पर्यावरण का सतत संकट आज का सबसे बड़ा खतरा है। प्रदूषण आज वैश्विक समस्या का रुप ले चुका है। कल कारखानों से निकलता काला जहरीला धुआं वायु को प्रदूषित कर रहा है। ठोस जहरीले अपशिष्ट जल प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बने हुए है। आधुनिकता की अंधी दौड, वृक्षों का तेजी से कटान करवा रही है। शहरी दिनचर्या की जीवन शैली में फ्रीज, एसी व लाखों वाहन वायुमंडल को सातो पहर गर्मा रहे हैं।
नतीजतन पर्यावरण व प्रकृति बर्बाद हो रहे है। जिससे नई-नई बीमारियां पैदा हो रही हैं। उतना ही नुकसान प्रकृति की प्रतिक्रियावश मनुष्य का हो रहा है। जितनी तेजी से हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं, यानि पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे है। उतनी ही सजगता और संवेदनशीलता से प्रकृति को पोषित करने वाली कार्यवाहियों को संचालित करने का समय अब आ गया है।
प्रकृति की परम्परा अपने आप में परिपूर्ण है वह एक स्वतः स्फूर्त व्यवस्था है। जो जीव-जंतु हमें बिल्कुल अनुपयोगी और हानिकारक प्रतीत होते हैं, वे खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी हैं और उनका पर्यावरण के संरक्षण में मुख्य योगदान होता है। जैसे कीड़े-मकोड़े, पौधों के तनों और पत्तियों को खाकर फसलों को हानि पहुंचाते हैं, ये पक्षियों का भोजन बनकर पक्षियों से फसल को सुरक्षित रखते हैं और पक्षी इन कीड़ों को खाकर कीड़ों से फसल की रक्षा करते हैं।
इन कीड़ों के अभाव में पक्षी फसलों को अपेक्षाकृत अधिक हानि पहुंचा सकते हैं। इसी तरह हरे वृक्ष प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन निकालते हैं। यह वातावरण शुद्धि की सतत् चलने वाली प्रक्रिया हैं। जहां ऑक्सीजन सब प्राणियों के सांस लेने के लिए आवश्यक है। वही जीवों द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाई-ऑक्साइड पूरे वनस्पति जगत का भोजन है। वृक्षों का कटान इस प्राकृतिक प्रक्रम को सर्वाधिक बाधित करता है। इस श्रृंखला को तोड़ता है।
परिणामस्वरुप बाढ़, सूखा, वर्षा का बढ़ता असंतुलन, ओलावृष्टि, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ रही है। विभिन्न तरह के प्रदूषण के कारण बीमारियां बढ़ रही है। पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि हम स्वाभाविक खाद्य श्रृंखलाओं को बाधित न करें।
पर्यावरण संरक्षण हेतु अपने दैनिक कार्यों में ऐसी आदतें शामिल करे जिनसे पृथ्वी का वातावरण सुधर सके। स्वच्छता सहित वृक्षारोपण और वन्य जीव संरक्षण व जैव विविधता का महत्व जन-जन को समझाने का प्रयास किया जाना आज की महती आवश्यकता है। चूंकि वृक्ष खाद्य-श्रृंखला की प्रथम कड़ी है, अतः पर्यावरण के संरक्षण में वृक्षों का प्राथमिक महत्व है।
जिस प्रकार पर्यावरण दूषित हो रहा है, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, विकसित देश प्रदूषण फैला रहे हैं, छदम आवश्यकताओं की आड़ में अंधाधुंध वृक्ष कट रहे है। इसी का परिणाम है ग्लोबल वार्मिंग से धरती का तापमान बढ़ रहा है। जो अधिकांश खतरों को आमंत्रित कर रहा है। गांधी कहते है धरती हमारी नीड पूरी कर सकती है ग्रीड नहीं। प्रकृति में हमारी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त है पर लोभ-लालच के लिए नहीं।
इसलिए आवश्यकता के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करें, शोषण नहीं। हमने जो बेईमाना किया है वह शर्मनाक तो है ही निन्दनीय भी बेहद है। जो था, वह अब हो ही नहीं सकता है संभव भी नहीं। क्योंकि विकास की होड़ और दौड में हम बहुत दूर निकल आए हैं। फिर भी जिस बढ़ते उपभोगतावाद से यह संकट गहराया है उसी में इसके समाधान के सूत्र खोजने होगें। इसके लिए वैकल्पिक जीवन शैली का विकास ही एक रास्ता है। हमें अपने जीवन जीने के तौर-तरीकों को बदलना होगा। आप दस बाल्टी पानी में बहाते हैं तो उसे पांच बाल्टी कर दीजिए! घर में तीन गाड़ियां हैं तो एक से ही काम चला लिजिए!
