सभ्यता बाहरी नहीं बल्कि भीतर होती है, प्रत्येक मनुष्य की आत्मा में।
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इस घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया। हमारे तथाकथित सभ्य समाज से आने वाला मैं आज उस चाय वाले बुजुर्ग के सामने अपने आप को बहुत बौना महसूस कर रहा था। वो व्यक्ति जो हमारे सभ्य और सुसंस्कृत समाज में सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मुझसे कहीं बहुत पीछे खड़ा था, पर मानवता को मानव होने की पहचान देने वाली मानवता की कसौटी पर वो एक खरे सोने की तरह चमक रहा था, जिसकी चमक मुझे आश्वस्त कर रही थी कि मानवता अभी जिंदा है।
ऐसी ही एक और घटना ने मुझे इन सरल, स्वार्थहीन पहाड़ी लोगों के स्नेह के मोहपाश में बांध दिया। ओसला हर की दून घाटी के इस छोटे से पहाड़ी कस्बे में न जाने क्या आकर्षण है जो निरंतर मुझे अपनी ओर खींचती रही है।
एक अत्यंत कठिन पहाड़ी मार्ग पर स्थित 1 घंटे की यात्रा और कम से कम 5 घंटे की कठिन और दुष्कर चढ़ाई के बाद यहां पहुंचना संभव होता है। कड़कड़ाती ठंड और संसाधनों की कमी में अपने मवेशियों के लिए घास काटकर लाना, पानी को दूर से भरकर लाना, जलाने और खाना पकाने के लिए जंगल से लकड़ियां काट कर लाना, दादी परदादी के किस्से कहानियों का हिस्सा लगने वाले इस जीवन को यहां पर पांच, छः दिन बिताने के बाद ही समझा जा सकता है कि ऐसी स्थिति में किसी परिवार का उसके जीविका कमाने वाले सदस्य के बिना जीवन कैसा होगा?
जाहिर है इसकी शायद हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
इस बार की यात्रा पर मेरे गाइड ने मुझे एक परिवार की ऐसी दुखद त्रासदी के विषय में बताया, जहां पर एक महिला, जिसके पति की असमय मृत्यु हो गई थी और कुछ महीनों पहले उसकी मां की एक आंख की रोशनी भी चली गई थी। अपने तीन बच्चों, जो कि सभी 10 वर्ष से कम आयु के थे। उनके साथ इन कष्ट साध्य परिस्थितियों में जीवन यापन करने को बाध्य थी। मैंने अपने गाइड से वहां ले चलने को कहा मैं वहां जाकर उस के माध्यम से उनके द्वारा उगाया जाने वाला राजमा लेकर उसके बदले में कुछ पैसे देकर उसकी मदद करना चाहता था।
पहाड़ों के जीवन में आज भी सादगी और सभ्यता है।
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उसकी सहायता का भाव लिए हम दोनों उसके घर पहुंचे और उससे बातचीत करने लगे। उसने बहुत प्रेम से हमें चाय पिलाई फिर मेरे गाइड ने उससे राजमा देने को कहा तो वो बहुत ही प्रसन्नता और सम्मान से चार पांच किलो राजमा लेकर आई। मैंने उसके बदले में जब उसे पैसे देने चाहे तो उसने अत्यंत करुण स्वर में पैसे लेने से मना कर दिया और मेरे दोबारा कहने पर वह हाथ जोड़कर रोने लगी और जब उसने अपने आर्त स्वर और निष्कपट भाव से कहा कि उसके पास मुझे देने के लिए इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, तो उसकी इस सरल और सच्ची वाणी ने मुझे एक बार फिर से आश्वस्त किया कि जिसको मरा हुआ समझकर हम कब का दफ़ना चुके हैं वह इंसानियत जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में जीवन यापन करते इन फरिश्तों में आज भी जिंदा है।
आज के छल कपट से भरे समय में ऐसे निष्कपट व्यक्तियों से मिलकर मैं हतप्रभ था। अब जब मैं सोचता हूं तो समझ पाता हूं कि हमारी तथाकथित सभ्य सुसंस्कृत तकनीकी जंजाल में उलझी इस दुनिया से दूर रहने के कारण ही शायद मानवता का अस्तित्व इन लोगों के अंदर अभी बरकरार है। लेकिन ये कसक फिर भी मुझ में बनी हुई है कि-
क्यों बस दर्द और अंधियारे में इंसानियत जिंदा है?
क्यों नहीं हम खुद में उसके मर जाने पर शर्मिंदा हैं?