हुकमचंद ने संसद मे ये प्रस्ताव रखते हुए जोर दिया कि 'चीन के एक और हमले से कोई अगर बचा सकता है तो वो है परमाणु हथियार।
- फोटो : iStock
वो देश को आत्मनिर्भर बनाने के मिशन में लगे थे
उस वक्त प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे और वो देश को आत्मनिर्भर बनाने के मिशन में लगे थे और परमाणु बम की होड़ से देश को दूर रखना चाहते थे, लेकिन पार्लियामेंट में परमाणु बम को लेकर बहस की कोशिशों को रोकने के बावजूद वो रोक नहीं पाए। पार्लियामेंट में चीन के खतरे को देखते हुए एटम बम बनाने का पहला प्रस्ताव देवास से जनसंघ के सांसद हुकम चंद कछवाय ने रखा।
हुकमचंद ने संसद मे ये प्रस्ताव रखते हुए जोर दिया कि 'चीन के एक और हमले से कोई अगर बचा सकता है तो वो है परमाणु हथियार। अगर हमारे पास परमाणु बम होगा तो चीन तो क्या अमेरिका की भी आंख दिखाने की हिम्मत नहीं होगी'। लेकिन हुकमचंद का ये प्रस्ताव कांग्रेस के सांसदों के विरोध के चलते गिर गया... लेकिन भारत के संसदीय इतिहास में हुकमचंद का ये प्रस्ताव एटम बम पर पहला होने की वजह से संसदीय कार्यवाही में हमेशा दर्ज है, इसे नई पीढ़ी भले ही ना जानती हो।
आज कांग्रेस भले ही पहले परमाणु परीक्षण का श्रेय लेती हो, लेकिन उस वक्त पहले प्रस्ताव को पार्लियामेंट में गिराने का ठीकरा भी उन्हीं के सर पर है और हम चीन से पहली हार के बाद पूरे दस साल पीछे हो गए। जो समय पर फैसला लेते तो शायद बच जाते। बाद में हालांकि इंदिरा गांधी ने 1974 में परमाणु परीक्षण किया, पूरे दस साल बाद कांग्रेस ने इसकी जरूरत मानी, लेकिन कछवाय को उसका श्रेय नहीं मिला। उनको अपने दौर में समय से आगे रहने के चलते खारिज कर दिया गया, आज ना जनसंघ उन्हें याद करता है, ना पार्लियामेंट या देश की सरकार और ना ही इतिहासकार और मीडिया।
इस मामले में सबसे दिलचस्प बात ये है कि कलाम, इंदिरा, भाभा, काकोडकर और बाजपेयी जैसे लोग आज जननायक हैं, वहीं गूगल पर हुकम चंद कछवाय का एक फोटो तक ढूंढे नहीं मिलता। बड़ी मुश्किल से लोकसभा की वेबसाइट पर उनका एक फोटो मिला। अगर समय पर वो प्रस्ताव पास होता तो चीन हमने इतना आगे नहीं आता।
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी परमाणु परीक्षण हुए।
- फोटो : पीटीआई
दिलचस्प बात है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में भी परमाणु परीक्षण हुए, लेकिन इस मौके पर भी हुकम चंद को ना तो किसी पुराने जनसंघी ने याद किया और ना ही किसी भाजपाई ने. ऐसे में कांग्रेसी उनकी बात करें, ये उम्मीद करना ठीक नहीं होगा। वैसे आपको बता दें उस दौर में जब जनसंघ के गिनती के सांसद जीत कर आते थे, हुकम चंद तीन अलग अलग सीटों से लोकसभा का चुनाव जीते थे। रेलवे की कई यूनियंस के वो प्रेसीडेंट रहे, मजदूर नेता तो थे ही, दिल्ली मिल्क स्कीम एम्पलॉयी एसोसिएशन के भी प्रेसीडेंट रहे। आजादी के बाद एक तरफ जहां वो पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों की मदद के काम में जुटे थे, तो बाद में गौहत्या के विरोध वाले आंदोलन से भी लम्बे समय तक जुड़े रहे।
आम लोगों की परेशानियों को संसद में उठाने के मामलों में हमेशा वो आगे रहे, 27 नवम्बर 1967 को कोर्ट फीस अमेंडमेंट बिल पर ना केवल उन्होंने कोर्ट में केस की सुनवाई की समयबद्ध सीमा की मांग की थी, बल्कि बड़ी कोर्ट्स मे हिंदी लागू करने का भी मुद्दा जोरशोर से उठाया था। इतना ही नहीं अपने भाषण में हिम्मत के साथ कहा कि अदालतों में इतनी रिश्वतखोरी बढ़ गई है कि गरीब आदमी को तो किसी भी कीमत पर यहां न्याय नहीं मिल सकता।
हिम्मती वो इतने थे कि कोई भी सवाल पूछ लेते थे, ऐसे विषयों पर भी जिनके बारे में सरकार उस दौर में सोचती भी नहीं थी कि विपक्ष का कोई सांसद इतनी जानकारी रखता भी होगा। एक बार तो पीएम इंदिरा गांधी को उनके सवाल का जवाब देना पड़ा था। 3 जुलाई 1967 को उनका अतारांकित सवाल था कि पीकिंग स्थित भारतीय दूतावास को जो क्षति पहुंचाई गई है, उसके लिए चीनी सरकार से मुआवजा लेने के लिए क्या कार्यवाही की गई है? इस पर इदिरा गांधी जिनके पास उस वक्त विदेश विभाग भी था, खुद जवाब देना पड़ा था कि हम मुआवजा मांगते उससे पहले ही चीन ने संविदात्मक दायित्वों का उल्लंघन करते हुए उस इमारत का किराएदारी का पट्टा ही खत्म कर दिया, जिसके चलते हमें दूसरी इमारत में दूतावास शिफ्ट करना पड़ा, इसे निपटाने में अभी समय लगेगा। बाद में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान उनको भी 19 महीने तक जेल में रखा था।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।