अपने आस-पास पाम ट्री नहीं बरगद, पीपल और नीम जैसे वृक्ष लगाइये! धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर नदियों/नालों को गंदा करना बंद कर दीजिए! छुट्टी मिलते ही पहाड़ों के सैर-सपाटे थोड़े कम कर दिजिए। अपने सगे संबंधियों, मित्रों, परिजनों से मिलने को अहमियत दिजिए। साथियों जब खतरा इतना बड़ा है तो इसके विकल्प भी बहुत सारे खोजे जा सकते हैं! क्हीं से भी शुरु कर दीजिए।
यह सिर्फ उपदेश नहीं है बल्कि बहुत से समाजों के सजीव उदाहरण हमारे सामने है जिन्होने अपने जीवन की दिशा को बदलकर प्रकृति प्रेरित जीवन मॉडल को अपनाकर पर्यावरण को बचाने का काम किया है! दुनियां में चल रहे ऐसे सारे पर्यावरणीय प्रयास सहेजकर एक नयी जीवन शैली गढ़नी है!
कुछ मानवीय प्रवृत्तियां यथाः लोभ, लालच और कंजूसी घर, परिवार, समाज और प्रकृति संरक्षण के हित में होती है। चाहे यह पर्यावरण को बचाने की दृष्टि से हो या पैसे बचाने के लिए। हालाँकि, अधिकांश लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि अपने दैनिक जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव करके कैसे प्रकृति पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते है। पर्यावरण की चिंता की दिशा में आपका छोटा सा प्रयास ही दुनिया को बेहतर बनाने में काम आयेगा। साधारण से बदलाव और सजगता से थोड़े जरुरी व स्थायी परिवर्तन करके, आप पर्यावरण पर अपनी दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों से बड़ी मेहरबानी कर सकते हैं।
सबको अपने दैनिक जीवन में सबसे टिकाऊ जीवन विचार विकसित करने ही होगें। जो पर्यावरण के अनुकूल जीवन जीने में मदद करेंगे। तभी धरती को बचाया जा सकता है। पर्यावरण पोषित जीवन शैली को ईजाद करने से पहले प्रकृति और मानवीय अस्तित्व की समझ जिन अंतःक्रियाओं पर टिकी है उन्हें जानना जरुरी है। जैसे कि दैनिक जीवन में पर्यावरण हमारे जहन में क्या है इस पर चिंतन आवश्यक है। हम जिस समाज में है उसकी संस्कृति प्रकृति के समानांतर कितनी समझ वाली है। पर्यावरण का रख-रखाव हमारी दैनंदिन जीवन चर्या में कितना शामिल है।
हमारी दैनिक जीवन गतिविधियां पृथ्वी-परिवार के जीव-जगत के लिए कितनी संवेदनशील है। हम चीजों के संरक्षण और सेविंग के लिए लालायित है या लालची है। हमारे जीवन में पर्यावरण का हित सर्वोपरि रखने वाली हरित मानसिकता का विकास करने वाले अभ्यास कितने है। आत्मनिर्भता/वैयक्तिकता के बजाए अंतर्निर्भरता व सामूहिकता में हमारी कितनी आस्था है। पर्यावरण से जीवन का जुडाव बनाए रखने वाली जीवन शैली को हम कितना पसंद करते है।
पर्यावरण हितैषी जीवन जीने की जिज्ञासा को बढ़ाने वाली शिक्षा कहां से मिलेगी। धर्म, जाति, संस्कृति, राजनीति और अर्थव्यवस्था तक में प्रकृति की अर्थवत्ता का आहवाहन कैसे किया जा रहा है। ये तमाम वे प्रशन है जिनके समाधान की दिशा में बढ़कर एक इको-फ्रेंडली लाइफ स्टाइल के तौर तरीके खोजे जा सकते है।
