1993 में भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया।
- फोटो : pexels.com
दरअसल, इसी को ध्यान में रखते हुए साल 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वरा मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणापत्र को स्वीकार किया गया जो की मानवता के सफ़र में महत्वपूर्ण कदम था। मानवाधिकार घोषणा-पत्र ने पूरी दुनिया में सदियों से दबे-कुचले इंसानों/समुदायों को अपने वजूद व अधिकारों को पहचानने और अधिकारों के लिए जारी हर लड़ाई को ताकत देने का काम किया है।
वैश्विक मानवाधिकार घोषणा-पत्र के काफी समय बाद 1993 में भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया जिसके बाद राज्यों में भी मानवाधिकार आयोगों का गठन किया गया है जो एक तरह से आम नागरिकों को मानवाधिकारों के उल्लंघनों के मामलों को उठाने का मंच प्रदान करते हैं। परन्तु हमारे देश में मानवाधिकार आयोग की शक्तियां सीमित हैं क्योंकि केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें आयोग की सिफारिशें मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।
मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम, 1993 के तहत मानवाधिकार हनन के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए देश के हर जिले में एक मानवाधिकार अदालतों की गठन की जानी थी, लेकिन करीब 25 सालों बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है और ना ही वर्तमान में इस बारे में कोई बात कर रहा है।
भारत में मानवाधिकार की बहस कमजोर पड़ी है।
- फोटो : फाइल फोटो
भारत में बीते कुछ सालों में मानवाधिकार की बहस ना केवल धीमी हुई है बल्कि इसे उलटी दिशा में मोड़ा जा रहा है। पहले इस देश में मानव अधिकारों की बात करने वाले जो लोग हाशिए पर थे आज वे निशाने पर हैं।
यूएपीए संशोधन बिल 2019 के पारित होने के बाद से अब सरकार बिना किसी सुनवाई या प्रक्रिया के किसी भी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी’ घोषित कर सकती है। ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा जारी वर्ल्ड रिपोर्ट 2019 में कहा गया है कि पिछले साल भारत में सरकार के कार्यों या नीतियों की आलोचना करने वाले कार्यकर्ताओं /गैर-सरकारी संगठनों को निशाना बनाया गया है और कई मौकों पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की गई है। इस दौरान धार्मिक अल्पसंख्यकों, हाशिए के समुदाय भी निशाने पर रहे हैं।
देश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में ना केवल लगातार बढ़ोतरी हो रही है बल्कि इसकी वीभत्सता भी बढ़ती जा रही है। एनसीआरबी द्वारा हाल ही में जारी किए आंकड़ों के अनुसार 2016 के मुकाबले 2017 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 6 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।
निर्भया कांड के बाद आज हम उन्नाव और हैदराबाद की वीभत्स्ता से गुजर रहे हैं। लेकिन हमारे नेता आपराधिक न्याय प्रणाली की चुस्त-फुर्तीला बनाने की वकालत करने की बजाए आरोपियों के लिंचिंग की खुली वकालत कर रहे हैं। समाज भी महिलाओं/लड़कियों के प्रति अपने नजरिए में बदलाव के बजाए इसका हल फांसी या एनकाउंटर में ढूंढ रहा है।
वैश्विक मानवाधिकार घोषणा पत्र ने पूरी दुनिया में जुल्म और गैर-बराबरी के खिलाफ हर संघर्ष को बल देने का काम किया है। अभी तक दुनिया भर के अनगिनत आंदोलनों, संघर्षों, मुक्ति संग्रामों ने इस घोषणा-पत्र ने प्रेरणा लिया है, जिसकी वजह से उन्हें अपना मुकाम भी मिला है। यह आज भी दुनिया भर के मानव अधिकारवादियों के लिए संदर्भ बिन्दु की तरह है। लेकिन बदलती दुनिया में इसकी अव्हेलना बढ़ती जा रही है।
आज दुनिया भर में कई मुल्कों की सरकारें खुद को लोकतांत्रिक तो कहती हैं परन्तु वे सवाल करने और आलोचना सहने को तैयार नहीं है। दुर्भाग्य से भारत भी ऐसे ही देशों की सूची में शामिल हो गया है जहां मानवधिकारों का दायरा तेजी से सिकुड़ता जा रहा है।
लोकतान्त्रिक संस्थाएं तेजी से कमजोर रही हैं और उनकी जगह कुछ “मजबूत व्यक्ति” लेते जा रहे हैं। एक लोकतान्त्रिक देश के भेष में हम “आदिम” बनते जा रहे हैं जिसके लिए “लोक” और “तंत्र” दोनों जिम्मेदार हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।