनर (महिला) एक्ट संख्या 33 वर्ष 1923 के द्वारा हटाई गई।
इतने सालों के बाद आज भी वकालत के पेशे में पुरुषों की तुलना में महिलाएं काफी कम हैं। सुप्रीम कोर्ट बार में 420 सूचीबद्ध वरिष्ठ वकीलों में केवल 10 महिला वकीलों का होना कानूनी पेशे में महिलाओं की बहुत कम संख्या होने का एक प्रमाण है। अगर देश में महिला वकीलों की संख्या पुरुषों के समानहोती तो पीड़िताएं पुरुषों के बजाय महिला वकीलों की मदद लेतीं और उनसे खुल कर अपनी बात भी कह सकती थीं।
वकील ही क्यों? न्यायपालिका में अब भी पुरुषों का वर्चस्व है। प्रधान नयायाधीश समेत 34 जजों वाले सुप्रीम कोर्ट में पहली बार 3 महिला जज शामिल हुई हैं। अक्टूबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में पहली महिला जज फातिमा बीवी की नियुक्ति के बाद केवल 7 महिला जज देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच पाई हैं। लीला सेठ 1978 में दिल्ली हाइकोर्ट में पहली महिला जज बनी थी। देश के 24 हाइकोर्टों में कुल कार्यरत् 670 जजों में से केवल 73 जज महिलाएं हैं।
समाज अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता
नारी के सम्मान की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार के साथ ही समाज की भी है। एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में 3 सांसदों और देश के 47 विधायकों पर बलात्कार और महिला उत्पीड़न के मुकदमें चल रहे हैं। इनमें से एक उन्नाव काण्ड का आरोपी विधायक भी है।
देहरादून में एक पार्टी के संगठन महामंत्री जैसे बहुत महत्वपूर्ण नेता पर उसी पार्टी की एक कार्यकर्ता ने बलात्कार और ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया था। कुछ नेता अदालत से बरी हो गए। ऐसे सफेदपोशों को मृत्युदण्ड की मांग नहीं की जाती है।
विडम्बना यह कि बलात्कारी सफेद चोले के साथ ही सन्यास के भगवा चोले में भी घुस गए। आधुनिकता और फूहड़ता में भी अंतर नहीं समझे जाने के साथ ही मीडिया और इंटरनेट में बढ़ती अश्लीलता भी यौन अपराधों में वृद्धि का कारण है।
अराजकतावाद की ओर
हैदराबाद के एन्काउटर पर जिस तरह की प्रतिकृया हो रही है उससे यह सकेत मिल रहा है कि कहीं हम वह व्यवस्था से निराश आम आदमी इटली के मैकियावेली, यूनानी दार्शनिक गॉडविन एवं जर्मनी के मैक्स स्टर्नर के अराजक राजनीतिक दर्शन की ओर तो नहीं बढ़ रहा?
दरअसल, अराजकतावाद राजनीति विज्ञान की वह विचारधारा है जिसमें राज्य अवांछनीय, अनावश्यक और हानिकारक है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी तरह की सरकार अवांछनीय है। यह दर्शन स्वैच्छिक संस्थानों पर आधारित स्वाभिशासित समाजों की वकालत करता है।
इनका वर्णन अक्सर राज्यहीन समाजों के रूप में होता है, यद्यपि कई लेखकों ने इन्हें अधिक विशिष्टतापूर्वक अपदानुक्रमिक मुक्त संघों पर आधारित संस्थानों के रूप में परिभाषित किया हैं। अराजकतावादियों के मुताबिक ऐसा समाज बनाना कठिन नहीं है जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकतम होगी, भौतिक वस्तुओं का समान बंटवारा होगा। मैकियावेली भी कहा करता था कि कई बार केवल कानूनों के मुताबिक बात न बनती।
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