हमें अपने रोजमर्रा के जीवन और पर्यावरण संकट को जोड़कर देखने जरुरत है और अपनी जीवन शैली में सार्थक सुधार करने की भी आवश्यकता है। सुबह बिस्तर से उठने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने तक उपभोग करने वाले उतपादों में आधुनिक जीवन शैली की देन ढेरों कैमिकल्स की एक लम्बी फेहरिस्त है। जिनका पर्यावरण से सीधा साबका है। उनके बनने से लेकर, उपयोग और विसर्जन तक पर्यावरण का ह्रास-ही-ह्रास है। जिसकी भरपाई हम छोटी-छोटी सी पहलों के जरिए प्रकृति के पोषण और इस धरती की सेवा में अपना योगदान दे कर सकते है। कुछ सावधानियां रखे। जैसे अपने घर पर रीसाइक्लिंग की व्यवस्था रखे।
बहुत कम लोग है जो कचरे को कम करने और प्राकृतिक संसाधनों का पुनः उपयोग करने के लिए घर में ध्यान देते हैं जैसे कि खाद के ढेर को बनाए रखना या पानी के लिए रेन बैरल अथवा अन्य कैच का उपयोग करना। कितने लोग है जो घर पर अपनी जरुरत की सब्जियाँ उगा पाते हैं। लोग ऐसी जगहों पर भी गाड़ी से जाने में सेखी समझते है जो चलने के लिए बहुत करीब हैं। पहाड़ हमारे लिए मौज-मस्ती और सैर-सपाटे की जगह बनकर रह गए है। लोग अपने शौक और अवकाश का समय पहाड पर बिताने के आधे-अधूरे जीवन प्रदर्शन में पस्त है।
वे अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण की रक्षा पर ध्यान तो केंद्रित नहीं करते पर प्राकृतिक दृश्यों की फोटोग्राफी और सेल्फी उन्हें क्षणिक प्रशंसक बनाए रखती है। प्राकृतिक सेटिंग में सैर पर जाना सबकी इच्छा रहती है। पर लाइट और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को अक्सर चालू छोड़कर चल देना सबकी सहज प्रवृत्ति बनी हुई हैं। ऐसी ही सहज लापरवाहियां हमें उन चीजों को फेंकने की आदी बनाए हुए हैं जिन्हें रिसाइकल किया जा सकता था। जिनकी केयर करके पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति को प्यार किया जा सकता था। हर व्यक्ति अपने दैनंदिन जीवन में पर्यावरण परवरिश के ये अभ्यास जरुर करे।
अपने परिवेश में प्राकृतिक संसाधनों की पहचान करे!
पहचान की यह प्रक्रिया आपको प्राकृतिक संसाधनों के प्रति अधिक जागरूक करना शुरु करेगी। इससे आप प्रकृति के प्रति संवेदनशीन बनेगें। धीरे-धीरे यह समझ बनना भी शुरु होगी कि किस तरह इन संसाधनों से उर्जा लेनी है, कैसे पानी का उपयोग करना है, कितनी, कैसे और कहां यात्रा करने जाना है और किस काम को कैसे करना है। पहचान करने में चिंतन का यह दृष्टिकोण हमें पर्यावरण-अनुकूलन के विकल्प चुनने में मददगार बनेगा।
प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में सक्रिय सहयोग करें!
उपयोग में न होने पर लाइट, पंखे, कम्पयूटर, फोन, लैपटॉप, वाई-फाई जैसे उपकरणों को बंद करने के सामान्य कार्य से शुरू करके बिल्डिंग निर्माण तक के बड़े कार्यों में पर्यावरणीय सतर्कता रखे। संसाधन संरक्षण का ऐसा अभ्यास हमारे सहज स्वभाव का हिस्सा बनने लगेगा। शुरुआती स्तर पर जागरूकता इस दिशा में प्रभावी पहल की तरह दिख सकती हैं बस आपके शुरु करने की देर है।
नए और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज करें!
पर्यावरण अनुकूलित ऊर्जाओं में सौर ऊर्जा भारत जैसे देशों के लिए आर्थिक दृष्टि से बहुत व्यवहार्य है। वर्ष भर धूप की पर्याप्तता सहज रुप से उपलब्ध है। सौर ऊर्जा न केवल स्वच्छ और सस्ती है बल्कि इसका उपयोग पानी गर्म करने से लेकर भोजन पकाने, कार और ए.सी. चलाने तक किया जा सकता है।
स्वच्छता और वृक्षारोपण है अहम
स्वच्छता हमारी जीवन शैली की रफतार और माइलेज को बढ़ाती है। स्वच्छता जीवन जीने के समग्र दृष्टिकोण का निर्धारण करती है। आधुनिक जीवन शैली में व्यक्तिगत स्वच्छता अहम् है। सुबह से शाम तक हम ढेरों कैमिकल्स यूज करते है, बॉडी वॉश से लेकर फेस स्क्रब और टूथपेस्ट तक में यह ध्यान रखे उसमें महीन कण कम से कम हो। ये माइक्रो-बीड्स ठोस प्लास्टिक के बहुत छोटे दाने होते हैं जो जलस्रोतों में मिलकर खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं और अंततः पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाते हैं।
इसी तरह पेड़ धरती पर जीवन का आधार हैं। वृक्ष मात्र ऑक्सीजन के लिए नही बल्कि अन्य सभी प्राणियों के खाने, पीने, रहने और जीने का आधार आश्रय है। वृक्ष हमें फल, फूल देने से लेकर मिट्टी के कटाव को रोकने तक में अहम भूमिका निभाते हैं। हवा को साफ रखते हैं और तमाम वन्यजीवों को आश्रय देते हैं। वातावरण को ठंडा भी रखते और पर्यावरण की मददगार है।
खान-पान के तरीके पर्यावरण पोषक हो!
हमारी भोजन शैली जितनी शाकाहारी होगी उतना पर्यावरण का कम नुकसान होगा। हमारी जीवन शैली का हर हिस्सा हमारे कार्बन पदचिह्न को तय करता है। सब्जियाँ, अनाज, फल, फलियाँ कम पौष्टिक हो सकते हैं पर ये उत्सर्जन को कम करने में बहुत मददगार हैं। भोजन की बर्बादी को रोकना पर्यावरण संरक्षण में गुणात्मक रुप से सहयोगी हो सकता है। भोजन की बर्बादी के साथ समय, श्रम, ऊर्जा और प्राकतिक संसाधनों की बर्बादी सहित हवा, पानी, बिजली, बीज, उर्वरक, पूंजी भी ह्रास होता हैं। इसलिए हमारे जीवन में भोजन पाने का तीरका पर्यावरण पोषक भी हो सकता है और पर्यावरण विनाशक भी।
हानिकारक रसायनों पर निर्भरता कम करें
हम अपने दैनिक छदम जीवन स्तर को उच्च दिखाने में पेंट, अमोनिया, तेल, सफाई एजेंट, पेटृल आदि की खपत बढ़ाते जाते है। परिणामतः ऐसे उत्पादों से बहुत से हानिकारक और खतरनाक रसायन निकलते हैं। यदि इन्हें खुले में फेंक दिया जाए, तो हवा, पानी और मिट्टी लगभग सभी चीजें प्रदूषित हो जाती हैं। अपनी जीवन शैली को ऐसे पदार्थों पर कम से कम निर्भर बनाए। इकोफ्रेंडली जीवन शैली को जीवंत बनाए रखने वाली संस्कृति का विकास और विस्तार हो।
पर्यावरण हितैषी जीवन शैली के लिए कचरे का प्रबंधन सबसे अहम!
कचरे का पुनः उपयोग हमें कई स्तरों पर सशक्त और पर्यावरण की दृष्टि से संरक्षणवादी बना सकता है। कचरे को रीसायकल करने के स्किल हमें आने जरुरी है यह एक खास जीवन दृष्टि के विकसित होने के साथ बढ़ती जाती है। हम बाजार में भी ऐसे उत्पादों की तलाश करें जो पुनर्नवीनीकरण सामग्री से बने हों क्योंकि यह पर्यावरण हितैषी होने का एक शानदार तरीका है।
पहला प्रयास तो यही हो कि उत्पन्न होने वाले कचरे की मात्रा न्यूनतम हो। अगर कुछ है भी तो कचरा लैंडफिल में जाने के बजाए हमारी नीडफिल करने में जाए। इतना ही नहीं कबाड़ का अर्थशास्त्र बताता है कि कैसे कचरे को कंचन बनाया जाता है। खाद बनने/बनाने की पूरी प्रक्रिया है जिसमें पौधों के अवशेष या घरेलू अपशिष्ट टूटकर पौधों की खेती के लिए समृद्ध पोषक भोजन बनाते हैं। परिणामतः कचरा तो कम होगा ही इससे वायु और जल प्रदूषण भी कम होगा।
प्लास्टिक को ना कहें
जितना हो सके प्लास्टिक का उपयोग अपने जीवन में न्यूनतम करे। प्लास्टिक के थैले/थैलियों को कैनवास या जूट की थैलियों से रिप्लेस करे। बोतलबंद पानी और प्लास्टिक पैकिंग को खरीदने से बचने का प्रयास रहे। बेशक, यह कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है लेकिन यदि आप पर्यावरण हितैषी होना चाहते हैं तो आपको निश्चित रूप से विकल्प मिलेंगे।
जंगली और जलीय जीवन भी जरुरी है
विकास का आधुनिक मॉडल जिन मानवीय गतिविधियों के संचालन को जरुरी समझता है उसके परिणाम स्वरुप ही प्रजातियों और उनके आवासों का विनाश हो रहा है। जैव विविधता विलुप्त हो रही हैं। समुद्र तट और जंगल जलीय व जंगली जीवन का आधार हैं। जिनका संरक्षण सरकारी स्तर के बजाए गैर-सरकारी स्तर पर ही प्रभावी ढ़ंग से संभव है।
निष्कर्षतः पर्यावरण हितैषी जीवन शैली के विकास में हम कुछ तरीके अपना सकते है जैसे अपनी यात्रा की आदतों को बदल कर, उन्हें कम उपभोगी और ज्यादा उपयोगी बनाकर पर्यावरण को तो बचायेगें ही अपने खर्च को भी कम कर पायेगें। हमेशा स्थानीय खाद्य उत्पादों का उपयोग करे।
एक बात जो सर्वाधिक महत्व की है ऐसे लोगों को शिक्षित और सजग बनाए जो पर्यावरण के अनुकूल जीवन जीने के महत्व से अनजान हैं। उन पर गुस्सा नहीं दया करें। बहुत से लोग पर्यावरण-अनुकूल जीवन नहीं जीते हैं क्योंकि उन्हें इसके बारे में जानकारी ही नहीं है। आप उपदेश के बजाए उदाहरण पेश करे। धीरे-धीरे लोग पर्यावरण हितैषी जीवन शैली का हिस्सा बनेगें तो निश्चित ही एक बेहतर दुनिया बनाने में हमारा योगदान समान रुप से होगा।
हर देश, समाज, राष्टृ अपना विकास चाहता हैं। सतत द्वंद्व यही है कि विकास हो कैसे? विकास को सतत विकास की राह पर कैसे लाया जाए? सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार ही विकास का प्रमुख लक्ष्य है। जिसके लिए समाज में आर्थिक विकास, समानता और सामाजिक न्याय के साथ नवप्रवर्तन की आवश्यकता होती है। किसी भी समाज में विकास का संबंध संस्कृति से पहला और गहरा है। संस्कृति जीवन जीने के ढ़ंग की दृष्टि प्रदान करती है जिससे उसकी जीवन शैली विकसित होती है। इसीलिए आधुनिक समाज विज्ञान सतत विकास आख्यान के साथ संस्कृति की भूमिका को मुख्य रुप से रेखांकित कर रहा है।
जीवन शैली के जरिए ही संस्कृति का सतत अभ्यास किसी समाज में परिलक्षित होता है। समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में जीवन शैली लोगों, परिवारों और समाज द्वारा जीने का तरीका है। जीवन शैली व्यवहारों का एक समूह है जो लोगों, परिवारों और समाज द्वारा विभिन्न स्थितियों यथाः शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक में प्रस्तुत हेता है। सामाजिक चिंतक एडवर्ड फ़र्न जीवन शैली के कारकों को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हैं।
पहला वे क्रियाएँ जिनमें नौकरियाँ, व्यवसाय, अन्य कार्य, शौक और मनोरंजन दूसरा संचार परिवार व मित्रों संग तथा तीसरा विश्वास जो सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक क्षेत्र से संबंधित है। अतः जीवन शैली में जीवन जीने के विशिष्ट लेकिन स्पष्ट तरीके समाहित हैं जो कार्यों, संचार और विश्वासों में निर्धारित होते हैं। संस्कृति का जीवन शैली से गहरा संबंध है, जो सांस्कृतिक पूंजी को संरक्षित करने में योग करता है। इसी तरह आर्थिक पूंजी को भी जीवन शैली संपोषित करती है।
आधुनिक वैश्वीकृत बाजारवाद के दौर में जीवन शैली और आर्थिक पूंजी के इसी नए गठजोड़ ने उपभोक्तवाद का विस्तार एक वैश्विक संकट के रुप में किया है। उपभोक्तावाद पर्यावरण का सबसे बड़ा दुश्मन बनकर उभरा है। उपभोक्तावाद किसी भी समाज में धन, समय और उर्जा को बर्बाद करने वाली संस्कृति का विस्तार अतिश्य उपभोग वाली जीवन शैली के जरिए करता है। यह कार्य बाजार और मीडिया की जुगलबंदी से मौजूदा दौर मे सहज रुप से हो रहा है। संस्कृति जीवन शैली में ही प्रस्फुटित होती है।
मानवीय और सामाजिक पूंजी के साथ नैतिकता की पूंजी भी महत्वपूर्ण है। अभाव की जीवन शैली मानवीय मूल्यों को भी विरोधी मूल्यों में बदल सकती है। सामाजिक संबंध श्रृंखला के नेटवर्क को तोड़ देती हैं। इसी तरह अस्वास्थ्यकर जीवन शैली मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रुप से प्रभावित कर विकास व उन्नति की राह में गंभीर चुनौतियां पैदा करती हैं। नैतिक पूंजी समाज में नैतिक मूल्यों और नैतिक विशेषताओं के एक जटिल संकुल के रूप में समझी जा सकती है। नैतिकता का आग्रह है इस धरती पर भावी पीढ़ी का भी उतना ही हक है जितना हमारा। यही सतत विकास का आधार विचार है।
निष्कर्षतः सतत विकास हेतु स्वस्थ जीवनशैली एक आवश्यक शर्त है। जिसके लिए दैनिक जीवन में स्वच्छता का पूरा ख्याल रखे। पर्यावरण को बचाने के लिए सबसे पहले हमें पानी को प्रदूषित होने से बचाना है। वनों को नष्ट होने से बचाना है और लोगों को अधिकाधिक वृक्षारोपण करने को प्रेरित रखना है। घरों से निकले जैव कचरे से खाद बनाइए। बिजली का उपयोग जरुरत के लिए ही करें सुविधाभोगी न बने। खुले में शौच न करें। वायु तथा ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए अपने वाहनों की निरंतर जांच कराएं तथा कम दूरी वाले स्थानों पर जाने के लिए साइकिल का उपयोग करें।
अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाकर पर्यावरण को बचाए। पर्यटन क्षेत्रों में पर्यटक आवश्यक आचार संहिता का पालन करे। क्या ब्रश, सेविंग, स्नान करते हुए हम पानी का नल व्यर्थ तो नहीं बहने दे रहे ध्यान रखे। इन सब कामों में थोड़ा-थोड़ा पानी बचाना भी जल संरक्षण के प्रति बड़ा योगदान देने वाला होगा। जल संरक्षण के लिए वर्षाजल का संचय और भी महान प्रयास बन सकता है। सबको जागरूक करना होगा और पर्यावरण के महत्व को समझना होगा। आमजन संसाधनों का सीमित उपभोग करे।
संकट की गहनता को देखते हुए हमें हरित मानसिकता विकसित करने की आवश्यकता है। समाज को स्वच्छता और वृक्षारोपण अभियान में जुटने की जरुरत है। किसानों को जैविक खेती की दिशा में बढ़ने की दरकार है। उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग न्यूनतम किया जाए। कम बिजली, कम पानी, कम गैस का प्रयोग कर पर्यावरण सेवा में हर कोई अपना योगदान दे सकता है। प्रदूषण रोकने के लिए जलाऊ लकड़ी का उपयोग कम से कम कर दे।
पानी की खपत कम कर दे। हर स्थिति में जल-जंगल-जमीन को बचाने की सोच रखे। इन छोटे-छोटे प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण का बड़ा संदेश दिया जा सकता है। आपका जीवन सबके लिए मिशाल बन सकता है। मिलजुल कर काम करना सीखे। हमारी छोटी-छोटी पहल प्रकृति संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर बन सकती है। हमारे दैनिक क्रियाकलापों से कार्बन-डाइऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन कम-से-कम हो। हमारा प्रयास हो हमारे कार्बन फूटप्रिंट न्यूनतम हो।
पानी की बचत के तरीके अपनाते हुए भूमिगत पानी का उपयोग आवश्यकतानुसार ही करें। बिजली बचाकर ऊर्जा संरक्षण में अपना अमूल्य योगदान करे। पर्यावरण को बचाने के लिए जागरूकता, सजगता और अपने पुनीत दायित्व का समाज हित में निर्वहन करें। प्रकृति आपके इन अभ्यासों की आभारी रहेगी। “धरती की सेवा-मॉं की सेवा जैसी है” इस सोच से हम अपने दैनिक व्यवहार में उतरें, फिर देखों कैसे ये धरती संवरती है।
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